सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)
Siddhanta Lesha Sangraha Hindi
श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा
स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)
पृष्ठ 577, कुल 590 में से
संदर्भ में पढ़ेंमुक्तके स्वरूपका विचार] भाषानुवादसहितं ५४७
कानर्थयोगि तद्विलयनेन तद्विपरीतमपहतपाप्मत्वादिगुणं पारमेश्वरं रूपं विद्यया प्रतिपद्यते' इति भाष्यकारोऽप्यतिस्पष्टं मुक्तस्य सगुणेश्वरभावापत्तिमाह।
ईशांशस्येशभावाप्तौ सर्वदुःखप्रसञ्जनम्।
निवारयद्भिरत्रेऽपि विभुभावप्रदर्शनात् ॥ २० ॥
यदि ईश्वरका जीवको ईश्वरभावापत्ति मानी जाय, तो ईश्वरमें भी जीवके दुःख आदिकी प्रसक्ति हो जायगी, इस पूर्वपक्षका समाधान करते हुए श्रीसूत्रकार आदिने मुक्त जीवकी विभुभूत ईश्वरभावापत्तिके स्वीकार द्वारा समाधान किया है ॥ २० ॥
अविरोधाध्यायेऽपि 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषत एष उ एवासाधु कर्म कारयति तं यमधो निनीषते' इत्यादिश्रुतेस्तत्तत्कर्मकर्तृत्वेन तत्तत्कर्मकारयितृत्वेन च उपकार्योपकारकभावेनावगतयोर्जीवेश्वरयोर्ह्यंशिभावरूपसम्बन्धनिरूपणार्थत्वे-नावतारिते 'अंशो नानाव्यपदेशात्' (उ० मी० अ० २ पा० ३ सू० ४३)
कलुषित जो अनेक अनर्थोंसे सम्बन्ध रखनेवाला जीवका स्वरूप है, उसका विलय हो जानेसे तद्विपरीत अपहतपाप्मत्वादि गुणवाले परमेश्वरस्वरूपको विद्यासे प्राप्त करता है, इस ग्रन्थसे स्पष्टरूपतया मुक्तमें सगुण ईश्वरत्व बतलाया गया है।
अविरोधाध्यायमें * 'एष ह्येव साधु कर्म कारयति०' (ईश्वर जिसको ऊपरके लोकमें चढ़ाना चाहता है, उसीसे अच्छा कर्म कराता है और जिसको नीचेकी ओर ले जाना चाहता है उसीसे असत् कर्म कराता है) इस श्रुतिसे तत्-तत् कर्मोंके कर्तृत्व और तत्-तत् कर्मोंके कारयितृत्वभावसे उपकार्य और उपकारकरूपसे ज्ञात जीव और ईश्वरके अंशाशिभावरूप सम्बन्धका निर्णय करनेके लिए अवतारित † 'अंशो नानाव्यपदेशात्' इस अधिकरणमें भाष्यकारने भी
* अविरोधाध्यायशब्दसे ब्रह्मसूत्रका द्वितीय अध्याय लेना चाहिए, क्योंकि प्रथमाध्यायमें जिस पदार्थका निरूपण किया गया है, उसके साथ अन्य प्रमाणोंके विरोधका परिहार द्वितीयाध्यायमें ही किया गया है। इस अविरोधाध्यायमें भी समाहित शङ्काग्रन्थसे भाष्यकारने मुक्तकी ईश्वरभावापत्ति स्पष्टरूपसे बतलायी है। इस प्रकार इस समुदित ग्रन्थका सार है यह समझना चाहिए।
† जीव ईश्वरका अंश—अवयव है, क्योंकि नानात्वका—भेदका—यत्र तत्र उपदेश—कथन—है यह इस सूत्रके इस भागका अर्थ है। सम्पूर्ण सूत्र—'अंशो नानाव्यपदेशादन्यथा- चापि दाशकितवादित्वमधीयत एके' इतना बड़ा है।