भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 576
५४६सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

मुक्तेऽपि सत्यसङ्कल्पत्वाद्ययोगाद्, अनुक्रान्तस्य गुणाष्टकस्य ईश्वरादन्यत्रापि भावे कृतशङ्कापरिहारालाभाच्च। तस्मिन् सूत्रे 'तस्मादविद्याप्रत्युपस्थापितमपारमार्थिकं जैवं रूपं कर्तृत्वभोक्तृत्वरागद्वेषादिदोषकलुषितमने-

आदिका अयोग होगा, और यदि उपक्रममें श्रुत आठ गुणोंकी ईश्वरसे अन्यत्र भी सत्ता मानी जायगी, तो की गई शङ्काका परिहार भी नहीं हो † सकेगा। और 'उत्तराच्चेदाविर्भूतस्वरूपस्तु' इस सूत्रमें भाष्यकारने भी 'जीवब्रह्माभेद ही वास्तविक है' इससे अविद्याप्रयुक्त अपारमार्थिक कर्तृत्व, भोक्तृत्व, राग, द्वेष आदि दोषसे


प्रजापतिवाक्यके आधारपर ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही आठ गुणोंसे युक्त आत्माका अभिधान है, यह सूत्रकारका तात्पर्य स्पष्ट है, यह भाव है।

† तात्पर्य यह है कि यदि शङ्का की जाय कि जीव और ईश्वरका वस्तुतः भेद होनेसे मुक्त जीवमें ईश्वरतादात्म्य नहीं हो सकता, तो यह युक्त नहीं है, क्योंकि जो यह शङ्का हुई थी कि गुणाष्टकके जीवसाधारण होनेसे ईश्वरका वह असाधारण धर्म नहीं है, अतः वह गुणाष्टक दहराकाशके ईश्वरत्वमें प्रमाण नहीं हो सकता है। इस शङ्काका 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रसे उस आत्माकी ईश्वरभावापत्ति द्वारा ही समाधान किया गया है, उसका विरोध होगा।

इस विषयमें शङ्का होती है—मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिमें क्या प्रमाण है ? 'उत्तराच्चेत्' इस सूत्रभागसे की गई शङ्काके परिहारका अलाभ प्रमाण है, अथवा प्रजापतिवाक्य ? प्रथम पक्ष युक्त नहीं है, क्योंकि मुक्तका विम्बभूत ईश्वरभावापत्तिके विना यदि केवल चैतन्यरूपसे भी अवस्थान माना जाय, तो ईश्वरसे अन्यत्र सत्ताके न होनेसे उक्त आठ गुण जो केवल ईश्वरमें ही असाधारणरूपसे वर्तमान हैं, दहराकाशमें ईश्वरत्वके निर्णायक हो सकते हैं। द्वितीय पक्ष भी युक्त नहीं है, क्योंकि निर्गुण विद्याके प्रतिपादक प्रजापतिवाक्यमें गुणोंकी विवक्षा न होनेसे मुक्त जीवमें भी गुणाष्टकका सम्बन्ध प्रतिपादित नहीं हो सकता है। और ज्ञेय ब्रह्ममें उन गुणोंका असम्बन्ध है, ऐसा आनन्दमयाधिकरणमें भी प्रतिपादन किया गया है। इसीसे वेदान्तसिद्धान्तमें ज्ञेयब्रह्मप्रतिपादक वाक्योंमें अखण्डार्थता मानी जाती है, जो अखण्डार्थता संसर्गको विषय न करनेवाली प्रमितिके प्रति जनकरूप है। इसलिए प्रजापतिवाक्यके उपक्रममें सुने गये सत्यसङ्कल्पत्व आदि—बृहदारण्यकके छठे अध्यायमें सर्वेश्वरत्व आदि गुण जैसे ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए बतलाये गये हैं वैसे ही—ब्रह्मकी प्रशंसाके लिए ही हैं अथवा उपलक्षणमात्र हैं, दहरविद्यामें श्रुत गुणोंके समान प्रतिपाद्य नहीं हैं, अतः भाष्यकी भी उपपत्ति हो सकती है, यह अधिक समझना चाहिए। इससे तथोक्त श्रुति, सूत्र और भाष्य मुक्तकी ईश्वरभावापत्तिमें प्रमाणरूपसे नहीं दिखलाए जा सकते हैं, यह इस पक्षमें अस्वरसं है, अतः इसी अस्वरससे 'अविरोधाध्यायेऽपि' इत्यादि ग्रन्थका उपक्रम है।

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