सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
| ५४० | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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प्रत्याययितुं नटवदीश्वरस्य तदभिनयमात्रपरत्वात् । अन्यथा तस्य नित्यमुक्तत्वनिरवग्रहस्वातन्त्र्यसमाभ्यधिकराहित्यादिश्रुतिविरोधात् । तस्माद्यावत्सर्वमुक्ति परमेश्वरभावो मुक्तस्येति बिम्बेश्वरभावे न कश्चिद्दोषः ।
अभिनयमात्र करता है, इसके सूचनके लिए ही रामादि अवतारोंमें अज्ञानका कथन है, वस्तुतः नहीं। † यदि ऐसा न माना जाय, तो उस परमात्मामें नित्यमुक्तत्व, निरवग्रहस्वातन्त्र्य एवं सम और अभ्यधिकके राहित्य आदिका जो श्रुतिने प्रतिपादन किया है, उसका विरोध हो जायगा । इससे जब तक सभी जीवोंकी मुक्ति नहीं होती, तब तक मुक्त पुरुषका परमेश्वरके साथ तादात्म्य-रूपसे अवस्थान होता है, अतः बिम्बभूत ईश्वरभावमें कोई दोष नहीं है ।
और वह दशरथके प्रति दुर्वासासे कही गई है—
एक समय देवताओंका और असुरोंका परस्पर भयङ्कर युद्ध हुआ, उस युद्धमें देवताओंने असुरोंका पराजय किया। असुर लोग अपनी रक्षाके लिए भृगु ऋषिकी पत्नीकी शरणमें गये, उसने असुरोंको अभयप्रदान किया और निर्भय होकर वे रहने लगे। भगवान्को जब यह मालूम हुआ तब उन्होंने क्रुद्ध होकर अपने चक्रसे भृगुपत्नीका माथा काट डाला। अपनी पत्नीका शिरच्छेद देखकर भृगुने विष्णुको सहसा शाप दिया कि अरे विष्णु ! तुमने मेरी पत्नीका वध किया है, इसलिए तुम मनुष्ययोनिमें जन्म पाकर अपनी पत्नीके वियोगमें अनेक वर्षतक दुःख भोगोगे । परन्तु भगवान्की अमोघशक्तिसे वह शाप भगवान्को नहीं लगा, बल्कि वापस आकर भृगुको ही सताने लगा । जब उन्होंने इस शापसे अत्यन्त दुःखी होकर शापसे मुक्त होनेके लिए अन्य ऋषियोंकी प्रार्थना की तब उन्होंने विष्णुकी उपासनाके लिए सलाह दी । सलाहके अनुसार भृगुने विष्णुकी उपासना की । फलतः भगवान् प्रसन्न हुए और कहा कि हे भृगु, तुम दुःखी मत होओ, तुम्हारा दिया हुआ शाप मैं वापिस ले लेता हूँ और तुम्हारे शापकी सत्यताके लिए मैं मनुष्य भी होऊँगा और पत्नीवियोगका कष्ट भी सहन करूँगा । तब भृगुने अनेक प्रकारसे भगवान्की अर्चना और स्तुति की । इस प्रकार शापकी रक्षाके लिए भगवान्ने नर बनकर यह सब अभिनय किया, यह भाव है ।
† 'एष त आत्मा सर्वान्तर्र्याम्यमृतः, एष सर्वेश्वरः, न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्' ( यही तुम्हारा आत्मा अमृत ( नित्य ) और सबका अन्तर्यामी है, यही सबका नियामक है, इस आत्माकी बराबरी करनेवाला और इससे अधिक दूसरा नहीं है, निर्गुणोपासक संसारसे तर जाता है, वही परमपद है ) इत्यादि श्रुतियोंसे 'नारायणात् ब्रह्मा जायते, अन्तर्बहिश्च तत्सर्वं व्याप्य नारायणः स्थितः' ( नारायणसे ब्रह्मा हुआ, बाहर और भीतर सबको व्याप्त करके नारायण अवस्थित है ) इत्यादि अनेक श्रुतियोंसे सिद्ध ईश्वरमें नित्यमुक्तत्व आदि धर्म सुने जाते हैं, यह भाव है ।
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४१
पक्षोऽयं चरमः साधुः सूत्रभाष्यादिषु स्फुटः ।
आविर्भूतस्वरूपेऽपि गुणाष्टकनिरूपणात् ॥ १९॥
यह अन्तिम पक्ष ही श्रेष्ठ है, क्योंकि सूत्र, भाष्य आदिमें इसीकी स्पष्टता पाई जाती है, सगुण अपरोक्ष ब्रह्मानुभवसे ईश्वरस्वरूपमें आविर्भूत जीवमें आठ गुणोंका निरूपण किया गया है ॥ १९ ॥
अयमेव पक्षः श्रुतिसूत्रभाष्याद्यनुगुणः । तथा हि—समन्वयाध्याये तावद् ‘दहर उत्तरेभ्यः’ (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १४) इत्य- धिकरणे ‘अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म दहरोऽस्मिन् अन्तराकाशः’ इत्यादिश्रुतिनिर्दिष्टो दहराकाशो न भूताकाशः, नापि जीवः, किन्तु परमेश्वरः, उत्तरेभ्यो वाक्यशेषेभ्यः । ‘उभे अस्मिन् द्यावा- पृथिवी अन्तरेव समाहिते’ ‘यावान्वा अयमाकाशस्तावनेषोऽन्तर्हृदय आकाशः’ ‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपि- पासः सत्यकामः सत्यसङ्कल्पः’ इत्यादिना प्रतिपाद्यमानेभ्यो द्यावा- पृथिव्याद्याधारत्वलक्षणगुणेभ्यो हेतुभ्य इति निर्णीय ‘उत्तराच्चेदाविर्भूत-
यही पक्ष श्रुति, सूत्र और भाष्य आदि सम्मत है—क्योंकि समन्वया- ध्यायमें ‘दहर उत्तरेभ्यः’ इस अधिकरणमें ‘अथ यदिदमस्मिन् ब्रह्मपुरे दहरं पुण्डरीकं वेश्म०’* इत्यादि श्रुतिमें उक्त दहराकाश भूताकाश नहीं है, और जीव भी नहीं है, किन्तु परमेश्वर ही है, ‘उमे अस्मिन् द्यावापृथिवी’ (इस प्रकृत दहराकाशमें अन्तः द्युलोक और पृथ्वी स्थित हैं) ‘यावान्वा०’ (यह जितना बड़ा बाहरका भूताकाश है उतना ही बड़ा हृदयके भीतर दहराकाश है) ‘एष आत्मा०’ (आत्मा पापसम्बन्धसे रहित है, जरासे रहित है, मृत्युसे रहित है, शोकसे रहित है, भोजनेच्छासे रहित है, पिपासासे रहित है, आत्मा सत्यकाम और सत्यसङ्कल्प है) इत्यादि श्रुतिसे प्रतिपादित द्यु, पृथ्वी आदिके प्रति आश्रयत्व प्रभृति गुणरूप हेतुओंसे दहराकाशसे परमात्माका ही ग्रहण† है, ऐसा निर्णय करके
* ब्रह्मकी उपलब्धिमें हेतुभूत जो यह शरीर है उसमें छोटे आकारका जो पुण्डरीक है, उसके भीतर दहर आकाश है, यह इस श्रुतिका अर्थ है। और ‘दहर उत्तरेभ्यः’ इस सूत्रसे, दहराकाश शब्दसे परमात्मा ही लिया जायगा, किससे ? उत्तरके वाक्यशेषोंसे, इस प्रकारका जो अर्थ होता है, उसीका ही इस अग्रिम ग्रन्थसे कथन है।
† कारण कि दहराकाशशब्दसे यदि भूताकाश लिया जाय, तो उसमें सत्यसङ्कल्पत्व
| ५५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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स्वरूपस्तु' (उ० मी० अ० १ पा० ३ सू० १९) इति सूत्रान्तरेण दहरविद्यानन्तरमिन्द्रप्रजापतिसंवादे 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यादिना अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकयुक्तमात्मानमुपदेक्ष्यमुपक्षिप्य 'य एषोऽक्षिणि
'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु'‡ इस प्रकारके अन्य सूत्रसे—दहरविद्याके बादके इन्द्रप्रजापतिके संवादमें 'य आत्माऽपहतपाप्मा'× (जो आत्मा है, वह पाप-रहित है) इत्यादि श्रुतिसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त उपदेश्य आत्माका प्रस्ताव करके 'य एषोऽक्षिणि' (जो आँखमें पुरुष देखा जाता है, वही तुम्हारा
आदि गुणोंकी अनुपपत्ति होगी। यदि जीव लिया जाय, तो उसमें पृथ्वी आदि जगत्का आधारत्व नहीं आ सकता है, अतः दहराकाश परमात्मा ही है, ऐसा निर्णय होता है, यह भाव है।
‡ इस सूत्रका यह अर्थ है—उत्तरात् अर्थात् 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि उत्तरके प्रजापति-वाक्यसे अपहतपाप्मत्वादि गुणवाला जीव ही होगा, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस उत्तरवाक्यमें आविर्भूतस्वरूपवाले—अपने ब्रह्मस्वरूपको प्राप्त हुए जीवका ही कथन है, जीवत्वविशिष्ट जीवका नहीं, अतः अपहतपाप्मत्वादिविशिष्ट परमात्मस्वरूप ही है, जीव नहीं है, इससे दहराकाश जीव नहीं हो सकता, यह अर्थ है।
× इन्द्र और विरोचन प्रजापतिके पास आत्मज्ञानकी इच्छासे गये, उस समयके ये प्रजापतिके वाक्य हैं (छान्दोग्य ८-७-४) और ये वाक्य 'अपहतपाप्मा' इत्यादि वाक्यसे पूछे गये आठ गुणोंसे युक्त उपदेश्य आत्माके उत्तररूपमें कहे गये हैं, इसलिए आठ गुणोंसे युक्त आत्मा जीव ही प्रतीत होता है। यह ख्यालमें रखना चाहिए कि इस ग्रन्थका दूर तक सम्बन्ध है, इसमें पर्यायशब्द जो आये हुए हैं, उनका अर्थ—प्रकार या तरीका, अथवा एक आत्मरूप अर्थके बोधक वाक्य—करना चाहिए, अर्थात् चार प्रकारसे आत्माका बोध करानेके लिए प्रजापति द्वारा उक्त वाक्य, यह मूलग्रन्थमें 'पर्याय' शब्दका अर्थ होगा। समुदित ग्रन्थका तात्पर्य यह है कि 'य एषोऽक्षिणि' इत्यादि वाक्योंसे अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त जीव भी प्रतीत होता है, इसलिए अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण दहराकाशमें परमेश्वरके निर्णायक नहीं हो सकते हैं। यदि कथञ्चिद् कहें कि प्रजापतिके चार वाक्योंमें से प्रथम वाक्यमें जाग्रदवस्थाका बोधक कोई पद नहीं है, अतः प्रजापतिके चार पर्यायोंका तात्पर्य जीवके बोधनमें नहीं हो सकता है, इसलिए प्रजापतिके प्रथम वाक्यसे परमात्माका ही प्रतिपादन है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि प्रत्येक वाक्योंमें पहले 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका [जाग्रदादि अवस्थापन्न जीवका] फिर तुझे उपदेश करता हूँ) इस वाक्यके होनेसे प्रत्योक्त चार प्रकारके श्रुतिवाक्योंसे जीवका ही प्रतिपादन है, इस प्रकारकी आशङ्का करके इस शङ्काका समाधान करते हुए सूत्रकारने 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रसे मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलाई है।
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४३
पुरुषो दृश्यते एष आत्मा' इति जाग्रदवस्थायां द्रष्टृत्वेनाक्षिसन्निहितस्य 'य एष स्वप्ने महीयमानश्चरति एष आत्मा' इति स्वप्नावस्थापन्नस्य 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तस्सम्प्रसन्नः स्वप्नं न विजानाति एष आत्मा' इति सुषुप्त्यवस्थापन्नस्य 'एष सम्प्रसादोऽस्माच्छरीरात् समुत्थाय परं ज्योतिरुपसम्पद्य स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते स उत्तमः पुरुषः' इत्यवस्थात्रयोत्तीर्णस्य च जीवस्योपदेशाद् जीवेऽप्यस्ति अपहतपाप्मत्वादिगुणाष्टकमिति न तद् दहराकाशस्य परमेश्वरत्वनिर्णायकम्, 'य एष स्वप्ने' इत्यादिपर्यायेषु प्रतिपर्यायम् 'एतं त्वेव ते भूयोऽनु-
आत्मा है ) इस श्रुतिसे जाग्रदवस्थामें द्रष्टारूपसे अक्षिसन्निहित जीवका, 'य एष स्वप्ने०' (जो यह स्वप्नमें वनिता आदिसे पूज्यमान होकर विषयोंका अनुभव करता है, वह आत्मा है ) इत्यादि श्रुतिसे स्वप्नावस्थापन्न जीवका, 'तद्यत्रैतत्सुप्तस्समस्तः०' ( जिस कालमें यह जीव सुषुप्तिको प्राप्त होता है और इसके समस्त करणोंका समुदाय विलीन हो जाता है, तब अपने स्वरूपभूत आनन्दमें मग्न होकर स्वप्नको भी नहीं देखता है, वही आत्मा है ) इस प्रकारकी श्रुतिसे सुषुप्त्यवस्थापन्न जीवका और 'एष सम्प्रसादो०' (सुषुप्ति अवस्थासे उपलक्षित जीव शरीरसे उत्क्रमण करके देवयान मार्गको पा कर अपनी उपासनाके फलभूत ऐश्वर्यसे युक्त स्वरूपको प्राप्त करता है * ) इत्यादि श्रुतिसे अवस्थात्रयसे रहित जीवका उपदेश होनेसे जीवमें भी अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण विद्यमान हैं, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं हो सकता है, क्योंकि 'य † एष स्वप्ने०' इत्यादि पर्यायोंके प्रत्येक पर्यायमें 'एतं त्वेव भूयोऽनु-
* इस वाक्यका पूर्वपक्षकी रीतिसे ब्रह्मलोकमें गया हुआ, उपासक, जीव उत्तमपुरुष अर्थात् अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंसे युक्त होता है, यह अर्थ समझना चाहिए ।
† तात्पर्य यह है कि प्रजापतिवाक्यमें चार पर्यायोंका सर्वथा जाग्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें तात्पर्य नहीं है, क्योंकि प्रथम पर्यायमें किसी जाग्रदवस्थापन्न जीववाची पदके न होनेसे यह जाग्रदवस्थापन्न जीवका बोधक नहीं हो सकता है । इसलिए प्रथम पर्यायसे इन्द्र और विरोचन द्वारा अपहतपाप्मत्वादि गुणोंसे युक्त जिस आत्माके विषयमें प्रश्न किया जाता है, वही आत्मा निर्दिष्ट है, और वह ब्रह्म है, इसलिए प्रजापतिवाक्यमें भी आठ गुणोंसे संयुक्त ब्रह्मका ही उपदेश किया गया है, जीवका नहीं, अतः यह आशङ्का नहीं हो सकती है कि गुणाष्टक दहराकाशमें परमेश्वरत्वका निर्णायक नहीं है, इस मध्यवर्ती शङ्काका इससे परिहार करते हैं ।
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व्याख्यास्यामि' इति श्रवणेन स्फुटस्वप्नादिजीवलिङ्गानां द्वितीयादि-पर्यायाणामेव जीवविषयत्वम्, प्रथमपर्यायस्य च ब्रह्मविषयत्वमिति चोद्यानवकाशादित्याशङ्क्य तत्र चतुर्थपर्याये निरूप्यमाणः सकलबन्धविनिर्मुक्तत्वेनाऽऽविर्भूतस्वरूपो जीवः प्रतिपाद्यः । न तु सांसारिकावस्था-
व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका पुनः व्याख्यान करता हूँ) ऐसा श्रवण होनेसे—जिनमें स्वप्न आदि जीवलिङ्ग स्पष्टरूपसे प्रतीत होते हैं, ऐसे द्वितीय आदि पर्यायोंका ही जीव विषय है और प्रथम पर्यायका ब्रह्म विषय है, इस प्रकारके प्रश्नका—अवकाश नहीं है, ऐसी आशङ्का करके 'उन चार पर्यायोंमें से चतुर्थ पर्यायमें निरूप्यमाण सम्पूर्ण सांसारिक बन्धनोंसे विनिर्मुक्त अपने स्वस्वरूपमें आविर्भूत जीव ही प्रतिपाद्य है, सांसारिक अवस्थाविशेषसे कलुषित जीव प्रतिपाद्य नहीं है, क्योंकि सांसारिक आत्मामें * सत्यसङ्कल्पत्व
पूर्वपक्षीका यह भाव है कि द्वितीय आदि जो पर्यायवाक्य हैं, वे जीवपरक ही हैं, ऐसा तो निश्चित ही है। इसी प्रकार प्रथम पर्यायवाक्यका भी जीवको ही विषय मानना चाहिए, क्योंकि प्रथम पर्यायमें निर्दिष्ट आत्माका ही 'एतं त्वेव' इत्यादि वाक्यस्थित सर्वनाम 'एतत्' शब्दसे परामर्श होनेसे अर्थभेद माननेपर एतच्छब्दकी अनुपपत्ति होगी। इसीसे यह प्रश्न भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि प्रथम पर्यायकी विषयता चक्षुःस्थ प्रतिबिम्बमें है, और वह दृश्यमान भी है, क्योंकि द्वितीय पर्यायगत एतच्छब्दसे प्रथमपर्यायमें ही निर्दिष्ट अक्षिस्थ पुरुषके अमृतत्व, अभयत्व, ब्रह्मत्व आदिका कथन है, और इन सबकी प्रतिबिम्बमें उपपत्ति नहीं हो सकती है। यदि शङ्का हो कि उन गुणोंकी जीवमें भी उपपत्ति नहीं हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जाग्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें उक्त गुण यद्यपि नहीं रह सकते हैं, तथापि उन अवस्थाओंसे रहित जीवमें उक्त गुण हैं, ऐसा प्रजापतिवाक्यसे प्रतीत होता है।
* यदि शङ्का हो कि चौथे पर्यायमें भी प्रथमके तीन पर्यायोंके समान संसारी आत्माका प्रतिपादन क्यों नहीं होता है, क्योंकि चतुर्थ पर्यायमें भी 'शरीरात् समुत्थाय' इससे शरीरसे उत्क्रान्तिसे युक्त संसारीकी स्पष्टरूपसे प्रतीति होती है, तो इस शङ्काके परिहारके लिए 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रमें स्थित तुशब्दकी व्याख्या द्वारा इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि चतुर्थ पर्यायमें भी संसारी आत्माका निरूपण होगा, तो इन्द्र द्वारा पूछे गये अपहतपाप्मत्वादिगुणविशिष्ट आत्माका प्रजापतिने उपदेश नहीं किया, यही सिद्ध होगा। इससे प्रजापतिवाक्य प्रतिवचन ही नहीं होगा, इसलिए चतुर्थ पर्याय उक्त गुणोंसे युक्त मुक्त जीवपरक है, यही कहना चाहिए। यदि शङ्का हो कि पूर्वपक्षीकी उक्तिसे सगुणविद्यासे ब्रह्मलोकमें गये हुए जीवमें अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण रह सकते हैं, अतः चतुर्थ पर्याय आत्यन्तिक मुक्त जीवपरक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सगुणविद्यासे आत्यन्तिक अविद्याकी
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४५
भेदकलुषितः, तत्र सत्यसङ्कल्पत्वादिगुणबाधात् । अवस्थात्रयोपन्यासस्य तत्तदवस्थादोषाभिधानेन चतुर्थपर्यायोपदेशशेषत्वप्रतिपत्तेरिति समाधानः सूत्रकारश्चतुर्थपर्याये प्रतिपाद्यस्य मुक्तस्येश्वरभावापत्तिं स्पष्टमाह । तदभावे
आदि गुणोंका बाध है। और तीन * अवस्थाओंके बोधक तीन पर्यायोंका इसलिए उपन्यास किया गया है कि तत्-तत् अवस्थाओंके दोषोंके अभिधान द्वारा उन तीन पर्यायोंमें चतुर्थ पर्यायके उपदेशकी अङ्गत्वप्रतिपत्ति हो, इस प्रकारसे समाधान † करनेवाले सूत्रकारने चतुर्थ पर्यायमें प्रतिपाद्य मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्ट रीतिसे बतलायी है। मुक्तपुरुषकी यदि ‡ ईश्वरभावापत्ति न हो, तो मुक्तमें भी सत्यसङ्कल्पत्व
निवृत्ति न होनेसे निरङ्कुश अपहतपाप्मत्व आदि रह नहीं सकते और प्रजापतिवाक्यका निर्गुण ब्रह्ममें तात्पर्य सविस्तर बतलाया गया है, अतः निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषमें उत्क्रान्ति आदिका सम्भव नहीं है, यह भाव है। इसलिए इस तात्पर्यके अनुसार 'शरीरात् समुत्थाय' इत्यादि श्रुतिका यह अर्थ है—शरीरसे समुत्थान करके अर्थात् तीन शरीरोंसे विलक्षण त्वम्पदके लक्ष्यका निर्णय करके परब्रह्मरूप ज्योतिका साक्षात्कार कर अपने स्वरूपको प्राप्त होता है, यह भाव है।
* यदि शङ्का हो कि चतुर्थ पर्याय ही यदि जिज्ञासित आठ गुणोंसे युक्त आत्माका प्रतिपादन करता है, तो पूर्वके तीन पर्याय निरर्थक ही होंगे ? तो इस शङ्काका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं, तात्पर्य यह है कि जाग्रदवस्थामें अन्धत्व आदि दोषोंके कथनसे, स्वप्नावस्थामें रोदन आदि दोषोंके अभिधानसे और सुषुप्तिमें अपने आपका और दूसरेका ज्ञान न होना आदि दोषोंके अभिधानसे तीन अवस्थाओंसे कलुषित लोकसिद्ध जीवके स्वरूपकी हेयताके बोधन द्वारा ठीक ठीक अधिकारी जिज्ञासुके वास्तविक स्वरूपका बोध करानेके लिए चतुर्थ पर्यायकी प्रवृत्ति है, ऐसा ज्ञात होता है, अतः पूर्व पर्याय चतुर्थ पर्यायके अङ्ग हैं, ऐसा प्रतीत होता है, इसलिए पूर्व पर्याय व्यर्थ नहीं है, यह भाव है।
† अपहतपाप्मत्वादि आठ गुण दहराकाशमें नहीं रह सकते, क्योंकि प्रजापतिके वाक्यसे ये आठ गुण जीवमें भी हैं, अतः व्यभिचार होगा। इस प्रकारकी आशङ्का करके समाधान किया है कि प्रजापतिवाक्यसे मुक्त जीवमें ही आठ गुणोंका प्रतिपादन होता है, सांसारिक जीवमें नहीं, अतः उक्त आठ गुणोंकी सत्ता परमेश्वरसे अन्यत्र नहीं है, जिससे कि व्यभिचारकी शङ्का की जाय, यह भाव है।
‡ तात्पर्य यह है कि कदाचित् मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति न मानी जाय, तो बद्ध जीवके समान मुक्त जीवमें भी, जो उपाधियोंसे रहित है, सत्य-सङ्कल्पत्व आदि गुणोंका योग नहीं होगा, इस प्रजापतिवाक्यमें आठ गुणोंसे युक्त आत्माका निरूपण ही नहीं हो सकेगा, अतः
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मुक्तेऽपि सत्यसङ्कल्पत्वाद्ययोगाद्, अनुक्रान्तस्य गुणाष्टकस्य ईश्वरादन्यत्रापि भावे कृतशङ्कापरिहारालाभाच्च। तस्मिन् सूत्रे 'तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापितमपारमार्थिकं जैवं रूपं कर्तृत्वभोक्तृत्वरागद्वेषादिदोषकलुषितमने-
आदिका अयोग होगा, और यदि उपक्रममें श्रुत आठ गुणोंकी ईश्वरसे अन्यत्र भी सत्ता मानी जायगी, तो की गई शङ्काका परिहार भी नहीं हो † सकेगा। और 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रमें भाष्यकारने भी 'जीवब्रह्माभेद ही वास्तविक है' इससे अविद्याप्रयुक्त अपारमार्थिक कर्तृत्व, भोक्तृत्व, राग, द्वेष आदि दोषसे
प्रजापतिवाक्यके आधारपर ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही आठ गुणोंसे युक्त आत्माका अभिधान है, यह सूत्रकारका तात्पर्य स्पष्ट है, यह भाव है।
† तात्पर्य यह है कि यदि शङ्का की जाय कि जीव और ईश्वरका वस्तुतः भेद होनेसे मुक्त जीवमें ईश्वरतादात्म्य नहीं हो सकता, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो यह शङ्का हुई थी कि गुणाष्टकके जीवसाधारण होनेसे ईश्वरका वह असाधारण धर्म नहीं है, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशके ईश्वरत्वमें प्रमाण नहीं हो सकता है। इस शङ्काका 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रसे उस आत्माकी ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही समाधान किया गया है, उसका विरोध होगा।
इस विषयमें शङ्का होती है—मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिमें क्या प्रमाण है ? 'उत्तराच्चेत्' इस सूत्रभागसे की गई शङ्काके परिहारका अलाभ प्रमाण है, अथवा प्रजापतिवाक्य ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मुक्तका विम्बभूत ईश्वरभावापत्तिके विना यदि केवल चैतन्यरूपसे भी अवस्थान माना जाय, तो ईश्वरसे अन्यत्र सत्ताके न होनेसे उक्त आठ गुण जो केवल ईश्वरमें ही असाधारणरूपसे वर्तमान हैं, दहराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक हो सकते हैं। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि निर्गुण विद्याके प्रतिपादक प्रजापतिवाक्यमें गुणोंकी विवक्षा न होनेसे मुक्त जीवमें भी गुणाष्टकका सम्बन्ध प्रतिपादित नहीं हो सकता है। और ज्ञेय ब्रह्ममें उन गुणोंका असम्बन्ध है, ऐसा आनन्दमयाधिकरणमें भी प्रतिपादन किया गया है। इसीसे वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञेयब्रह्मप्रतिपादक वाक्योंमें अखण्डार्थता मानी जाती है, जो अखण्डार्थता संसर्गको विषय न करनेवाली प्रमितिके प्रति जनकरूप है। इसलिए प्रजापतिवाक्यके उपक्रममें सुने गये सत्यसङ्कल्पत्व आदि—बृहदारण्यकके छठे अध्यायमें सर्वेश्वरत्व आदि गुण जैसे ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए बतलाये गये हैं वैसे ही—ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए ही हैं अथवा उपलक्षणमात्र हैं, दहरविद्यामें श्रुत गुणोंके समान प्रतिपाद्य नहीं हैं, अतः भाष्यकी भी उपपत्ति हो सकती है, यह अधिक समझना चाहिए। इससे तथोक्त श्रुति, सूत्र और भाष्य मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिमें प्रमाणरूपसे नहीं दिखलाए जा सकते हैं, यह इस पक्षमें अस्वरसं है, अतः इसी अस्वरससे 'अविरोधाध्यायेऽपि' इत्यादि ग्रन्थका उपक्रम है।
मुक्तके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहितं ५४७
कानर्थयोगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणं पारमेश्वरं रूपं विद्यया प्रतिपद्यते' इति भाष्यकारोऽप्यतिस्पष्टं मुक्तस्य सगुणेश्वरभावापत्तिमाह।
ईशांशस्येशभावाप्तौ सर्वदुःखप्रसञ्जनम्।
निवारयद्भिरत्रेऽपि विभुभावप्रदर्शनात् ॥ २० ॥
यदि ईश्वरका जीवको ईश्वरभावापत्ति मानी जाय, तो ईश्वरमें भी जीवके दुःख आदिकी प्रसक्ति हो जायगी, इस पूर्वपक्षका समाधान करते हुए श्रीसूत्रकार आदिने मुक्त जीवकी विभुभूत ईश्वरभावापत्तिके स्वीकार द्वारा समाधान किया है ॥ २० ॥
अविरोधाध्यायेऽपि 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते' इत्यादिश्रुतेस्तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन तत्तत्कर्मकारयितृत्वेन च उपकार्योपकारकभावेनावगतयोर्जीवेश्वरयोर्ह्यंशिभावरूपसम्बन्धनिरूपणार्थत्वे-नावतारिते 'अंशो नानाव्यपदेशात्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३)
कलुषित जो अनेक अनर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाला जीवका स्वरूप है, उसका विलय हो जानेसे तद्विपरीत अपहतपाप्मत्वादि गुणवाले परमेश्वरस्वरूपको विद्यासे प्राप्त करता है, इस ग्रन्थसे स्पष्टरूपतया मुक्तमें सगुण ईश्वरत्व बतलाया गया है।
अविरोधाध्यायमें * 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति०' (ईश्वर जिसको ऊपरके लोकमें चढ़ाना चाहता है, उसीसे अच्छा कर्म कराता है और जिसको नीचेकी ओर ले जाना चाहता है उसीसे असत् कर्म कराता है) इस श्रुतिसे तत्-तत् कर्मोंके कर्तृत्व और तत्-तत् कर्मोंके कारयितृत्वभावसे उपकार्य और उपकारकरूपसे ज्ञात जीव और ईश्वरके अंशाशिभावरूप सम्बन्धका निर्णय करनेके लिए अवतारित † 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस अधिकरणमें भाष्यकारने भी
* अविरोधाध्यायशब्दसे ब्रह्मसूत्रका द्वितीय अध्याय लेना चाहिए, क्योंकि प्रथमाध्यायमें जिस पदार्थका निरूपण किया गया है, उसके साथ अन्य प्रमाणोंके विरोधका परिहार द्वितीयाध्यायमें ही किया गया है। इस अविरोधाध्यायमें भी समाहित शङ्काग्रन्थसे भाष्यकारने मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलायी है। इस प्रकार इस समुदित ग्रन्थका सार है यह समझना चाहिए।
† जीव ईश्वरका अंश—अवयव है, क्योंकि नानात्वका—भेदका—यत्र तत्र उपदेश—कथन—है यह इस सूत्रके इस भागका अर्थ है। सम्पूर्ण सूत्र—'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा- चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके' इतना बड़ा है।
५४८ | सिद्धांतलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद
इत्यधिकरणे 'जीवस्येश्वरांशत्वाभ्युपगमे तदीयेन संसारदुःखभोगेन ईश्वरस्यापि दुःखित्वं स्यात् । यथा लोके हस्तपादाद्यन्यतमांशगतेन दुःखेनांशिनो देवदत्तस्यापि दुःखित्वम्, तद्वत् । ततश्च तत्प्राप्तानां महत्तरं दुःखं प्राप्नुयात्, ततो वरं पूर्वावस्था संसार एवास्त्विति सम्यग्ज्ञानानर्थक्यप्रसङ्गः' इति शङ्काग्रन्थेन भामत्यादिषु स्पष्टीकृतं बिम्बप्रतिबिम्बभावकृतासङ्करमुपादाय समाहितेन भाष्यकारो मुक्तस्य ईश्वरभावापत्तिं स्पष्टीचकार ।
पराभिध्यानात् सत्यकामत्वादितिरोहितेः ।
नाशे मुक्तौ पुनस्तेषामाविर्भावस्य चेरणात् ॥ २१ ॥
ईश्वरके बार बार अभिध्यानसे—संसारदशामें जो सत्यकामत्व आदि तिरोहित धर्म हैं, उनके तिरोधानका विनाश होनेपर मुक्तिमें उन गुणोंका पुनः—आविर्भाव होता है, ऐसा साधनाध्यायमें कहा गया है, इससे भी मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति मानी गई है ॥२१॥
निम्न लिखित शङ्काग्रन्थसे, जिसका कि भामती आदि निबन्धोंमें स्पष्टरूपसे बतलाये गये बिम्बप्रतिबिम्बभावकृत असाङ्कर्यका * ग्रहण करके ही समाधान किया गया है, मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिका ही विशदीकरण किया है। भाष्यका वह शङ्काग्रन्थ इस प्रकार है—'जीवको ईश्वरका अंश माननेपर जीवके सांसारिक दुःखके उपभोगसे अंशीरूप ईश्वरको भी दुःखका उपभोग वैसे ही प्रसक्त होगा, जैसे कि लोकमें हाथ, पैर आदि किसी अंशके दुःखित होनेपर अंशी देवदत्त भी दुःखित होता है। इससे ईश्वरभावको प्राप्त हुए जीवोंको बड़ा दुःख प्रसक्त होगा, इससे ईश्वरप्राप्तिकी अपेक्षा पहलेसे अवस्थित संसार ही उचित है, इस बुद्धिसे ईश्वरप्राप्तिके उपायभूत सम्यक्ज्ञानमें कोई भी प्रवृत्त नहीं होगा, इससे सम्यक्ज्ञान निरर्थक हो जायगा ।
* भामतीमें साङ्कर्यका परिहार इस आशयसे किया गया है, अविद्यामें प्रतिबिम्ब जीव ही ईश्वरके अंशरूपसे कहे गये हैं, हाथ, पैर आदि अवयवोंके समान अवयवत्वरूपसे नहीं, वैसे ही ईश्वर भी बिम्बरूपसे अंशी कहा गया है, अवयवित्वरूपसे नहीं, प्रतिबिम्ब और बिम्बके धर्मोंका लोकमें परस्पर साङ्कर्य नहीं देखा जाता है, अतः जीवके दुःखका ईश्वरमें प्रसङ्ग नहीं है।
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४९
साधनाध्यायेऽपि 'सन्ध्ये सृष्टिराह हि' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० १) इत्यधिकरणे स्वप्नप्रपञ्चस्य मिथ्यात्वे व्यवस्थापिते तत्र मिथ्याभूते स्वप्नप्रपञ्चे जीवस्य कर्तृत्वमाशङ्क्य 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितं ततो ह्यस्य बन्धविपर्ययौ' (उ० मी० अ० ३ पा० २ सू० ५) इति सूत्रेण 'जीवस्येश्वराभिन्नत्वात् सदपि सत्यसङ्कल्पत्वादिकमविद्यादोषात्तिरोहितमिति न तस्य स्वप्नप्रपञ्चे स्रष्टृत्वं सम्भवति' इति वदन् सूत्रकारः, तत्पुनस्तिरोहितं सत् परमभिध्यायतो यतमानस्य जन्तोर्विधूतध्वान्तस्य तिमिरतिरस्कृतत्वे दृक्शक्तिरौषधवीर्यादीश्वरप्रसादात्संसिद्धस्य कस्यचिदेवाविर्भवति, न स्वभावत एव सर्वेषां जन्तूनाम्' इति तत्सूत्राभिप्रायं वर्णयन्
साधनाध्यायमें भी * 'सन्ध्ये सृष्टिराह हि' इस अधिकरणमें स्वप्नप्रपञ्चके मिथ्यात्वके व्यवस्थित होनेपर उस मिथ्याभूत स्वप्नके प्रति जीवकी कर्तृताकी आशङ्का करके † 'पराभिध्यानात् ०' ‡ इस सूत्रसे— 'जीव ईश्वरसे अभिन्न है, इसलिए यद्यपि उसमें सत्यसङ्कल्पत्व आदि विद्यमान हैं, तथापि वे अविद्यादोषसे तिरोहित हैं, इसलिए जीव स्वप्नका स्रष्टा नहीं हो सकता है'— इस प्रकार कहते हुए सूत्रकारने और 'यद्यपि वह सत्यसङ्कल्पत्व आदि तिरोहित है, तथापि परमात्माकी उपासनामें प्रयत्नशील किसी जीवविशेषको—तिमिररोगसे तिरस्कृत लोचनशक्ति औषधके प्रभावसे जैसे प्राप्त होती है, वैसे ईश्वरके प्रसादसे अविद्याके विनष्ट होनेसे सत्यसङ्कल्पत्व आदिका आविर्भाव होता है, स्वभावतः × सब प्राणियोंमें उसका आविर्भाव नहीं होता, इस
* साधनाध्यायमें अर्थात् ब्रह्मविद्याके साधनीभूत वैराग्य आदिका प्रतिपादन करनेवाले तृतीय अध्यायमें सूत्रकारने और उनके अभिप्रायका वर्णन करते हुए भाष्यकारने भी मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति बतलाई है। इस प्रकार संक्षेपमें इस समुदित ग्रन्थका भाव है। जाग्रत् और सुषुप्तिके सन्धिस्थानमें अर्थात् स्वप्नस्थानमें रथादिसृष्टि सत्य ही हो सकती है, क्योंकि 'अथ रथान्' इत्यादि श्रुति उसके सत्यत्वमें प्रमाण है, यह सूत्रका आशय है।
† कर्तृत्वकी आशङ्का करके अर्थात् जिस प्रकारसे अग्निके अंशभूत विस्फुलिङ्गमें अग्निके समान दाहकत्वशक्ति है, उसी प्रकार परमेश्वरका अंश जीव भी स्वप्न आदि सृष्टिमें प्रयोजक सत्यसङ्कल्पत्व आदि सामर्थ्ययुक्त है, अतः जीव स्वप्नसृष्टिका कर्ता हो सकता है, इस प्रकारकी आशङ्का करके, यह भाव है।
‡ इस सूत्रका तात्पर्य मूलमें ही स्पष्ट है।
× अर्थात् वैराग्य आदि साधनोंके बिना नहीं होता है, यह भाव है।
५५० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद
भाष्यकारश्च मुक्तस्य स्वमसृष्ट्याद्युपयोगिसत्यसङ्कल्पत्वाद्यभिव्यक्त्यङ्गी-
कारेण परमेश्वरभावापत्तिं स्पष्टीचकार ।
ब्राह्मचैतन्यमात्रत्वाविरोधस्य च कीर्तनात् ।
प्रतिबिम्बेशजीवैक्यवादयोर्नैतदञ्जसा ॥ २२ ॥
ब्राह्म सत्यसङ्कल्पत्वादि धर्म और चैतन्यमात्रत्व—इन दोनोंमें अविरोधका कथन होनेसे 'विम्ब ईश और प्रतिबिम्ब जीव है' यह मत ठीक है और यह अविरोध माया-प्रतिविम्व ईश है, इस मतमें और एक ही जीव है इस मतमें समञ्जस नहीं है ॥ २२ ॥
फलाध्यायेऽपि 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति मुच्यमानविषयायां श्रुतौ 'केन रूपेणाभिनिष्पत्तिर्विवक्षिता' इति बुभुत्सायाम् 'ब्राह्मेण जैमिनि-रुपन्यासादिभ्यः' ( उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ५ ) इति सूत्रेण ब्राह्मं रूपमपहतपाप्मत्वादिसत्यसङ्कल्पत्वाद्यवसानं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वादि च,
प्रकारसे सूत्रके अभिप्रायको कहते हुए भाष्यकारने भी मुक्त पुरुषकी स्वप्न-सृष्टि आदिमें उपयोगी सत्यसङ्कल्पत्व आदिकी अभिव्यक्तिके अङ्गीकारसे परमे-श्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलाई है ।
फलाध्यायमें भी * 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' ( अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है ) इस प्रकारकी मुक्त पुरुषको अवलम्बन करनेवाली श्रुतिमें 'किस स्वरूपसे अभिव्यक्ति विवक्षित है' † इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासाके होनेपर 'ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः' ‡ इस सूत्रसे जैमिनि मुनि कहते हैं—मुक्त पुरुषकी ब्राह्मरूपसे अर्थात् अपहतपाप्मत्व आदिसे लेकर सत्यसङ्कल्पत्व-पर्यन्तरूपसे और सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व आदिरूपसे अभिनिष्पत्ति होती
* फलाध्यायमें भी अर्थात् जिसमें मुक्तिरूप फलका वर्णन किया गया है, ऐसे ब्रह्मसूत्रके चतुर्थ अध्यायमें—
† क्या मुक्त पुरुष सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व आदि गुणविशिष्ट रूपोंसे अवस्थित होता है अथवा शुद्ध चिन्मात्रसे अवस्थित होता है, इस प्रकारकी विशेषजिज्ञासा होनेपर, यह भाव है ।
‡ ब्राह्मेण इत्यादि सूत्रका अर्थ है कि ब्रह्मका जो सर्वज्ञत्व आदि स्वरूप है, उस रूपसे ही मुक्त पुरुषकी अवस्थिति होती है, क्योंकि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यादि श्रुतिसे उपक्रम करके 'सोऽन्वेष्टव्यः' ( उसीकी अन्वेषणा करनी चाहिए ) इस प्रकारके उपसंहारवाक्यसे विचारका विधान किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं ।
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५१
तेनाभिनिष्पत्तिः 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्याद्युपन्यासेन 'स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा' इत्याद्यैश्वर्यावेदनेन चेति जैमिनिमतम् । 'चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ६) इत्यनन्तरसूत्रेण 'एवं वा अरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव' इत्यादिश्रुत्या 'चैतन्यमात्रमात्मस्वरूपम्' इत्यवगतेः 'तन्मात्रेणाभिनिष्पत्तिः' इति मतान्तरं चोपन्यस्य 'एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधं बादरायणः' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ७) इति सिद्धान्तसूत्रेण 'वस्तुदृष्ट्या चैतन्यमात्रत्वेऽपि पूर्वोक्तगुणकलापस्य उपन्यासाद्यवगतस्य मायामयस्य बद्धपुरुषव्यवहारदृष्ट्या सम्भवान्न श्रुतिद्वयविरोधः इति अविरोधं वदन् सूत्रकारः, सूत्रत्रयमिद-
है, क्योंकि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' (जो आत्मा है, वह पापादिसम्बन्धसे रहित है) इत्यादि उपन्यास-उद्देश्यरूप वाक्यसमुदाय है और 'स तत्र पर्येति०' (हँसता हुआ, खेलता हुआ और अनेक स्त्रियोंके साथ रमण करता हुआ वह आत्मा वहाँ जाता है) इत्यादि श्रुतिसे ऐश्वर्यका कथन भी है । चितितन्मात्रेण०'× इस उत्तरसूत्रसे—'एवं वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! जैसे लवणका पिण्ड बाहरसे और भीतरसे लवणरससे ही युक्त है, वैसे ही यह आत्मा बाहर और भीतरसे चैतन्यैकरस है) इस श्रुतिके आधारपर चैतन्यमात्रसे मुक्त आत्माकी-अवस्थिति है, ऐसा बतलाकर 'एवमप्युपन्यासात्०' * इत्यादि सिद्धान्तसूत्रसे—'परमार्थतः आत्माके चैतन्यस्वरूप होनेपर भी पूर्वोक्त गुणोंका समुदाय, जो उपन्यास आदिसे जाना गया है और मायामय है, वह आत्मामें संसारसे युक्त पुरुषकी व्यावहारिक दृष्टिसे ही हो सकता है, इसलिए उक्त दोनों श्रुतियोंमें विरोध नहीं है, इस प्रकार विरोधाभावको बतलाते हुए सूत्रकारने और
× 'चितितन्मात्रेण०' चैतन्यमात्रस्वरूपसे मुक्त पुरुष अवस्थित रहता है, ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं, यह भाव है ।
* यदि पारमार्थिक चैतन्यमात्रसे मुक्त पुरुषकी अवस्थिति मानी जाय, तो भी मुक्त आत्माके सप्रपञ्चत्व और निष्प्रपञ्चत्वमें परस्पर विरोध नहीं है, क्योंकि उपन्यास आदि हेतुओंसे सर्वज्ञत्व आदिके व्यावहारिक होनेसे चैतन्यमात्ररूपसे अवस्थितिप्रतिपादक श्रुतिके साथ और औडुलोमिके मतके समान सर्वज्ञत्वादि धर्मोंके सिद्धान्तमें तुच्छ न होनेसे गुणकलापका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ विरोध भी नहीं है, यह भाव है ।
| ५५२ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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मुक्तार्थपरत्वेन व्याकुर्वन् भाष्यकारश्च मुक्तस्येश्वरभावापत्तिं स्पष्टमनुमेने । भामतीनिबन्धप्रभृतयश्च श्रुत्युपबृंहितमिदं सूत्रजातं भगवतो भाष्यकारस्योदाहृतं वचनजातं च तथैवान्ववर्तन्त । न च श्रुत्युपबृंहितस्यैतावतः सूत्रभाष्यवचनजातस्य—
ऐश्वर्यमज्ञानतिरोहितं सद् ध्यानादभिव्यज्यत इत्यवोचत् ।
शरीरिणः सूत्रकृदस्य यत्तु तदभ्युपेत्योदितमुक्तहेतोः ॥ अ. ३ श्लो. १७५
इति संक्षेपशारीरकोक्तरीत्याऽभ्युपेत्यवादत्वं युक्तं वक्तुम् ।
तस्मान्मुक्तानामीश्वरभावापत्तेरवश्याभ्युपेयत्वादेतदसम्भव एव प्रतिबिम्बेश्वरवादे दोषः । तदाहुः कल्पतरुकाराः—'न मायाप्रतिबिम्बस्य
इन तीनों सूत्रोंकी तथोक्त अर्थोंके बोधनमें ही शक्ति है, ऐसी व्याख्या करनेवाले भाष्यकारने भी मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्ट बतलाई है । भामती आदि निबन्धकारोंने श्रुतिसे प्रमाणित उन सूत्रोंका और भगवान् भाष्यकारके उदाहृत वाक्योंका ही अनुसरण किया है । और † श्रुति प्रमाणोंसे उपबृंहित उक्त अनेक सूत्रकार और भाष्यकारके वचनोंको—'ऐश्वर्यज्ञान०' ‡ इत्यादि संक्षेपशारीरकके कथनानुसार—अभ्युपेतवाद भी नहीं मान सकते हैं ।
इससे * मुक्तोंकी ईश्वरभावापत्ति अवश्य स्वीकार्य है, अतः प्रतिबिम्बको ईश्वर माननेवालोंके पक्षमें इसका असम्भव दोष है ही । कल्पतरुकारने इसे कहा भी है—मायाप्रतिबिम्बित ईश्वरकी मुक्तों द्वारा प्राप्यता नहीं हो सकती
† यदि शङ्का हो कि ब्रह्मसूत्रोंके चार अध्यायोंके यद्यपि सूत्रोंसे और भाष्यकारके वचनोंसे मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति ज्ञात होती है तथापि संक्षेपशारीरकके वचनके साथ विरोध होता है, अतः उक्त वाक्योंमें उपचरितार्थता ही मानना युक्त है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उन सूत्रोंके जबरदस्त प्रमाण होनेके कारण संक्षेपशारीरककी उक्तिको ही गौण मानना युक्त है ।
‡ इस वचनका यह अर्थ है—सूत्रकारने जो 'पराभिध्यानात्तु' इस सूत्रसे शरीरी जीवका ऐश्वर्य, जो अज्ञानसे तिरोहित है, वह ईश्वरके स्वरूपके ध्यानसे अभिव्यक्त होता है, ऐसा कहा है, वह अभ्युपेतमवादसे अर्थात् एकदेशीरीतिसे कहा है ।
* इससे अर्थात् उक्त प्रमाणोंके आधारसे, यह भाव है ।
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५३
विमुक्तैरुपसृप्यता' इति । एतदसम्भवश्च एकजीववादपारमार्थिकजीवभेदवादयोरपि दोषः ।
जीवेशभेदसत्यत्वेऽप्येतत्सर्वमसङ्गतम् ।
न च शक्त्यन्तरं जीवे प्रमाणफलवर्जनात् ॥ २३ ॥
आसर्वमुक्ति परकल्पितसत्यकामसङ्कल्पकल्पितजगत्स्थितिभङ्गसर्गे ।
शक्तं स्वतः तु सुखचिद्घनमद्वितीयं मुक्तोपसृप्यमहमस्मि विशुद्धतत्त्वम् ॥ २४ ॥
श्रुतिकल्पलताकुञ्जसञ्जाता सूक्तिमञ्जरी ।
रम्या राद्धान्तगन्धाढ्या रञ्जयत्वखिलान् बुधान् ॥ २५ ॥
यदि जीव और ईश्वरका भेद सत्य माना जाय, तो पूर्वोक्त समाधान असङ्गत हो जायगा, और जीवमें पारमार्थिक किसी अन्य शक्तिकी कल्पना नहीं करनी चाहिए, क्योंकि उसमें प्रमाण और फल नहीं है। सम्पूर्ण जीवोंकी मुक्ति जब तक न हो तब तक अविद्यावान्पुरुषके कल्पित सत्यकाम और सत्यसंकल्पसे कल्पित जगत्की स्थिति, लय और उत्पत्ति में समर्थ और मुक्त पुरुषों द्वारा प्राप्य स्वतः चिद्धन अद्वितीय ब्रह्म मैं हूँ। श्रुतिरूप कल्पलताके कुञ्जसे उत्पन्न हुई अनेक सिद्धान्तरूपी सुगन्धिसे परिपूर्ण सुन्दर सूक्तिमञ्जरी सम्पूर्ण विद्वानोंका मनोरञ्जन करे ॥२३॥२४॥२५॥
इति श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचार्यश्रीमद्रामचन्द्रसरस्वती-
पूज्यपादशिष्यगङ्गाधरेन्द्रसरस्वत्याख्यभिक्षुविरचिता
वेदान्तसिद्धान्तसूक्तिमञ्जरी सम्पूर्णा ।
है। और * इसका असम्भव रूप दोष एकजीववाद और पारमार्थिक जीव-भेदवादमें भी है।
* एकजीववादमें मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति नहीं है, यह पहले ही बतलाया जा चुका है। और जीव एवं ईश्वरका भेद भी पारमार्थिक है, इस वादमें भी जीवकी ईश्वरभावापत्तिका असम्भव स्पष्ट ही है, किं बहुना ! जीवेश्वरका पारमार्थिक भेद माननेवालोंके मतमें जीवका शुद्ध चैतन्यस्वरूपसे अवस्थान भी नहीं बन सकता है, यह भाव है।
| ५५४ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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यत्तु कैश्चिद् द्वैतिभिरुच्यते—भेदस्य पारमार्थिकत्वेन मुक्तौ जीवस्येश्वरभावाभावेऽपि तत्रापीश्वर इव पृथगपहतपाप्मत्वादिगुणसम्भवादविरोध इति, तत्तूच्छम्, तथा सति जीवस्यापहतपाप्मत्वादिकमस्तीति न तस्य ब्रह्मलिङ्गत्वमिति शङ्कापरिहारालाभेन ‘उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु’ इति सूत्रविरोधात् । ‘ब्राह्मेण जैमिनिः’ इति सूत्रे जीवगतस्यापहतपाप्मत्वादेः, ‘उपन्यासादिभ्यः’ इत्यत्रादिशब्दार्थत्वेन परेषामप्यभिमतस्य ‘जक्षन् क्रीडन् रममाणः’ इत्यादिश्रुत्युदितस्य जक्षणादेश्च ब्राह्मत्वनिर्देशविरो-
* और कुछ द्वैतवादियोंने कहा है कि भेद पारमार्थिक है, इसलिए यद्यपि जीवका ईश्वरभाव नहीं हो सकता है, तथापि मुक्त जीवमें ईश्वरके समान अलग अपहतपाप्मत्व आदि गुणोंकी अवस्थिति हो सकती है, अतः कोई विरोध नहीं है, परन्तु यह पक्ष अत्यन्त तुच्छ है, क्योंकि ऐसा माननेपर जीवमें अपहतपाप्मत्व आदि गुण रह सकते हैं, इसलिए वह गुणाष्टक ब्रह्मका बोध करानेमें लिङ्ग नहीं हो सकेगा, अतः शङ्काके समाधानका † लाभ न होनेके कारण ‘उत्तराच्चेत्’ इत्यादि सूत्रके साथ विरोध होगा, तथा ‘ब्राह्मेण जैमिनिः’ इस सूत्रमें जीवगत अपहतपाप्मत्व आदिकी और ‘उपन्यासादिभ्यः’ इसमें स्थित आदिशब्दके अर्थरूपसे दूसरों का भी अभिमत ‘जक्षन् क्रीडन्’ इत्यादि श्रुतिमें कथित जक्षण आदिकी ब्रह्मसम्बन्धिताका निर्देश भी विरुद्ध होगा। जीव और ब्रह्मके भेदपक्षमें
* अब इस ग्रन्थसे यह बतलाना चाहते हैं कि सिद्धान्तीने कहा है कि मुक्त पुरुषोंके अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण ईश्वरभावापत्ति के बिना नहीं हो सकते हैं, अतः मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति कहनी चाहिए, और पारमार्थिक जीवेश्वरभेदवादमें मुक्त पुरुषको लेकर कहे गये उक्त आठ गुणोंकी उपपत्ति नहीं हो सकती है, परन्तु इस विषयमें जीवेश्वरभेदका अवलम्बन करनेवाले कुछ लोग कहते हैं कि पारमार्थिक भेदवादमें भी श्रुति और सूत्रोंसे निरूपित आठ गुण ईश्वरभावापत्तिके बिना भी रह सकते हैं, इस मतके परिहारके लिए उक्त भेदवादियोंका अनुवाद करके खण्डन करते हैं।
† तात्पर्यार्थ यह है कि यदि ईश्वरमें रहनेवाले अपहतपाप्मत्व आदि की अपेक्षा जीवमें अलग ही अपहतपाप्मत्व आदि गुण माने जायें, तो ‘उत्तराच्चेत्’ इस सूत्रके अंशसे पूर्वमें जो शङ्का की गई थी—उसका ‘आविर्भूतस्वरूपस्तु’ इस अंशसे परिहार किया गया है, इस परिहार-भागसे यदि मुक्त जीवमें आठ गुणोंका आविर्भाव माना जाय, तो भी ठीकठीक परिहार नहीं होगा, क्योंकि मुक्त और ब्रह्मके भेदपक्षमें उक्त गुण जीवसाधारण होंगे, इससे ब्रह्मसाधारणत्वरूप ब्रह्म-लिङ्गकी प्राप्ति न होनेके कारण दहराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक आठ गुण नहीं होंगे, यह भाव है।
मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहितं ५५५
धाच्च । भेदे तेषां गुणानां सत्यत्वेन 'चितितन्मात्रेण' इति सूत्रोक्तस्य मुक्तजीवानां चैतन्यमात्रत्वस्य 'एवमपि' इति सिद्धान्तसूत्रेऽङ्गीकारविरोधाच्च, 'सम्पद्याविर्भावः' इत्यधिकरणविरोधाच्च । तत्र हि 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति श्रुतौ आगन्तुना केनचिद्रूपेणाभिनिष्पत्तिर्नोच्यते स्वेनशब्दवैयर्थ्यापत्तेः । येन रूपेण आगन्तुना स्वयमभिनिष्पद्यते तस्यात्मीयत्वस्याऽवक्तव्यत्वात् । तस्मादात्मवाचिश्वशब्दोपादानाद् नित्यसिद्धेन स्वस्वरूपेणैवाभिनिष्पत्तिर्विवक्षिता, न तु केनचिद्धर्मेणेति व्यवस्थापितम् ।
किञ्चेदमपहतपाप्मत्वादि जीवस्य मुक्तावागन्तुकं चेत्, 'सम्पद्याविर्भावः' इति मुक्तावागन्तुक रूपनिषेधेन 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इत्यपहतपाप्मत्वादेर्बन्धमुक्तयोस्तिरोभावा-
उन गुणोंके सत्य होनेसे 'चितितन्मात्रेण' इस सूत्रमें कथित मुक्त जीवोंके चैतन्यमात्रत्वका जो 'एवमपि' इत्यादि सूत्रमें अङ्गीकार किया गया है, वह विरुद्ध होगा और सम्पद्याविर्भावः' * इस अधिकरणके साथ भी विरोध होगा, क्योंकि सम्पद्याधिकरणमें आगन्तुक किसी धर्मसे अभिनिष्पत्ति नहीं कही जा सकती है, क्योंकि वैसा माननेसे 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इस श्रुतिमें उक्त स्वेनशब्दके साथ विरोध होगा, कारण कि जिस आगन्तुक स्वरूपसे अपने आप अभिव्यक्त होता है, उसमें आत्मीयत्व नहीं रह सकता, इससे आत्माके वाचक स्वशब्दका श्रुतिमें उपादान होनेसे नित्यसिद्ध स्वरूपसे ही अभिनिष्पत्ति विवक्षित है, आगन्तुक किसी धर्मसे नहीं, ऐसा व्यवस्थापन किया गया है ।
किञ्च, यदि अपहतपाप्मत्व आदि धर्म मुक्तिमें जीवके आगन्तुक माने जायेंगे तो 'सम्पद्याविर्भावः' इससे मुक्तिमें आगन्तुक धर्मोंके निषेधसे 'पराभिध्यानात्तु तिरोहितम्' 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इत्यादि सूत्रोंसे अपहतपाप्मत्वादिका बन्ध और मुक्तिमें क्रमशः तिरोभाव और आविर्भावके
* किञ्च, अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण मुक्तिमें उत्पन्न होते हैं अथवा स्वतःसिद्ध ही हैं, इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पके समाधानपूर्वक द्वितीयका इस ग्रन्थसे एक प्रकारसे शेष रखते हैं, यह भाव है ।
५५६ | सिद्धान्तलेशसंग्रहे | [ चतुर्थ परिच्छेद
विर्भावप्रतिपादनेन च विरोधः स्यादिति नित्यसिद्धं वाच्यमिति बन्धस्य मिथ्यात्वं दुर्वारम्, नित्यसिद्धमपहतपाप्मत्वं हि सर्वदा पाप्मरहितत्वम् । न च वस्तुतः सर्वदा पाप्मरहिते पाप्मसम्बन्धः, तन्मूलककर्तृत्वभोक्तृत्वसम्बन्धो वा पारमार्थिकः सम्भवति । एवं च जीवस्येश्वराभेदोऽपि दुर्वारः, श्रुतिबोध्यतदभेदविरोधिबन्धस्य सत्यत्वाभावात् । अन्यथा संसारिणि नित्यसिद्धसत्यसङ्कल्पतिरोधानोक्त्ययोगाच्च । नहि जीवस्य संसारदशायाम-
प्रतिपादनसे विरोध होगा, इससे अपहतपाप्मत्व आदिको नित्यसिद्ध मानना चाहिए, इससे बन्धका मिथ्यात्व दुर्वार है । क्योंकि नित्यसिद्ध अपहतपाप्मत्व—सर्वदा पाप्मसम्बन्धसे रहितत्वरूप ही है । अतः वास्तविक पापसम्बन्धसे जो रहित है, उसमें पापका सम्बन्ध हो ही नहीं सकता है, तथा पापसम्बन्धमूलक कर्तृत्व, भोक्तृत्व आदिके सम्बन्ध भी नहीं रह सकते । बन्धके मिथ्या होनेपर जीवका ईश्वरके साथ अभेद भी दुर्वार है, क्योंकि * श्रुतिसे बोधित ब्रह्माभेदका विरोधी संसार सत्य नहीं हो सकता है। यदि संसारके मिथ्यात्वका अङ्गीकार न करके जीव और ब्रह्मका अभेद न माना जाय, तो नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्व आदिका तिरोधान जो ‘पराभिध्यानात्’ इत्यादि सूत्रमें सूत्रकारने कहा है, वह अयुक्त हो जायगा, क्योंकि अन्य लोग भी जीवकी संसारदशामें एकाध अर्थको विषय करनेवाला एक
* यदि यहांपर शङ्का हो कि संसारके मिथ्यात्वके प्रतिपादनसे क्या लाभ है, क्योंकि उसके क्षय होनेपर भी जीव और ब्रह्मका अभेद बोधित हो सकता है । इस प्रकारके भास्करके मतको लेकर कहते हैं कि संसारको सत्य माननेपर परमात्मामें रहनेवाले नित्यमुक्तत्वका भी सत्यत्वरूपसे ही अङ्गीकार करना चाहिए, इससे परमार्थस्वरुप विरुद्ध धर्मोंसे आक्रान्त जीव और ब्रह्मका अग्नि और हिमके समान श्रुतिसे बोधित अभेद हो ही नहीं सकता है ।
† यदि शङ्का हो कि तिरोधानका प्रयोग कैसे हो सकता है ? तो इसपर कहना चाहिए कि जीवमें रहनेवाले नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्वका तिरोधान ‘पराभिध्यानात्तु०’ इत्यादि सूत्रसे कहा जाता है। अथवा ईश्वरगत सत्यसङ्कल्पत्वका जीवके प्रति तिरोधान उक्त सूत्रसे कहा जाता है। इस प्रकारके दो विकल्प करके प्रथम विकल्पका इस ग्रन्थसे परिहार करते हैं, तात्पर्य यह है कि पूर्वपक्षी साधारण अर्थको विषय करनेवाले एक सत्यसङ्कल्पको भी तिरोहित नहीं मानता है, तो सब धर्मोंको विषय करनेवाले सत्यसङ्कल्पको कैसे मानेगा ?
मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहिते ५५७
नुवर्तमानो यत्किञ्चिदर्थगोचरः कश्चिदस्त्यवितथसंकल्पस्तिरोहित इति परैरपीष्यते । किन्त्वीश्वरस्य यन्नित्यसिद्धं निरवग्रहं सत्यसङ्कल्पत्वम्, तदेव जीवस्य संसारदशायामीश्वराभेदानभिव्यक्त्या स्वकीयत्वेनाऽनवभासमानं तं प्रति तिरोहितमित्येव समर्थनीयमिति घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्तः ।
नन्वपहतपाप्मत्वं न पाप्मविरहः, किन्तु पाप्महेतुकर्माचरणेऽपि पापोत्पत्तिप्रतिबन्धकशक्तियोगित्वमिति न तस्य नित्यसिद्धत्वेन बन्धस्य मिथ्यात्वप्रसङ्गः । एवं सत्यसङ्कल्पत्वमपि शक्तिरूपेण निर्वायमिति
सत्यसङ्कल्प तिरोहित है, ऐसा यदि नहीं मानते हैं, तो सर्वार्थको विषय करनेवाला सत्यसङ्कल्प तिरोहित है, ऐसा कैसे मान सकते हैं ? किन्तु ‡ ईश्वरका निरवद्य जो नित्यसिद्ध सत्यसङ्कल्पत्व है, उसीका, जीवकी संसारदशामें ईश्वरके साथ अभेदकी अनभिव्यक्तिसे अपने प्रति स्वसम्बन्धित्वेन अनवभासमान होकर उसके प्रति, तिरोधान होता है, ऐसा समर्थन करना होगा, इससे घट्टकुटीप्रभातवृत्तान्त ही प्रसक्त होगा ।
यदि शङ्का हो कि* पापसम्बन्धसे रहितत्व अपहतपाप्मत्व नहीं है, किन्तु पापके हेतुभूत कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धक-शक्तिसम्बन्धितारूप है, इसलिए उसके नित्यसिद्ध होनेपर भी संसारमें मिथ्यात्वकी प्रसक्ति नहीं हो सकती, इसी प्रकार शक्तिरूपसे† सत्यसङ्कल्पत्वकी भी व्याख्या करनी चाहिए, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि उस प्रकारके
‡ यदि द्वितीय विकल्पका अङ्गीकार किया जाय, तो आखिरमें सिद्धान्तीका ही पक्ष मानना होगा, इससे पारमार्थिक भेद नहीं मान सकते हैं, यह भाव है ।
* इस ग्रन्थसे भेदवादी यह शङ्का करता है कि अपहतपाप्मत्वका परिष्कार हम ऐसा करते हैं कि जिससे संसार वास्तविक माना जाय, तो भी अपहतपाप्मत्वके साथ विरोध नहीं है ।
† क्लिद्य, निषिद्ध कर्मोंका आचरण करनेपर भी पापकी उत्पत्तिमें प्रतिबन्धकरूप जिस शक्तिकी तुम अपहतपाप्मशब्दके अर्थरूपसे कल्पना करते हो, उसकी क्या इसलिए कल्पना करते हो कि विद्याके उदयके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो, अथवा विद्याके बाद ? तुम्हारे मतमें होनेवाली मुक्तिके पूर्वमें पापका प्रतिबन्ध हो अथवा तुम्हारे मतके अनुसार मुक्तिके कालमें देह आदिके रहनेके कारण कदाचित् पापके हेतुभूत निषिद्ध कर्मोंका आचरण हो सकता है, अतः उसका प्रतिबन्ध हो ? इस प्रकारके तीन विकल्पोंका मनमें निश्चय करके क्रमशः इस ग्रन्थसे उन विकल्पोंका परिहार करते हैं ।
| ५५८ | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद |
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नेश्वरभेदप्रसङ्ग इति चेत्, मैवम् ; एवं शब्दार्थकल्पने प्रमाणाभावात् । नहि पापजननप्रतिबन्धिका शक्तिः संसाररूपपरिभ्रमणदशायां पापानुत्पत्त्यर्थं कल्पनीया, तदानीं तदुत्पत्तेरिष्टत्वात् । विद्योदयप्रभृति तु विद्यामाहात्म्यादेवाऽश्लेपः 'तदधिगम उत्तरपूर्वाघयोरश्लेपविनाशौ तद्व्यपदेशात्' ( उ० मी० अ० ४ पा० १ सू० १३ ) इति सूत्रेण दर्शितः । तत एव मुक्तावप्यश्लेप उपपद्यत इति व्यर्था शक्तिकल्पना । तस्मादुदाहृतश्रुतिसूत्रानुसारिभिर्मुक्तजीवानां यावत्सर्वमुक्ति वस्तुसच्चैतन्यमात्रत्वाविरोधिवद्धपुरुषाविद्याकृतनिरवग्रहैश्वर्यतदनुगुणगुणकलापविशिष्टनिरतिशयानन्दस्फुरण- समृद्धनिस्सन्धिबन्धपरमेश्वरभावापत्तिरादर्त्तव्येति सिद्धम् ॥ ५ ॥
विद्वद्गुरोर्विहितविश्वजिदध्वरस्य
श्रीसर्वतोमुखमहाव्रतयाजिसूनोः ।
अपहतपाप्मत्वका अर्थ करनेमें कोई प्रमाण नहीं है, क्योंकि * पापोत्पत्तिमें प्रतिबन्धक शक्तिकी संसाररूपके विद्यमानत्वकालमें पापके अनुत्पादके लिए कल्पना नहीं कर सकते हैं, कारण कि उस कालमें पापकी उत्पत्ति इष्ट ही है । और विद्याके उदित होनेपर तो विद्याके प्रभावसे ही पापका सम्बन्ध नहीं रहेगा, यह 'तदधिगम०' इत्यादि सूत्रसे स्पष्ट बतलाया गया है, इसीसे मुक्तिमें भी पापका असम्बन्ध हो सकता है, इसलिए शक्तिकी कल्पना व्यर्थ है । इससे उदाहृत श्रुति और सूत्रोंका अनुसरण करनेवालेको यह माननां चाहिए कि जब तक सब जीवोंकी मुक्ति न हो जाय, तब तक मुक्त जीवोंकी — वस्तुसत् चैतन्यमात्रत्वका विरोध न करनेवाले बद्ध पुरुषकी अविद्यासे सम्पादित निरवग्रह ऐश्वर्य और इस ऐश्वर्यके अनुकूल गुणसमूहसे युक्त निरतिशयानन्दके स्फुरणसे समृद्ध — परमेश्वरभावापत्ति है ॥५॥
अनेक विद्वानोंके गुरु, विश्वजित् आदि अनेक याग करनेवाले, श्रीसर्वतोमुखमहाव्रतयाजी आचार्य दीक्षितसे उत्पन्न, भगवान् शङ्करजीके परमभक्त श्रीरङ्ग-
* तत्त्वसाक्षात्कारके प्राप्त होनेसे विद्याके पूर्वकालमें रहनेवाले पापका विनाश होता है और विद्याके उत्तरकालमें होनेवाले पापसे भी सम्बन्ध नहीं होता है, क्योंकि विद्यासे पूर्वोत्तर पापोंका नाश होता है, श्रुति, स्मृति आदि प्रमाणोंसे सिद्ध है, यह 'तदधिगमे' इत्यादि सूत्रका अर्थ है।
मुक्तिके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५९
श्रीरङ्गराजमखिनः श्रितचन्द्रमौले-
रस्त्यप्पदीक्षित इति प्रथितस्तनूजः ॥१॥
तन्त्राण्यधीत्य सकलानि सदाऽव्यदात-
व्याख्यानकौशलकलाविशदीकृतानि ।
आम्नायमूलमनुरुध्य च सम्प्रदायम्
सिद्धान्तभेदलवसङ्ग्रहमित्यकार्षीत् ॥२॥
सिद्धान्तरीतिषु मया भ्रमदूषितेन
स्यादन्यथाऽपि लिखितं यदि किञ्चिदस्य
संशोधने सहृदयाः सदया भवन्तु
सत्सम्प्रदायपरिशीलननिर्विशङ्काः ॥३॥
॥ इति पदवाक्यप्रमाणपारावारपारीणसर्वतन्त्रस्वतन्त्रश्रीमदप्पदीक्षितविरचिते
शास्त्रसिद्धान्तलेशसङ्ग्रहे चतुर्थः परिच्छेदः ॥
राजाध्वरीके पुत्र प्रसिद्ध विद्वान् अप्पदीक्षितने व्याख्यानकी कुशलकलाओंसे विस्तारित अनेक शास्त्रोंका अध्ययन कर और सदा वेदानुसारी सम्प्रदायका अनुसरण करके अद्वैतवेदान्तसिद्धान्तके पृथक्-पृथक् स्वरूपोंका संक्षेपसे संग्रह किया है ॥ १–२ ॥
यदि भ्रमवश सिद्धान्तोंकी रीतियोंमें मेरे द्वारा कुछ हेर-फेर हो गया हो, तो परिशुद्धसम्प्रदायके परिशीलनसे सन्देहरहित सहृदय पुरुष उसको शोधने की दया करें ॥ ३ ॥
श्रीसिद्धान्तलेशके वेदान्ताचार्यश्रीपं०मूलशङ्करव्यास-विरचित भाषानुवादमें चतुर्थ परिच्छेदका भाषानुवाद समाप्त॥