भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

पृष्ठ 66, कुल 190 में से

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आठवी पुतली ८ ( ६३ ) यह बात बुद्धिबाहर है. राजाने कहा अचरज नहीं. भगवान्‌को सब शक्ति है और वह क्या क्या नहीं करता ? ये बातें कर रात ऐशमें काटी और प्रभात होतेही उन कंगूरोसे एक लाल गिरा. दोनोंने यह तमाशा देखा तब राजाने कहा कि, चंचले ! अब यहां ठहरना उचित नहीं. बेहतर यह है कि, मेरे देशको चलो. यह बात राजाकी सुनकर वह बोली-सुनो महाराज ! एक मेरी अधीनी मैं पांव पडकर जो आपको कहतीहू सो सुनो महाराज ! आप बडे दानी हो. ऐसा दानी आजतक नहीं सुना ऐसा न हो कि, किसीको मुझे दान करदो. मैं दासी होकर आपकी हरव- खत सेवा करूंगी. तब राजा बोला-कि, यह नहीं होसक्ता कि, कोई अपनी नारी परपुरुषको देय यह काम तो धर्मविरुद्ध है और लोकविरुद्ध हे. इस तरह उसकी खातिर जमा कर दोनों बीरोंको बुलाया. वे आकर हाजिर हुए. उन्होंसे कहा कि, जल्दी हमारे देशको ले चलो. वे बीर उन दोनोंको तख्तपर बिठा हवाकी तरह लेकर उडे, वे तो यों अपने शहरकी तरफ गये. और योगी जो यहां आया और उस सुन्दरीको न पाया, तब पछता पछता मनमार मुंझाय रहा निदान राजा अपने नग- रके पास आया और सिंहासनमे उतर उस राजकन्याका हाथ पकड शहरको लेचला. रास्तेमें उसने देखा कि, किसीका एक खूबसूरत लडका दरवाजेपर खेल रहा है. राजास्त्रीके दायें

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