भारतकोश
सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)

पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा

स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)

DevanagariHindipublished190 पृष्ठ

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( ६४ ) सिंहासनबत्तीसी. कमलका फूल देखकर वह लडका रोने लगा. और विकल विकल बोला कि, मैं यह फूल लूंगा तब राजाने कमल रानीके हाथसे ले लडकेको दिया. लडका फल ले हंसता हुआ अपने घरमें गया. राजाभी अपने मंदिरमें जा विराजमान हुआ. जब सुबह हुआ तब उस कमलके फूलमेंसे एक लाल गिरा, लडकेके बापने उसे देख उठा लिया. और कमलको छिपा रक्खा. इसी रंगसे हररोज लाल निकलने लगे कि, एक दिन कितनेक लाल वह लेकर बाजारमें बेचनेको गया वह खबर कोतवालको हुई, तब कोतवालने उसे पकडवा मंगवाया और पूंछा कि-तू बनि- या हे और तूने इतने लाल कहां पाये ? तब वो कहने लगा कि, ये हमारेही घरके हैं. पर उसकी बात न सुन उसे बहुतसी सियासत कर लाल लेकर राजाके पास आया. और सब वह अहवाल बताया. तब राजाने कहा कि-उसको मिलादो. और उसे पूछा कि, तूने ये लाल कहां पाये ? राजाने उसे कहा कि, जो तू सच मुझसे कहेगा तो मैं तुझे औरभी दौलत दूंगा और झूठ कहेगा तो देशसे निकाल दूंगा. उसने अर्ज की सुनो भूपाल ! द्वार खेलता था मेरा बल, उसके हाथमें कोई कम- लका फूल दे गया. और उसने आन मुझे दिया. मैने रातभर उसे अपने पास रखलिया. सुबह होतेही उसमेंसे एक लाल गिरा और अब हररोज एक एक लाल योंही निकलता है. और