सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें५५० | सिद्धान्तलेशसंग्रह | [ चतुर्थ परिच्छेद
भाष्यकारश्च मुक्तस्य स्वमसृष्ट्याद्युपयोगिसत्यसङ्कल्पत्वाद्यभिव्यक्त्यङ्गी-
कारेण परमेश्वरभावापत्तिं स्पष्टीचकार ।
ब्राह्मचैतन्यमात्रत्वाविरोधस्य च कीर्तनात् ।
प्रतिबिम्बेशजीवैक्यवादयोर्नैतदञ्जसा ॥ २२ ॥
ब्राह्म सत्यसङ्कल्पत्वादि धर्म और चैतन्यमात्रत्व—इन दोनोंमें अविरोधका कथन होनेसे 'विम्ब ईश और प्रतिबिम्ब जीव है' यह मत ठीक है और यह अविरोध माया-प्रतिविम्व ईश है, इस मतमें और एक ही जीव है इस मतमें समञ्जस नहीं है ॥ २२ ॥
फलाध्यायेऽपि 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' इति मुच्यमानविषयायां श्रुतौ 'केन रूपेणाभिनिष्पत्तिर्विवक्षिता' इति बुभुत्सायाम् 'ब्राह्मेण जैमिनि-रुपन्यासादिभ्यः' ( उ० मी० अ० ४ पा० ४ सू० ५ ) इति सूत्रेण ब्राह्मं रूपमपहतपाप्मत्वादिसत्यसङ्कल्पत्वाद्यवसानं सर्वज्ञत्वसर्वेश्वरत्वादि च,
प्रकारसे सूत्रके अभिप्रायको कहते हुए भाष्यकारने भी मुक्त पुरुषकी स्वप्न-सृष्टि आदिमें उपयोगी सत्यसङ्कल्पत्व आदिकी अभिव्यक्तिके अङ्गीकारसे परमे-श्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलाई है ।
फलाध्यायमें भी * 'स्वेन रूपेणाभिनिष्पद्यते' ( अपने स्वरूपसे अभिव्यक्त होता है ) इस प्रकारकी मुक्त पुरुषको अवलम्बन करनेवाली श्रुतिमें 'किस स्वरूपसे अभिव्यक्ति विवक्षित है' † इस प्रकारकी विशेष जिज्ञासाके होनेपर 'ब्राह्मेण जैमिनिरुपन्यासादिभ्यः' ‡ इस सूत्रसे जैमिनि मुनि कहते हैं—मुक्त पुरुषकी ब्राह्मरूपसे अर्थात् अपहतपाप्मत्व आदिसे लेकर सत्यसङ्कल्पत्व-पर्यन्तरूपसे और सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व आदिरूपसे अभिनिष्पत्ति होती
* फलाध्यायमें भी अर्थात् जिसमें मुक्तिरूप फलका वर्णन किया गया है, ऐसे ब्रह्मसूत्रके चतुर्थ अध्यायमें—
† क्या मुक्त पुरुष सर्वज्ञत्व, सर्वेश्वरत्व आदि गुणविशिष्ट रूपोंसे अवस्थित होता है अथवा शुद्ध चिन्मात्रसे अवस्थित होता है, इस प्रकारकी विशेषजिज्ञासा होनेपर, यह भाव है ।
‡ ब्राह्मेण इत्यादि सूत्रका अर्थ है कि ब्रह्मका जो सर्वज्ञत्व आदि स्वरूप है, उस रूपसे ही मुक्त पुरुषकी अवस्थिति होती है, क्योंकि 'य आत्माऽपहतपाप्मा' इत्यादि श्रुतिसे उपक्रम करके 'सोऽन्वेष्टव्यः' ( उसीकी अन्वेषणा करनी चाहिए ) इस प्रकारके उपसंहारवाक्यसे विचारका विधान किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य मानते हैं ।