भारतकोश
सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

पृष्ठ 574, कुल 590 में से

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पृष्ठ 574
५४४सिद्धान्तलेशसंग्रह[ चतुर्थ परिच्छेद

व्याख्यास्यामि' इति श्रवणेन स्फुटस्वप्नादिजीवलिङ्गानां द्वितीयादि-पर्यायाणामेव जीवविषयत्वम्, प्रथमपर्यायस्य च ब्रह्मविषयत्वमिति चोद्यानवकाशादित्याशङ्क्य तत्र चतुर्थपर्याये निरूप्यमाणः सकलबन्धविनिर्मुक्तत्वेनाऽऽविर्भूतस्वरूपो जीवः प्रतिपाद्यः । न तु सांसारिकावस्था-

व्याख्यास्यामि' (इसी आत्माका पुनः व्याख्यान करता हूँ) ऐसा श्रवण होनेसे—जिनमें स्वप्न आदि जीवलिङ्ग स्पष्टरूपसे प्रतीत होते हैं, ऐसे द्वितीय आदि पर्यायोंका ही जीव विषय है और प्रथम पर्यायका ब्रह्म विषय है, इस प्रकारके प्रश्नका—अवकाश नहीं है, ऐसी आशङ्का करके 'उन चार पर्यायोंमें से चतुर्थ पर्यायमें निरूप्यमाण सम्पूर्ण सांसारिक बन्धनोंसे विनिर्मुक्त अपने स्वस्वरूपमें आविर्भूत जीव ही प्रतिपाद्य है, सांसारिक अवस्थाविशेषसे कलुषित जीव प्रतिपाद्य नहीं है, क्योंकि सांसारिक आत्मामें * सत्यसङ्कल्पत्व


पूर्वपक्षीका यह भाव है कि द्वितीय आदि जो पर्यायवाक्य हैं, वे जीवपरक ही हैं, ऐसा तो निश्चित ही है। इसी प्रकार प्रथम पर्यायवाक्यका भी जीवको ही विषय मानना चाहिए, क्योंकि प्रथम पर्यायमें निर्दिष्ट आत्माका ही 'एतं त्वेव' इत्यादि वाक्यस्थित सर्वनाम 'एतत्' शब्दसे परामर्श होनेसे अर्थभेद माननेपर एतच्छब्दकी अनुपपत्ति होगी। इसीसे यह प्रश्न भी निरस्त हुआ समझना चाहिए कि प्रथम पर्यायकी विषयता चक्षुःस्थ प्रतिबिम्बमें है, और वह दृश्यमान भी है, क्योंकि द्वितीय पर्यायगत एतच्छब्दसे प्रथमपर्यायमें ही निर्दिष्ट अक्षिस्थ पुरुषके अमृतत्व, अभयत्व, ब्रह्मत्व आदिका कथन है, और इन सबकी प्रतिबिम्बमें उपपत्ति नहीं हो सकती है। यदि शङ्का हो कि उन गुणोंकी जीवमें भी उपपत्ति नहीं हो सकती है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि जाग्रद् आदि अवस्थापन्न जीवमें उक्त गुण यद्यपि नहीं रह सकते हैं, तथापि उन अवस्थाओंसे रहित जीवमें उक्त गुण हैं, ऐसा प्रजापतिवाक्यसे प्रतीत होता है।

* यदि शङ्का हो कि चौथे पर्यायमें भी प्रथमके तीन पर्यायोंके समान संसारी आत्माका प्रतिपादन क्यों नहीं होता है, क्योंकि चतुर्थ पर्यायमें भी 'शरीरात् समुत्थाय' इससे शरीरसे उत्क्रान्तिसे युक्त संसारीकी स्पष्टरूपसे प्रतीति होती है, तो इस शङ्काके परिहारके लिए 'उत्तराच्चेत्' इत्यादि सूत्रमें स्थित तुशब्दकी व्याख्या द्वारा इस ग्रन्थसे उत्तर देते हैं। तात्पर्य यह है कि यदि चतुर्थ पर्यायमें भी संसारी आत्माका निरूपण होगा, तो इन्द्र द्वारा पूछे गये अपहतपाप्मत्वादिगुणविशिष्ट आत्माका प्रजापतिने उपदेश नहीं किया, यही सिद्ध होगा। इससे प्रजापतिवाक्य प्रतिवचन ही नहीं होगा, इसलिए चतुर्थ पर्याय उक्त गुणोंसे युक्त मुक्त जीवपरक है, यही कहना चाहिए। यदि शङ्का हो कि पूर्वपक्षीकी उक्तिसे सगुणविद्यासे ब्रह्मलोकमें गये हुए जीवमें अपहतपाप्मत्व आदि आठ गुण रह सकते हैं, अतः चतुर्थ पर्याय आत्यन्तिक मुक्त जीवपरक नहीं है, तो यह भी युक्त नहीं है, क्योंकि सगुणविद्यासे आत्यन्तिक अविद्याकी

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