संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९९७
एवं दक्षिणा यजमानके अधीन। सो सब कुछ विधिवत् सम्पन्न हुआ है। नर्मदा जलरहित हो गयी और मेघ अभीतक पानी नहीं बरसाते। इससे हताश होनेकी आवश्यकता नहीं है। जो चली गयी है, उस नर्मदा नदीके आनेकी बाट देखो।
तब राजाने नर्मदाकी स्तुति प्रारम्भ की—सुरेश्वरि! तुम्हें नमस्कार है। शंकरात्मजे! तुम्हें नमस्कार है। इडा, पिंगला, उमा, गंगा, सरस्वती, वेदमाता गायत्री, सावित्री, सरस्वती, ब्राह्मी, वैष्णवी और गौरी सब कुछ तुम्हीं हो। तुम्हीं परम यशस्विनी लोकमाता लक्ष्मी हो। पृथ्वीपर जितने भी तीर्थ बताये गये हैं, वे सब तुमसे व्याप्त हैं। समस्त चराचर जगत् तुम्हारे जलसे व्याप्त है। जगत्में ऐसा कोई स्थान नहीं दिखायी देता जो तुम्हारे जलसे आवृत न हो। तुम्हारे जलमें स्नान करनेमात्रसे तृप्त होकर सब जीव परम गतिको प्राप्त होते हैं।
अमिततेजस्वी राजाके मुखसे यह स्तवन सुनकर नर्मदादेवीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—राजन्! तुम्हारे मनमें जो अभिलाषा हो, उसके अनुसार वर माँगो।
राजाने कहा—देवि! तुम सात पूर्वके और सात दूसरे प्रवाहोंको अक्षय करो।
नर्मदा बोली—राजन्! लो, यह वरदान मैंने तुम्हें यथार्थरूपसे दे दिया।
ऐसा कहकर सरिताओंमें श्रेष्ठ नर्मदा जलराशिसे परिपूर्ण हो विस्तृत प्रवाहोंसे बहने लगी। राजा सालंकायनका यह अद्भुत कर्म देखकर सत्यधर्म-परायण सभी महर्षि उनकी प्रशंसा करने लगे। तदनन्तर उन सबने नर्मदामें स्नान, अवगाहन, जलपान और पितृतर्पण किया। तत्पश्चात् सर्वस्व दक्षिणा पाये हुए ब्राह्मणोंने वह यज्ञ समाप्त किया। जो जिस वस्तुकी कामना करता, उसे वही वस्तु दी जाती थी। तदनन्तर शिवालयमें जाकर समस्त मनोवांछित फलोंको देनेवाले देवपूजित माहेश्वरलिंगमें स्थित भोग-मोक्ष-प्रदाता उमा-महेश्वरका राजाने विधिपूर्वक पूजन किया। पूजामें प्रत्येक उपचार 'ॐ महेश्वराय देवाय शम्भवाय नमो नमः'—इस मन्त्रसे चढ़ाया गया। पूजा समाप्त होनेपर राजा वहीं हाथ जोड़कर खड़े हो गये। तत्पश्चात् नर्मदादेवी भगवान् शंकरके चरणके नीचेसे प्रकट हुईं। उनका वह प्रवाह सम्पूर्ण देवताओंद्वारा पूजित हुआ। तदनन्तर सन्तुष्ट हुए महादेव आदि सब देवता बोले—'राजन्! तुम मनोवांछित वर माँगो।'
उनके ऐसा कहनेपर राजा सालंकायनने कहा—देवताओ! आपलोग कभी इस स्थानका परित्याग न करें। हमारे राष्ट्रमें अनावृष्टि आदि दोषोंसे पीड़ित प्रजाका कष्ट दूर हो और वह सदा फले-फूले। इसके सिवा इस स्थानपर आहवनीय अग्नि स्वयं ही सदा विद्यमान रहे।
देवताओंने कहा—राजन् तुमने जो कुछ कहा है, वह सब पूरा होगा।
ऐसा कहकर सब देवता वहाँसे अन्तर्धान हो गये। राजाका राज्य पुनः वृद्धिको प्राप्त हुआ और इन्द्र इच्छानुसार वर्षा करने लगे। वह यज्ञ पूरा करके राजा सालंकायन अपने मन्त्रियों तथा अन्तःपुरकी रानियोंके साथ देवनिर्मित अयोध्यापुरीमें लौट आये। युधिष्ठिर! इस प्रकार मैंने तुम्हें उमामहेश्वरतीर्थका माहात्म्य सुनाया है।
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श्वेतकिंशुक आदि तीर्थोंकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अमरेश्वरके पूर्वभागमें स्थित श्वेतकिंशुक नामक पापनाशन तीर्थका माहात्म्य सुनो, जिसमें स्नान करनेवाले मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त होते हैं। वहाँ उत्तम सिद्धि प्रदान करनेवाला श्वेतकिंशुक नामक लिंग है तथा स्वर्गरूपी फल प्रदान करनेवाले ताटकेश्वर महादेव भी वहीं विराजमान हैं। उसके बाद वर्ण नामसे प्रसिद्ध एक दूसरा पापनाशक तीर्थ है,