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सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

सिद्धान्तलेशसंग्रह (अप्पय्य दीक्षित - हिन्दी अनुवाद व व्याख्या)

Siddhanta Lesha Sangraha Hindi

श्रीमदप्पय्य दीक्षित द्वारा

स्रोत: Siddhanta Lesha Sangraha of Appayya Dikshita with Hindi Bhashya (उद्गम)

DevanagariHindipublished590 पृष्ठ

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करके केवल यौक्तिकवादका ही उनमें अङ्गीकार किया गया है । वेदविरुद्ध युक्तिके अप्रतिष्ठित होनेके कारण यथार्थरूपसे तत्त्वविनिश्चय उनसे नहीं हो सकता । यद्यपि इस विषयमें सत्प्रतिपक्ष हो सकता है कि आस्तिकदर्शनशास्त्रोंमें मोक्षोपयुक्तमार्गमदर्शकत्व नहीं है और नास्तिकदर्शनोंमें है । तथापि उभयदर्शनज्ञ प्रेक्षावान् पुरुषकी विचार-कसौटीमें कसे जानेके बाद नास्तिकदर्शन ही उक्तार्थमें पूतिकूष्माण्डीकृत प्रतीत होते हैं, अतः उक्त सत्प्रतिपक्ष प्रेक्षावत्पुरुषश्रद्धेय नहीं हो सकता है ।

आस्तिक और नास्तिक दर्शनोंका परस्पर भेद जिस-जिस अंशमें है, उसे संक्षेपसे बतलाना प्रकृतमें अनुपयुक्त नहीं होगा, अतः उसको दिखाते हैं—

न्यायशास्त्र

न्यायशास्त्रके मूल रचयिता महर्षि गौतम हैं । उन्होंने सोलह पदार्थ माने हैं—प्रमाण, प्रमेय, संशय, प्रयोजन, दृष्टान्त, सिद्धान्त, अवयव, तर्क, निर्णय, वाद, जल्प, वितण्डा, हेत्वाभास, छल, जाति और निग्रहस्थान * । इनके मतमें चार प्रमाण हैं—प्रत्यक्ष, अनुमान, उपमान और शब्द । इन सोलह पदार्थोंके तत्त्वज्ञानसे अनात्मभूत देह आदिमें आत्माकी जो मिथ्याज्ञानरूप भ्रान्ति है, उसकी निवृत्ति होती है और उससे राग † आदि दोषोंकी निवृत्ति होती है । दोषोंकी निवृत्तिसे शुभाशुभकर्मकी निवृत्ति, इससे निमित्तके अभावसे नैमित्तिक अनेक योनियोंमें जन्मकी निवृत्ति, और इससे गर्भावाससे लेकर मरण तकके सम्पूर्ण दुःखोंकी निवृत्तिरूप मुक्ति होती है ।

वैशेषिकशास्त्र

वैशेषिक दर्शनके रचयिता कणाद मुनि हैं । इनके मतमें छः पदार्थ हैं—


होनेसे तदुदितविचार निरतिशयसुखपथप्रदर्शक नहीं हो सकते हैं । और पुरुषबुद्धिके भेदविभ्रमादिदोषविप्रलम्भाक्रान्त होनेके कारण भी उनका तत्त्वप्रतिपादन अवश्य भ्रान्त हो सकता है । अपौरुषेय वेदवाक्योंके निरस्तसमस्तदोषमूलक होनेके कारण उनमें ऐसी सम्भावना नहीं हो सकती है, ऐसा आस्तिकोंका तात्पर्य है ।

* इन पदार्थोंका प्रतिपादन करनेवाला गौतमका यह प्रथम सूत्र है—प्रमाणप्रमेयसंशयप्रयोजनदृष्टान्तसिद्धान्तावयवतर्कनिर्णयवादजल्पवितण्डाहेत्वाभासच्छलजातिनिग्रहस्थानानां तत्त्वज्ञानान्निःश्रेयसाधिगमः [ गौ० सूत्र १ प्र० आ० १ सू० १ ] ।

† दुःख-जन्म-प्रवृत्ति-दोष-मिथ्याज्ञानानामुत्तरोत्तरापाये तदनन्तरापायादपवर्गः, यह सूत्र इसमें प्रमाण है ।

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