संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००१ ---|---
बाणासुरके तीन पुरोंका भगवान् शंकरके द्वारा संहार, जालेश्वरनामक बाणलिंगकी उत्पत्ति और बाणासुरको शिवलोक-प्राप्ति
मार्कण्डेयजी कहते हैं—सत्ययुगमें बलि नामसे प्रसिद्ध एक श्रेष्ठ दैत्य हुए। उनके महापराक्रमी पुत्रका नाम बाणासुर था। वह अपनी सहस्र भुजाओंके कारण विख्यात था। उसने एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक महादेवजीकी आराधना की। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने कहा—'वत्स! तू कोई श्रेष्ठ वर माँग ले।'
बाणासुर बोला—प्रभो! मेरा नगर दिव्य एवं सम्पूर्ण देवताओंके लिये अजेय हो। आपको छोड़कर दूसरे किसी देवताके लिये यहाँ प्रवेश पाना अत्यन्त कठिन हो। मेरा यह नगर मेरे स्थिर होनेपर स्थिर रहे और मेरे चलनेपर वह साथ-साथ चले—सर्वथा मेरे मनके अनुकूल बना रहे।
महादेवजीने कहा—'एवमस्तु'। तदनन्तर भगवान् विष्णुने भी बाणासुरसे कहा—'यदि महादेवजीने तुम्हें एक पुर तुम्हारे मनके अनुरूप दिया है तो मैं भी तुम्हें वैसा ही दूसरा पुर देता हूँ।' तत्पश्चात् दोनों देवता श्रीविष्णु और शिवने एकत्र होकर कहा—'बाणासुर! अब तुम शीघ्र ही ब्रह्माजीके पास जाओ।' तब बलिका पुत्र ब्रह्माजीके पास गया। ब्रह्माजीने उसे हृदयसे लगाया और कहा—'वत्स! भगवान् शिव और विष्णु दोनोंने तुम्हें एक-एक पुर प्रदान किया है। अतः मैं भी वैसा ही एक पुर और तुम्हें देता हूँ। इन तीनों पुरोंको प्राप्त करके बाणासुर त्रिपुरके नामसे विख्यात हुआ। युधिष्ठिर! इस प्रकार वरदान पाकर सहस्र भुजाओंके विस्तारसे शक्तिशाली बना हुआ बाणासुर समस्त देवताओंके लिये अवध्य हो गया। उसने यक्ष, विद्याधर, देव, दानव, गन्धर्व और राक्षसोंके समस्त निवासस्थानोंको नष्ट कर दिया। वहाँकी वेदिकाएँ तोड़-फोड़ डालीं। इन्द्रकी अमरावतीपुरीको उजाड़ दिया। उसके अत्याचारसे उद्विग्न होकर सब देवता महादेवजीके पास गये और इस प्रकार बोले—'भगवन्! आपने, श्रीविष्णुने तथा श्रीब्रह्माजीने भी बाणासुरको वरदान देकर अजेय बना दिया है। उसके साथ युद्ध करनेकी शक्ति किसीमें भी नहीं है। जो भी उसके सामने खड़ा होगा, उसे वह भस्म कर सकता है।'
महादेवजी बोले—देवताओ! तुम सब लोग तीस करोड़की संख्यामें हो और बड़े बलवान् हो। सब लोग संगठित होकर जाओ और यत्नपूर्वक त्रिपुरका विनाश करो।
यह सुनकर सब देवता तीखे अस्त्र-शस्त्र लेकर बाणासुरके—त्रिपुरके समीप गये। किंतु उस दैत्यने समस्त देवताओंको क्षणभरमें परास्त कर दिया। उन सबके अस्त्र-शस्त्र भी छीन लिये। देवताओंके पाँव उखड़ गये। वे हतोत्साह होकर पुनः महादेवजीके समीप आये। महादेवजीने पूछा—'तुम सब लोगोंने वहाँ जाकर क्या किया?' देवताओंने कहा—'भगवन्! क्या कहें, हम उसका पराक्रम वर्णन करनेमें असमर्थ हैं।
देवताओंकी वह बात सुनकर भगवान् शिवने कहा—अच्छा तो इस महादुष्ट त्रिपुरका संहार मैं स्वयं करूँगा। यह कहकर वे कैलाससे चले और जहाँ त्रिपुरासुर था वहाँ जा पहुँचे। उनके साथ देवी पार्वती भी थीं। चण्डेश्वर, नन्दी, महाकाल, महेश्वर, वृष, भृंगिरिटि, विघ्नेश (गणेश), स्कन्द, महावीर पुष्पदन्त, घण्टाकर्ण, महोदर, गोमुख, हस्तिकर्ण, स्थूलजंघ और वृकोदर—ये पंद्रह पार्षद भी भगवान् शिवके साथ गये। वे सब-के-सब महादेवजीके तुल्य पराक्रमी थे। जहाँ महान् क्षेत्रस्वरूप श्रीशैल नामका सिद्ध पर्वत है, वहीं ठहरकर महादेवजीने देवीसे कहा—'प्रिये! यहीं त्रिपुरासुरको मारना उचित होगा।' ऐसा कहकर भगवान् शंकरने उस पर्वतको अपना प्रधान निवास स्थान बनाया और व्यापक विराड्रूप धारण करके पिनाक नामक धनुष हाथमें लिया। फिर एक पैरसे पातालको