सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ें( ३६ ) सिंहासनबत्तीसी.
बंदा पार लगावे, यह सुनकर राजा वहांसे धाया और आकर उस दरियामें कूद पडा, जाकर एक हाथमे रंडी और दूसरे हाथमें लड़केको पकडलिया, वह मर्दभी राजासे लिपटगया, तब राजा घबराया और आपभी डूबने लगा. इतनेमें ईश्वरको याद किया और कहा कि—हे नाथ! मैं धर्मके वास्ते आया था और इसमें मेरा जीवनभी जाता है, धर्म करते अधर्म होवेगा. राजा यह कहकर बहुत जोर करने लगा, और उस बखत जोर उसका कुछ काम न आया. तब उसने आगिया और कोयला दोनों बीरोंको याद किया, याद करतेही दोनों बीर आकर हाजिर हुए और चारोंको उठा किनारेपर रख दिया. तब वह विदेशी राजाके पांवोंपर गिरपड़ा और बोला कि, महाराज ! तुमने हम तीनोंको जीवदान दिया, तुम्हीं हमारे भगवान् हो; क्योंकि जीवदान इस वक्त तुमसे पाया राजा हाथ पकड़कर उन तीनोंको रंगमहलमें ले आया, और बिठाकर कहा, जो तुम्हें चाहिये सो माँगो तब वह बोला—महाराज ! हमको हुक्म करो तो हम घरको जायें, और जबतलक जियेंगे तबतलक आपको आशिष दिया करेंगे. ऐसाही कुछ तुमने हमें दिया है. तब राजाने अपनी तरफसे लाख रुपये देकर उनको घर भिजवा दिया. इतनी बात कहकर पुतली फिर बोली- राजा, इतने लायक जो तुम हो तो इस सिंहासनपर बैठो, नहीं