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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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है, वहाँ पर उसका अर्थ होता है—दृश्यते—यथार्थरूपतया ज्ञायते अलौकि- कार्थो येन, इस व्युत्पत्तिसे ठीक-ठीकरूपसे अलौकिक अर्थका (लौकिकचक्षु आदि प्रमाणोंसे ज्ञात नहीं होनेवाले अर्थका) परिज्ञान जिससे होता हो— ऐसा शास्त्र।

दर्शनशास्त्रोंके सामान्यरूपसे पहले दो विभाग किये जा सकते हैं—आस्तिकदर्शन और नास्तिकदर्शन। आस्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं, जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार करके पारलौकिक अर्थका निरूपण किया गया हो। और नास्तिकदर्शन उन्हें कहते हैं—जिनमें वेदोंके प्रामाण्यका अङ्गीकार न करके केवल युक्तिसे अर्थका प्रतिपादन किया गया हो। इस प्रकारसे सामान्यतः द्विधा विभक्त दर्शनशास्त्रोंका पुनः इस प्रकार अवान्तर विभाग किया गया है—आस्तिकदर्शन-शास्त्रोंके फिर तीन विभाग हैं—न्याय, सांख्य और मीमांसा। न्यायशब्दसे गौतम और कणाद महर्षि द्वारा प्रणीत न्याय और वैशेषिक, ये दो शास्त्र विवक्षित हैं। साङ्ख्यशब्दसे कपिल और पतञ्जलि द्वारा लोकमें आविर्भूत सांख्य और योग शास्त्र विवक्षित हैं। मीमांसाशब्दसे जैमिनि और भगवान् वेदव्यास द्वारा प्रणीत पूर्वमीमांसा और उत्तरमीमांसा विवक्षित हैं। इसीलिए व्यवहार होता है कि आस्तिकदर्शन छः प्रकारके हैं।

इसी रीतिसे नास्तिकदर्शनोंके भी पहले पहले चार्वाक, बौद्ध और जैन इस प्रकार तीन विभाग करनेके बाद विनेयोंकी (शिष्योंकी) बुद्धिके अनुसार विभक्त माध्यमिक, योगाचार, सौत्रान्तिक और वैभाषिकके भेदसे बौद्धदर्शनके चतुर्विध होनेसे वे भी छः प्रकारके हैं। यद्यपि दर्शनशास्त्रके अन्य भी अवान्तर भेद हैं, तथापि मुख्यरूपसे उनकी गणना न होनेके कारण व्यावहारिक प्रसिद्धि नहीं है।

वेदप्रामाण्यवादी समुदायकी दृष्टिसे नास्तिकदर्शनोंमें परमपुरुषार्थ- प्रयोजकता विवादास्पद है, क्योंकि किसी खास * प्रमाणविशेषका अनङ्गीकार।


येनोपदिश्येत शास्त्रं शास्त्रविदो विदुः ॥ अर्थात् हितसाधनोंमें प्रवृत्ति और अहितसाधनोंसे निवृत्ति जिससे बोधित होती हो, उसे शास्त्र कहा जाता है।

* अर्थात् सर्वप्रमाणाधिराज अपौरुषेय वेदवाक्योंके आधारके बिना ही केवल यौक्तिक बलके आधारपर नास्तिकमतावलम्बियोंका विचार प्रस्तुत हुआ है, अतः युक्ति अप्रतिष्ठित

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