भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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पृष्ठ 575

मुक्तके स्वरूपका विचार ] भाषानुवादसहित ५४५

भेदकलुषितः, तत्र सत्यसङ्कल्पत्वादिगुणबाधात् । अवस्थात्रयोपन्यासस्य तत्तदवस्थादोषाभिधानेन चतुर्थपर्यायोपदेशशेषत्वप्रतिपत्तेरिति समाधानः सूत्रकारश्चतुर्थपर्याये प्रतिपाद्यस्य मुक्तस्येश्वरभावापत्तिं स्पष्टमाह । तदभावे

आदि गुणोंका बाध है। और तीन * अवस्थाओंके बोधक तीन पर्यायोंका इसलिए उपन्यास किया गया है कि तत्-तत् अवस्थाओंके दोषोंके अभिधान द्वारा उन तीन पर्यायोंमें चतुर्थ पर्यायके उपदेशकी अङ्गत्वप्रतिपत्ति हो, इस प्रकारसे समाधान † करनेवाले सूत्रकारने चतुर्थ पर्यायमें प्रतिपाद्य मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्ट रीतिसे बतलायी है। मुक्तपुरुषकी यदि ‡ ईश्वरभावापत्ति न हो, तो मुक्तमें भी सत्यसङ्कल्पत्व


निवृत्ति न होनेसे निरङ्कुश अपहतपाप्मत्व आदि रह नहीं सकते और प्रजापतिवाक्यका निर्गुण ब्रह्ममें तात्पर्य सविस्तर बतलाया गया है, अतः निर्गुण ब्रह्मको जाननेवाले पुरुषमें उत्क्रान्ति आदिका सम्भव नहीं है, यह भाव है। इसलिए इस तात्पर्यके अनुसार 'शरीरात् समुत्थाय' इत्यादि श्रुतिका यह अर्थ है—शरीरसे समुत्थान करके अर्थात् तीन शरीरोंसे विलक्षण त्वम्पदके लक्ष्यका निर्णय करके परब्रह्मरूप ज्योतिका साक्षात्कार कर अपने स्वरूपको प्राप्त होता है, यह भाव है।

* यदि शङ्का हो कि चतुर्थ पर्याय ही यदि जिज्ञासित आठ गुणोंसे युक्त आत्माका प्रतिपादन करता है, तो पूर्वके तीन पर्याय निरर्थक ही होंगे ? तो इस शङ्काका परिहार इस ग्रन्थसे करते हैं, तात्पर्य यह है कि जाग्रदवस्थामें अन्धत्व आदि दोषोंके कथनसे, स्वप्नावस्थामें रोदन आदि दोषोंके अभिधानसे और सुषुप्तिमें अपने आपका और दूसरेका ज्ञान न होना आदि दोषोंके अभिधानसे तीन अवस्थाओंसे कलुषित लोकसिद्ध जीवके स्वरूपकी हेयताके बोधन द्वारा ठीक ठीक अधिकारी जिज्ञासुके वास्तविक स्वरूपका बोध करानेके लिए चतुर्थ पर्यायकी प्रवृत्ति है, ऐसा ज्ञात होता है, अतः पूर्व पर्याय चतुर्थ पर्यायके अङ्ग हैं, ऐसा प्रतीत होता है, इसलिए पूर्व पर्याय व्यर्थ नहीं है, यह भाव है।

† अपहतपाप्मत्वादि आठ गुण दहराकाशमें नहीं रह सकते, क्योंकि प्रजापतिके वाक्यसे ये आठ गुण जीवमें भी हैं, अतः व्यभिचार होगा। इस प्रकारकी आशङ्का करके समाधान किया है कि प्रजापतिवाक्यसे मुक्त जीवमें ही आठ गुणोंका प्रतिपादन होता है, सांसारिक जीवमें नहीं, अतः उक्त आठ गुणोंकी सत्ता परमेश्वरसे अन्यत्र नहीं है, जिससे कि व्यभिचारकी शङ्का की जाय, यह भाव है।

‡ तात्पर्य यह है कि कदाचित् मुक्त पुरुषकी ईश्वरभावापत्ति न मानी जाय, तो बद्ध जीवके समान मुक्त जीवमें भी, जो उपाधियोंसे रहित है, सत्य-सङ्कल्पत्व आदि गुणोंका योग नहीं होगा, इस प्रजापतिवाक्यमें आठ गुणोंसे युक्त आत्माका निरूपण ही नहीं हो सकेगा, अतः

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