सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका)
पारम्परिक / लल्लू जी लाल द्वारा
स्रोत: सिंहासन बत्तीसी (द्वात्रिंशत्पुत्तलिका) · बृजवल्लभ हरिप्रसाद जी · 1920 (उद्गम)
कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! तू ऐसा साहस न
( १८६ ) सिंहासनबत्तीसी.
और बिदा किया, ये धन ले ले अपने घरको गये. इतनी बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! तू ऐसा साहस न कर सकेगा, इसवास्ते इस सिंहासनके योग्य न होगा. इससे जाकर अपना राज कर और यह मनका खयाल छोड़ दे. यह सुन राजा चुप होकर वहासे उठ अपने मकानमें दाखिल हुआ. वह साअत और वह दिनभी टल गया. अब राजा भोज वहांसे अपने मंदिरमें जा रातको सोचमें काटा. दूसरे दिन सुबह होतेही सिंहासनके पास आकर खड़ा हुआ. और अपने मनमें यों बिचार करने लगा कि, मैं इस सिंहासनपर बैठने न पाया. और बिना स्वार्थही जन्म गँवाया. सब देश देश यह खबर हो चुकी कि, राजा भोज राजा बीर विक्रमादित्यके सिंहा सनपर बैठने लगा सो बैठना मेरा न हुआ. यह बात सुनकर सब लोग हंसेंगे और गंधर्व गालियां देंगे और मेरे कुलको कलंक लगा. यह अपने जीमें सोचकर राजा नीची गरदन किये सिंहासनके पास जाकर खड़ा हुआ. फिर अपने जीमें विचारता कि, एक मा वह थी कि, जिसका विक्रम जैसा पुत्र था और मैं हूं जो कुलको कलंक लगाया. और अपने मनमें जो सूबा किया सो तो बन न आया. ऐसी ऐसी बातें राजा बिचार बिचार चिंता करता था. और कुछ जीमें तरंग थी. और कुछ क्रोध आता था कि इतनेमें झुँझलाकर जल्दी हा कि, सिंहासनके ऊपर बैठे. इतनेमे कौशल्या नामक-
इकतीसवीं पुतली ३१ ( १८७
इकतीसवीं पुतली ३१ ( १८७ इकतीसावीं पुतली- बोली-कि, सुन राजा भोज ! तू बडा मूर्ख है कि, हमारा कहा नही मानता और साहसको तू सहजकर जा-- नता है. कंचनकी बराबरी पीतल नहीं कर सकता और हीरेके बराबर सीसा नहीं होता. और चंदनके गुणको नीम नहीं पाता. इससे तू हजार बेर अपने जीमें मनसूबा किया कर लेकिन राजा बीर विक्रमादित्यके बराबर तू नहीं हो सकता और इस सिंहासनपर बैठते हुए तुझे शर्म नहीं आती ? इतनी बात उस पुतलीकी सुनतेही राजा भोज अपने जीमे बहुतसा लजाया और राजाने अपना जतिव धिकार कर माना. फिर इतनी बात कह पुतलीने कहा कि, सुन राजा भोज ! मैं एक दिन की बात राजा वीरविक्रमादित्यकी तेरे आगे कहती हूं सो तू मन लगा कर सुन. हे राजा भोज ! जब राजा बीरविक्रमादित्यके मरनेके दिन बहुत नजदीक आ गये तब राजाको मालूम हुआ और मालूम करके नगरके बाई और गंगातीरपर एक मंदिर बनवाया जब वह मंदिर बनचुका तब आपभी वही जा उसमें रहने लगा. और तमाम मुलकमें ढंढोरा पिटवा दिया कि, जो कोई दान लिया चाहे सो यहां आकर ले जावे. और जितने ब्राम्हण, पंडित, भाट, भिकारी राजाके पास आये तिन्होंने मुंह मांगा दान राजा वीर विक्रमा- दित्यसे पाया यह खबर देवताओके जा मालूम पढी तब बहुतसे देवता स्वरूप बदल दान लेनेका बहाना कर राजाका सत देखनेके
१८८ ) सिंहासनबत्तीसी. लिये वहां आय. और आ आकर जो जो जिसके जीमें आया सो सो उसके पास मांगने लगे. और राजानेभी सबोका मांगा पदार्थ दिया. जब दान ले चुके तब राजाके सामने खडे हो आशीश दे कहने लगे कि, धन्य है राजा विक्रम, तेरे तईं और धन्य है तेरे मातापिताको तूने ऐसा शक बांधा कि तीनों लोकोंमें तेरी निशानी रहेगी. सत्य युगमें जैसा सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र, और त्रेतामें जैसा दानी राजा बलि हुवा, और द्वापरमें जैसा राजा युधिष्ठिर हुआ तैसा कलियुगमें तू राजा वीर विक्रमादित्य है. जैसे चारों युगोंमें तुम धर्मात्मा राजा हुए तैसे ओर न हुए न होंगे. इस तरह राजासे कह देवता तो बिदा होगये. इतनी बात कह पुतली बोली कि, सुन राजा भोज ! देवता तो सब बिदा हो गये. और राजा जाकर झरोखेमें बैठा. इतनेमें एक राजाको किसी ऋषिने शाप दियाथा सो सोनेका हिरन बनकर राजा वीर विक्रमादित्यके सोही आया. राजाने देखतेही उसको मारनेके धनुष्य और तीर उठाय. राजाने चाहा बाण मारैं. इतनेमें हिरन बोला कि, मैं जन्मका ब्राह्मण हूं. मारे भूखके दिन रात फिरता हूं, सिद्धसे मैंने अपनी मांग थी. सो उसने मुझे शाप हिरन किया .फिर मैंने उस सिद्धसे कहा कि, महाराज ? मुझे हिरन तो बनाया है पर मेरी गति आगे किस तरहसे होगी सो मुझे बता दो. उस ऋषिने मुझसे कहा कि, कलि-
इकतीसवीं पुतली ३१. ( १८९
इकतीसवीं पुतली ३१. ( १८९
गमें राजा बीर विक्रमादित्य बडा दाता और साहसी होगा उसका जब तू जाकर दर्शन करेगा तब तेरी इस देहसे मुक्ति होगी. इस लिये मैं तेरे दर्शनको आया हूं. राजाने उस हिर- नकी ऐसी बात सुनकर हँसा और उस हिरनने उसी समयही अपने शरीरका त्याग किया. राजाने उस हिरनको जलाकर गंगामें वहा दिया. और बहुतसे उसके नाम यज्ञ किये. इतनी बात कह पुतली बोली सुन राजा भोज ! ब उसके बराबर न्यौंवर हो सकता हैं. और तू अपने जीसे यह बात दूरकर और इस सिंहासनको लेकर अभी तुर्त गढवा दे जहांसे लाया हैं वहां पहुचा दे. इतनी बात पुतलीकी सुन राजा भोज अपने जीमें सोचने लगा और जबाब कुछ बन न आया और निपट निराश हो अपने मंदिरमें आया. वह दिन इस तरह गुजर गया और राजा अपने मकानमें आ रात तो उसी चिंतामें बिताई. सवेरे हुए मनमें वैराग्य लिया और सब काम तुछ मानकर फिर उस जगह जा उस सिंहासनके पास खडा हुआ और चढनेको पांव उठाया तब भानुमती--
बत्तीसवीं पुतली-
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बत्तीसवीं पुतली-
बोली -सुन राजा भोज एक कथा मेरी सुन और अंत कथा तुझसे बुझाकर कहताहूं सो तू अपना मन लगाकर सुन कि, जब मय राजा बीर विक्रमादित्यका आया तब विमानपर बैठे इंद्रलोकको गया और अंबावती नगरीमें शोक हुआ तीनों लोकोंमें हंगामा मचा कि, राजा बीर विक्रमादि- काल होकर वह सदेहस्वर्ग गया. इसवक्त आ- और फोयका ये दोनो बीरभी राजाहीके साथ लोप हो न वह स्वामी रहा न ये दास रहे. संसारमेंसे धर्मकी उखड गई और सब रैयत राजाके राजकी कूक मार रोने लगी. ब्राह्मण भाट, भिखारी, राँड दुःखी सब हाय मारके रोने लगे कि, हमारा आदर करनेवाला और मान रखनेवाला राजा जगत्मेंसे उठ गया. रानियां तो राजाके साथ सती हुईं और जितने दास दासी थे सो सब अनाथ हो गये और जितने लोग नौकर, चाकर, सिपाही, शागिर्द पेश थे सो सब रोते थे और कहते थे कि, हाय ! हममेंसे कोई काम न आया इसी तरह महा खलबली राजके राज भरमें हो रहीथी. मंत्रीने राजकुँवर जैतपालको राजतिलक दे गद्दीपर बिठाया और तमाम मुल्कोंमें राजा जैतपालके नामका ढंढोरा फेर दिया. जब जैतपाल राजा हुआ तब वह एक दिन इस सिंहासनपर
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बैठा. इतनेमें मूर्च्छा आई और मूर्च्छा आतेही वह बेसुध हुआ और एकदम एक स्वप्न देखा. इस स्वप्नमें राजा वीर विक्रमा- दित्यने उसे मना किया कि, इस सिंहासनपर मत बैठ. जो मेरा सहस और दान करे तो इस सिंहासनपर बैठना. इतनेमें राजा जैतपालकी आंख खुलगई और सावधान हो उस सिंहासनसे नीचे उतर बैठा और मंत्रीको बुला अपने स्वप्नका अहवाल कहा. वह बोला कि, महाराज ! इस आसनपर बैठना तो आपको उचित नहीं. और एक बात मैं आपसे कहता हूं सो आप कीजिये. कि आज रातको पवित्र हो भूमिमें बिछौना बिछवा और राजाका ध्यान करके कहिये कि, महाराज ! जो जो मुझ आज्ञा हो उसी माफ़क मैं करूं. यह कामना करके रातको सोइये. इसमें जैसा जबाब कामनाका मिलेगा तैसाही कीजिये. जो दीवानने कहा सोई राजाने किया. और जब राजा सो गया तब स्वप्नमें जैतपालको राजा वीरविक्रमादित्यने कहा कि, उज्जैन नगरी और धारा नगरी छोड़कर अंबावती नगरीमें तुम जाकर अपना राज करो. और इस सिंहासनको वहीं पृथ्वीको सौंपदो. सबेरा होतेही राजा जैतपाल उठा. उठतेही मजूरदा- रोंको बुला सिंहासनको वही गड़वा दिया. और आप अंबावती नगरीमें आकर राज करने लगा. धीरे २ धारा नगरी और उज्जैन नगरी उजड़ उजड़ अंबावती नगरी- यह पुतलीकी बात सुन राजा भोज प को सिर धुनकर बैठा और दीवानको ब-