सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
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संदर्भ में पढ़ेंचौथी पुतली ४ ( ३७ )
तो तमाम लोग हँसेंगे, यह अहवाल सुनतेही यहभी मुहूर्त राजाका टलगया. दूसरे दिन फिर राजा दिलमे सोच करता हुआ सिंहासन- पर बैठनेको आया. तब चंद्रकला नामवाली—
चौथी पुतली-
बोली:—सुनो राजा ! तुम मन मलीन क्यों बैठे हो ? और सुनो जो मैं कथा कहूं. एकरोज एक पंडित कहींसे फिरते फिरते राजा बीर विक्रमादित्यके पास आया. और उसने आकर बयान किया कि जो कोई एक महल मेरे कहे मुआफिक बनाके घरे, चैन उठावे. और बडा नाम पावे. तब राजाने कहा, अच्छा जाहिर करो. ब्राह्मण कहने लगा-तुला लग्न जब आवे तो उसमे मंदिर उठावे, जबतलक वह लग्न रहे तब तलक काम जारी रक्खे. और जब तुला लग्न होचुके तब उसका काम मौकूफ करे. इसी तरह तुला लग्नहीमें वह सारा मकान तैयार कर राखे तो उसका अटूट भंडार होजावे. और लक्ष्मी उसके यहांसे कभी न जाय. यह सुनकर राजा मनमें खुश हुआ. और दीवानको बुलाकर मन्दिर उठानेकी इजाजत, दी, कि—तुम अच्छी जगह ढूंढकर महल बनाओ. इतनेमें तुला लग्नभी आन पहुंचा. उस मंदिरके नींवकी देश देशमें यह हवाई हुई कि राजा बिक्रम तुला लग्न साधकर महल बनाता है. जितने कारीगर उसमें काम करतेथे वे उठकर तुला लग्न