भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1029, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1029
१०००* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

बायीं कुक्षि फाड़कर सूर्यके समान तेजस्वी पुत्र उत्पन्न हुआ। तो भी राजाकी मृत्यु नहीं हुई। उस समय महातेजस्वी इन्द्र उस बालकको देखनेके लिये आये। देवता पूछने लगे—‘देवराज ! यह किसका दूध पीयेगा ?’ इन्द्र बोले—‘एष मां धाता—यह मुझे ही पान करेगा।’ ऐसा कहकर उन्होंने बालकके मुँहमें अपनी तर्जनी अँगुली डाल दी। बालक बड़े हर्षके साथ उस अँगुलीका अमृतरस पीने लगा। तत्पश्चात् इन्द्रने उसका ‘मान्धाता’ यह सार्थक नाम रख दिया।

इस प्रकार बालक मान्धाता सोलह वर्षोंतक इन्द्रकी तर्जनी पी-पीकर बढ़ता रहा। उसे आयुर्वेद आदि दिव्य शास्त्रोंका ज्ञान केवल उनके चिन्तनसे हो गया। आजगव नामक धनुष, सींगके बाण और अभेद्य कवच—ये तत्काल उनके पास स्वतः उपस्थित हो गये। इन्द्रने समस्त देवताओंके साथ मान्धाताका राज्याभिषेक किया। महाराज मान्धाताने धर्मसे सम्पूर्ण लोकोंको उसी प्रकार व्याप्त कर लिया, जैसे भगवान् विष्णुने अपने तीन पगोंसे त्रिलोकीको नाप लिया था। उन महात्माका शासनचक्र अप्रतिहत गतिसे चलता था। सैकड़ों राजा स्वयं उनकी सेवामें उपस्थित हुए। इस प्रकार उनका समूची पृथ्वीपर एकच्छत्र अधिकार था। उन्होंने प्रचुर दक्षिणावाले अनेक यज्ञोंद्वारा भगवान्‌का यजन किया। उन प्रसन्नचित्त, परम बुद्धिमान् और अमित तेजस्वी नरेशने अतिशय धर्मका अनुष्ठान करके इन्द्रके आधे सिंहासनको प्राप्त किया था। उन्होंने धर्मपूर्वक पृथ्वीका पालन किया। उन महात्माका राज्य दस करोड़ वर्षोंतक चलता रहा। एक समय बारह वर्षोंतक वृष्टि नहीं हुई। उस समय मान्धाताने वज्रपाणि इन्द्रके देखते-देखते अपने राज्यकी खेतीको बढ़ानेके लिये बलपूर्वक वर्षा करवा ली। वहीं महाराज मान्धाताका यह देवस्थान है। उन्हींके पुण्यतम देशमें अमरकण्टक पर्वत देखा जाता है। उन्होंने अमरकण्टकपर ॐकारेश्वर शिवके आगे सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करके इस प्रकार स्तवन किया—‘जगत्की उत्पत्ति करनेवाले परमेश्वर ! आप ही कालगतिके प्रवर्तक हैं, आप ही संसारस्वरूप और संसारका संहार करनेवाले हैं, आपको नमस्कार है। ॐ महादेवजीको नमस्कार है। भगवान् शम्भु और भवको नमस्कार है। तीन नेत्र और तीन मूर्ति धारण करनेवाले तीनों लोकोंके स्वामी आपको नमस्कार है। कालरहित, जरारहित और मृत्युरहित आपको बारंबार नमस्कार है। जो लोग प्रतिदिन आदिदेव भगवान् ॐकारेश्वरका ध्यान करते हैं, उनकी इस संसारसमुद्रमें पुनरावृत्ति नहीं होती।’

कालरूपधारी ॐकारस्वरूप उमानाथ महादेवजीने यह स्तुति सुनकर राजा मान्धातासे कहा—सुव्रत ! तुम कोई वर माँगो।

मान्धाताने कहा— देवेश्वर ! वैदूर्य नामसे प्रसिद्ध यह शैलराज मान्धाता नाम धारण करे और आपके प्रसादसे देवस्थान बन जाय। यहाँ जो मनुष्य दान, तप, पूजा तथा प्राणविसर्जन करें, वे शिवधामके निवासी हों।

मान्धाताका यह वचन सुनकर महादेवजी बोले— नृपश्रेष्ठ ! मेरे प्रसादसे यह सब कुछ होगा। इस प्रकार वरदान पाकर महाराज मान्धाता अपनी पुरीको लौट गये। युधिष्ठिर ! यह सब मान्धाताका उत्तम चरित्र तुम्हें बताया गया। इस तीर्थके माहात्म्यसे मान्धाता आदि नरेश सम्पूर्ण मनोवांछित कामनाएँ प्राप्त करके भगवान् विष्णुके धाममें विहार करते हैं।

$\approx\approx\bigcirc\approx\approx$