संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और दूसरेसे ब्रह्माण्डको दबाया तथा त्रिपुरासुरकी ओर लक्ष्य बाँधकर अघोर नामक बाणका प्रहार किया। उस अस्त्रसे दग्ध होकर त्रिपुरके तीन खण्ड हो गये। उसे जर्जर करके शिवजीने नर्मदाके जलमें गिरा दिया। वहाँ गिरनेपर वह सात पातालोंका भेदन करके रसातलको चला गया। इससे वहाँ जालेश्वर नामक तीर्थ प्रकट हुआ, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। जालेश्वरदेवका पूजन करनेसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे छुटकारा पा जाता है और कोटि सहस्र कल्पोंतक भगवान् शिवके धाममें सुखपूर्वक निवास करता है। जो वहाँ स्नान करते हैं, वे तो स्वर्गमें जाते हैं और जो मृत्युको प्राप्त होते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। युधिष्ठिर! वहाँ तिल और जलसे तर्पण करने तथा पिण्डदान देनेसे जबतक भगवान् शंकर और नर्मदाजी स्थित हैं, तबतक पितर तृप्त रहते हैं। कालाग्निरुद्रके समान प्रज्वलित त्रिपुरनाशक अघोरास्त्रको नर्मदाके सिवा दूसरा कौन धारण कर सकता है? इस प्रकार अघोरास्त्रसे छूटा हुआ बाणजाल ही ‘जालेश्वर' (नामक बाणलिंग) कहलाया।
अपने तीनों पुरोंके दग्ध होनेपर बाणासुर भयभीत हो भगवान् शिवकी इस प्रकार स्तुति करने लगा—अनादिदेव! ईश! आपको नमस्कार है। विघ्नेश्वर! आपको नमस्कार है। महेश्वर! आपको नमस्कार है। सर्वज्ञ! अज्ञानहारी हर! ज्ञानदाता शिव! आपको नमस्कार है। अनन्तगुणमय रत्नोंसे विभूषित आप परमेश्वरको नमस्कार है। परात्पर! परातीत! उत्पत्ति और पालन करनेवाले शिव! आपको नमस्कार है। सब प्रयोजनोंकी सिद्धिके साधनभूत विश्वनाथ! आपको नमस्कार है। धनंजय! निराधार! स्वभावसे ही उपद्रवरहित आपको नमस्कार है। सदा प्रसन्न रहनेवाले परमेश्वर! आप सम्पूर्ण योगोंके स्वामी हैं। आपको नमस्कार है। भूतनाथ! जगन्नाथ! सर्वाधार! आपको नमस्कार है। सृष्टि, संहार, मोक्ष और सात पातालोंके आश्रय! आपको नमस्कार है। त्रिनेत्र और त्रिशूल धारण करनेवाले त्रिलोकस्वरूप आपको नमस्कार है। चन्द्रशेखर! देवता और असुर दोनों आपके चरणोंमें नतमस्तक होते हैं, आपको नमस्कार है। महाप्रभो! मैंने अपनी जिह्वाकी चपलताके कारण आपके विषयमें कुछ कहनेकी धृष्टता की है, आप उसे क्षमा करें। आपके गुणोंका वर्णन करनेमें कौन समर्थ है।
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**बाणासुरद्वारा की हुई इस स्तुतिको सुनकर भगवान् शिव उसपर प्रसन्न हो गये और इस प्रकार बोले—‘दैत्यराज! सेवापराधजनित तुम्हारा यह दोष क्षमा किया गया। तुम कोई वर माँगो।'
**बाणासुर बोला—**देव! मैं अपने परिवारसहित इसी शरीरसे आपके उस परम धामको जाऊँ, जहाँ पुनर्जन्मका भय नहीं है।
बाणासुरका यह वचन सुनकर महादेवजीने कहा—दैत्यराज! तुम मेरी भक्तिके प्रसादसे मेरे समीप निवास करोगे। तत्पश्चात् वह दिव्य विमानपर आरूढ़ हो महादेवजीके प्रसादसे उन्हींके लोकमें चला गया।
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अमरकण्टक और यज्ञपर्वतके श्रेष्ठ तीर्थ एवं लिंग, राजा इन्द्रद्युम्नका यज्ञ और उन्हें देवोंका वरदान
**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**युधिष्ठिर! अमरकण्टक पर्वतपर सब ओर अत्यन्त गुप्त पुण्यका निवास है। उस गिरिश्रेष्ठसे लेकर नर्मदा नदीतक सब तीर्थ अत्यन्त पवित्र माने गये हैं। अमरकण्टकसे उत्तरभागमें यज्ञ पर्वत है, जो विन्ध्याचलका कनिष्ठ पुत्र और पर्यंक पर्वतका भाई है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीने वहीं सौत्रामणि नामक यज्ञ किया था और इन्द्रने भी उसी पर्वतपर अश्वमेध-यज्ञका अनुष्ठान किया था।