संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
पृष्ठ 1028, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ेंपृष्ठ 1028
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * ९९९
| है (जितना किया जाता है, उतना ही रहता है)। परंतु जहाँ नर्मदाका संगम हो, वहाँका थोड़ा-सा भी पुण्य असंख्य होता है। अन्य स्थानोंपर किया हुआ पाप पुण्यक्षेत्रमें नष्ट हो जाता है, किंतु यदि पुण्यक्षेत्रमें पाप किया जाय तो वह वज्रलेप हो जायगा। महाबली कार्तिकेयजीने जहाँ नर्मदा पार की थी, वहाँ कार्तिकेनेश्वर नामक सिद्धिदायक | लिंग प्रतिष्ठित है, यह जानना चाहिये। इसके सिवा वहाँ चन्द्रेश्वर, शिखीश्वर तथा सब पापोंका नाश करनेवाला शक्तीश्वर लिंग है। इन सब लिंगोंका भक्तिभावसे पूजन करके मनुष्य ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाता है। इतना ही नहीं, अन्तमें वह शिवलोकको प्राप्त होता है और उसके पितरोंको स्वर्गलोकमें स्थान मिलता है। |
$\sim\sim\circ\sim\sim$
मान्धाताका चरित्र
| मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! तदनन्तर सर्वदेववन्दित गौरीखण्डकी यात्रा करे। वहाँ स्नान करके मनुष्य सब तीर्थोंका फल पाता है तथा उसमें तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंको अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है। गौरीखण्डेश्वर नामक मणिमय लिंग जलके मध्यभागमें स्थित है। मनुष्य उसका दर्शन नहीं कर पाते। वह देवताओंद्वारा पूजित होता है। वहीं कुमारेश्वर नामक शिवलिंग प्रतिष्ठित है। साथ ही भोग और मोक्ष प्रदान करनेवाला मयूरेश्वर लिंग भी है, जिसके माहात्म्यसे मयूरगण स्वर्गलोकको प्राप्त हुए हैं। उनके पूजनसे तिर्यग्योनिकी प्राप्ति नहीं होती।<br><br>तत्पश्चात् करमर्दा संगममें स्नान करनेके लिये जाय। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जिसने स्नान कर लिया, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। करमर्दा में स्नान करके करमर्देश्वर लिंगका पूजन करना चाहिये। वहाँ पितरोंका तर्पण करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकको प्राप्त होता है।<br><br>युधिष्ठिर बोले—मुने! राजाओंमें श्रेष्ठ मान्धाता तीनों लोकोंमें विख्यात हैं। मैं उन बुद्धिमान् राजाका चरित्र सुनना चाहता हूँ।<br><br>मार्कण्डेयजीने कहा—महाभाग! इक्ष्वाकुवंशमें एक युवनाश्व नामक राजा हो गये हैं। वे राजर्षि बहुत समयतक सन्तानहीन ही रहे। तब उन्होंने अपना राज्य मन्त्रियोंके अधीन करके वनमें प्रवेश किया और शास्त्रोक्त विधिसे अपने मनका संयम | करके फल-मूलका भक्षण करते हुए बड़ी भारी तपस्या की। एक दिनकी बात है। वे राजा प्याससे विकल हो गये। उनका गला सूखने लगा। तब वे पानीके लिये आश्रमके भीतर गये। रात्रिका समय था। सब लोग सो गये थे। अतः उनके माँगनेपर भी किसीने उनकी बात नहीं सुनी। किसी शक्तिशाली ऋषिते उन्हीं राजा युवनाश्वको पुत्रकी प्राप्तिके लिये मन्त्रोंसे अभिमन्त्रित करके एक जलपूर्ण कलश स्थापित कर रखा था। प्यासे हुए राजा बड़े वेगसे दौड़े और उसी जलको पीकर सो रहे। प्याससे व्याकुल राजा उस शीतल जलको पीकर बहुत सुखी हुए।<br><br>तदनन्तर मुनियोंको यह बात मालूम हुई। उन्होंने कुपित होकर पूछा—'किसने कलशका जल पी लिया है।' युवनाश्वने कहा—'महात्माओ! यह काम तो मैंने ही किया है।' तब महर्षि भार्गवने कहा—'राजन्! यह जल तुम्हारे पुत्र होनेके उद्देश्यसे तपस्यासे संचित एवं अभिमन्त्रित करके रखा गया था। इससे महाबलवान् एवं तपोबलसे युक्त सर्वधर्मपरायण पुत्रका जन्म हो, इस संकल्पसे मन्त्रयुक्त विधिके द्वारा इस जलका संस्कार किया गया था। यह तुम्हारे लिये पीने योग्य नहीं था। आज तुम्हारे द्वारा जो कार्य हुआ है, वह अवश्य ही प्रारब्धसे प्रेरित है। महाराज! इस जलको पीनेसे तुम गर्भवान् होओगे।'<br><br>तदनन्तर सौ वर्षोंके पश्चात् राजा युवनाश्वकी |