भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५५१


तेनाभिनिष्पत्तिः 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्याद्युपन्यासेन 'स तत्र पर्येति जक्षन् क्रीडन् रममाणः स्त्रीभिर्वा यानैर्वा' इत्याद्यैश्वर्यावेदनेन चेति जैमिनिमतम् । 'चितितन्मात्रेण तदात्मकत्वादित्यौडुलोमिः' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ६) इत्यनन्तरसूत्रेण 'एवं वा अरेऽयमात्माऽनन्तरोऽबाह्यः कृत्स्नः प्रज्ञानघन एव' इत्यादिश्रुत्या 'चैतन्यमात्रमात्मस्वरूपम्' इत्यवगतेः 'तन्मात्रेणाभिनिष्पत्तिः' इति मतान्तरं चोपन्यस्य 'एवमप्युपन्यासात्पूर्वभावादविरोधं बादरायणः' (उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ७) इति सिद्धान्तसूत्रेण 'वस्तुदृष्ट्या चैतन्यमात्रत्वेऽपि पूर्वोक्तगुणकलापस्य उपन्यासाद्यवगतस्य मायामयस्य बद्धपुरुषव्यवहारदृष्ट्या सम्भवान्न श्रुतिद्वयविरोधः इति अविरोधं वदन् सूत्रकारः, सूत्रत्रयमिद-


है, क्योंकि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' (जो आत्मा है, वह पापादिसम्बन्धसे रहित है) इत्यादि उपन्यास-उद्देश्यरूप वाक्यसमुदाय है और 'स तत्र पर्येति०' (हँसता हुआ, खेलता हुआ और अनेक स्त्रियोंके साथ रमण करता हुआ वह आत्मा वहाँ जाता है) इत्यादि श्रुतिसे ऐश्वर्यका कथन भी है । चितितन्मात्रेण०'× इस उत्तरसूत्रसे—'एवं वा अरे०' (हे मैत्रेयि ! जैसे लवणका पिण्ड बाहरसे और भीतरसे लवणरससे ही युक्त है, वैसे ही यह आत्मा बाहर और भीतरसे चैतन्यैकरस है) इस श्रुतिके आधारपर चैतन्यमात्रसे मुक्त आत्माकी-अवस्थिति है, ऐसा बतलाकर 'एवमप्युपन्यासात्०' * इत्यादि सिद्धान्तसूत्रसे—'परमार्थतः आत्माके चैतन्यस्वरूप होनेपर भी पूर्वोक्त गुणोंका समुदाय, जो उपन्यास आदिसे जाना गया है और मायामय है, वह आत्मामें संसारसे युक्त पुरुषकी व्यावहारिक दृष्टिसे ही हो सकता है, इसलिए उक्त दोनों श्रुतियोंमें विरोध नहीं है, इस प्रकार विरोधाभावको बतलाते हुए सूत्रकारने और


× 'चितितन्मात्रेण०' चैतन्यमात्रस्वरूपसे मुक्त पुरुष अवस्थित रहता है, ऐसा औडुलोमि आचार्य मानते हैं, यह भाव है ।

* यदि पारमार्थिक चैतन्यमात्रसे मुक्त पुरुषकी अवस्थिति मानी जाय, तो भी मुक्त आत्माके सप्रपञ्चत्व और निष्प्रपञ्चत्वमें परस्पर विरोध नहीं है, क्योंकि उपन्यास आदि हेतुओंसे सर्वज्ञत्व आदिके व्यावहारिक होनेसे चैतन्यमात्ररूपसे अवस्थितिप्रतिपादक श्रुतिके साथ और औडुलोमिके मतके समान सर्वज्ञत्वादि धर्मोंके सिद्धान्तमें तुच्छ न होनेसे गुणकलापका प्रतिपादन करनेवाली श्रुतिके साथ विरोध भी नहीं है, यह भाव है ।

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