संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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जहाँ लोकमें वर देनेवाले त्र्यम्बक महादेव विद्यमान हैं। उस तीर्थके माहात्म्यसे गण्डेशको स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी। वहाँ गण्डकेश्वर और शुक्लेश्वर लिंग प्रसिद्ध हैं। नर्मदा और दन्तिवनिकाका संगम सर्वत्र विख्यात है। वहीं सब सिद्धियोंको देनेवाला लिंगेश्वर लिंग है। बालकेश्वर और पूर्णकेश्वर लिंग भी वहीं हैं। नर्मदाके उत्तर तटपर उत्तम नर्मदापुर है। कपिशिला नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है, जो सब अनर्थोंका निवारण करनेवाला है। वहीं सिद्धेश्वर तथा नाडकेश्वर लिंग हैं।
नृपश्रेष्ठ! तदनन्तर वैदूर्य पर्वतसे पश्चिम दिशाकी ओर जाय। वहाँ शशभी और नर्मदाका संगम है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहीं भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला शशभेश्वर लिंग है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वह गर्दभीकी योनिसे छुटकारा दिलानेवाला है। यहीं मण्डलेश्वर नामक तीर्थ और लिंग है, जहाँ माण्डलिक नरेश अजापाल और मनु सिद्धिको प्राप्त हुए हैं। वहाँ यज्ञ करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वहाँ तिल और जल देने तथा पिण्डदान करनेसे जबतक चन्द्रमा और सूर्यकी सत्ता है, तबतक पितरोंको तृप्ति बनी रहती है। वहाँ जो दान दिया जाता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। वहाँसे कान्तारकतीर्थमें जाय, जो सब तीर्थोंमें श्रेष्ठ और शुभ है। वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गमें जाते हैं और मरनेवाले मोक्ष पाते हैं।
त्रेतायुगमें रघुवंशी राजकुमार श्रीराम और लक्ष्मण मिथिलेशकुमारी सीताके साथ यहाँ आकर नर्मदाके पार हुए थे। वे दोनों राजकुमार भगवान् विष्णुके अवतार थे और पिताकी आज्ञाका पालन करते हुए इस मार्गसे वनमें गये थे। उन्होंने इस श्रेष्ठ तीर्थमें स्नान करके भक्तिपूर्वक महादेवजीका पूजन किया था। जहाँ उनका स्नान हुआ, वह स्थान 'राजतीर्थ' के नामसे प्रसिद्ध है। वहाँ लक्ष्मणेश्वर तथा सीतेश्वर लिंग हैं, जो देवताओं और दानवोंद्वारा वन्दित हैं। उस तीर्थमें शूलपाणि महेश्वरका पूजन करके मनुष्य गणपतिपदको प्राप्त होता है।
नृपश्रेष्ठ! वहाँसे पुण्यतीर्थ शिवालयको जाय। वहीं परम मनोहर माहिष्मती पुरी है, जिसका दर्शन करके कोई भी नीचे नहीं गिरता। वहाँ अपनी ज्वालाओंसे प्रज्वलित कालाग्निरुद्रका निवास है। तदनन्तर कोटितीर्थ है, जहाँ कोटीश्वर लिंग विराजमान है। उसकी पूजासे कोटि यज्ञोंका फल प्राप्त होता है। वहाँ दिये हुए दानका पुण्य कोटि-गुना बढ़ जाता है। उसके बाद दशाश्वमेधतीर्थ है, जो भोग और मोक्ष देनेवाला है। वहाँ तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंकी उत्तम गति होती है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य तेजस्वी हो जाता है। तत्पश्चात् वन्ध्या और नर्मदाका संगम है, जो देवताओं और असुरोंसे भी नमस्कृत है। राजेन्द्र! उस संगममें मुनकेश्वर लिंग है, जिसका दर्शन केवल योगियोंको होता है। साधारण मनुष्य उसे नहीं देख पाते। नर्मदाके दक्षिण तटपर चण्डीश्वर, उडुगणेश्वर और वकेश्वर लिंग हैं, जहाँ बगले स्वर्गको प्राप्त हुए हैं। गंगावह नामवाला एक तीर्थ है, जहाँ सब सिद्धियोंको देनेवाला एक शिवलिंग है। उस निर्मल शिवलिंगका नाम अंगारेश्वर जानना चाहिये। इसके बाद सोमतीर्थ और शुक्लतीर्थ हैं। फिर निरसतीर्थ और ध्रुवतीर्थ हैं। युधिष्ठिर! इन सबके सिवा वहाँ और भी अनेक सहस्र तीर्थ हैं। पिपीलिकातीर्थ भोग और मोक्ष देनेवाला है। वहाँ पूर्वसे पश्चिम एक कोसतककी भूमिमें पंद्रह हजार तीर्थ हैं, जो ऋषियों और देवताओंके द्वारा सेवित हैं। वहाँ जो दान और होम आदि किया जाता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो उमा-महेश्वरलोकमें आनन्द भोगता है। अतः मनुष्यको उचित है कि वह शान्तचित्त होकर महादेवजीका पूजन करे और सदा सबके प्रति मैत्री एवं करुणाका भाव बनाये रखे। राजन्! पुण्यवान् पुरुषोंमें ही मैत्री और मुदिता होती है। सब प्राणियोंमें पुण्यवानोंको ही सुख होता है, यह विचारकर पुण्यके लिये यत्न करे। जो पुण्यक्षेत्र नहीं हैं, ऐसे स्थानपर किया हुआ पुण्य सम होता