संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००३ |
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महर्षि दधीचि तथा अन्य देवताओंने वहीं बड़े-बड़े यज्ञोंका अनुष्ठान किया है। उसी यज्ञ पर्वतसे चतु नामकी एक महानदी निकली है, जो नर्मदामें जाकर मिली है। वह संगम विश्वविख्यात तीर्थ है। उसके तटपर पीले रंगके कुश पृथ्वीपर फैले हैं। उनसे श्राद्ध करनेपर वे पितरोंको मोक्ष देनेवाले होते हैं। जहाँ चतु और नर्मदाका संगम है और जहाँ यज्ञ पर्वत है, इन दोनोंके बीचकी भूमिमें जो श्राद्धका अनुष्ठान करता है, उसके पितर पूर्ण तृप्त होते हैं। जो वहाँ स्नान और सिद्धेश्वर एवं चतुष्केश्वर लिंगकी परिक्रमा करता है, उस मनुष्यकी लोकमें पुन: गणना नहीं होती—वह मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! वहाँ महादेवजी संगममें स्थित हैं। मनुष्य उनका दर्शन नहीं कर पाते। देवता, असुर और नागकन्याओंद्वारा उनका पूजन किया जाता है।
सुपर्ण नामसे प्रसिद्ध एक जितेन्द्रिय ब्रह्मर्षि थे। उनकी पतिव्रता धर्मपत्नीका नाम पुरुहूता था। वे दोनों दम्पति नैमिषारण्यमें निवास करते थे। एक दिन पर्वकालमें ऋतुस्नाता होनेपर पुरुहूताने अपने पतिको प्रसन्न करके कहा—'महामुने! आज मेरे साथ सहवास कीजिये, जिससे मुझे सम्पूर्ण वंशको पवित्र करनेवाला पुत्र प्राप्त हो। पुत्रके द्वारा मनुष्य पुण्यलोकोंपर विजय पाता है। पुत्रसे देवता और पितर तृप्त होते हैं। अतः आप पुत्र उत्पन्न करें।'
ब्राह्मणने कहा—प्रिये! आज अमावास्या है। इसमें मैथुनका निषेध किया गया है। अतः आज यह नहीं करना चाहिये। पितरोंके लिये तो आजके दिन मैथुन विशेषरूपसे वर्जित है। जो अमावास्याके दिन ऋतुकालमें भी पत्नीसंगम करता है, पितर उसका मांस भोजन करते हैं। उनके इस कथनसे पत्नीको सन्तोष हो गया और दोनों शिवाराधनमें तत्पर हो गये।
नील गंगाके पश्चिम और नर्मदाके उत्तर व्यतीपातेश्वर नामक शिवलिंग है, जो परम सिद्धि देनेवाला है। उसे साक्षात् जगदीश्वर सोमनाथका ही स्वरूप समझो। वहाँ सावित्री और सप्तर्षियोंने तपस्या की थी। नर्मदाके तटपर सावित्रीकुण्ड एक विख्यात तीर्थ है। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्यको कन्यादानका फल प्राप्त होता है। वहाँ तिलसहित जल देने और अन्नदान करनेसे पितर सावित्रीलोकमें रहकर तृप्तिलाभ करते हैं।
पातालेश्वर नामसे प्रसिद्ध देवताओंके स्वामी जगदीश्वर सोमनाथका पूजन करके सब लोग शिवधामको प्राप्त होते हैं। सावित्रीकुण्डमें स्नान करके उसीके जलसे भगवान् सोमनाथका पूजन करे, इससे उस मनुष्यका पुन: इस संसारमें जन्म नहीं होता।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! सूर्यवंशमें इन्द्रद्युम्न नामसे प्रसिद्ध एक राजा हो गये हैं, जो अयोध्याके अधिपति थे। उन्होंने पर्वत, वन और काननोंसहित सम्पूर्ण पृथ्वीका पालन किया था। उनके राज्यकालमें चारों वर्णोंके लोग स्वधर्म-पालनमें तत्पर थे। प्रत्येक धेनु इच्छानुसार दूध देनेवाली कामधेनु थी और पृथ्वी हरी-भरी खेतीसे सुशोभित होती थी। एक दिन राजर्षि इन्द्रद्युम्नने महर्षि वसिष्ठसे पूछा—'महामुने! मैं अश्वमेध-यज्ञ करना चाहता हूँ, सो किस तीर्थमें उसका अनुष्ठान करूँ?'
वसिष्ठजी बोले—राजन्! वेदवेत्ता ब्रह्मर्षिगण! आपको जैसी सम्मति दें, उस प्रकार ब्राह्मण ऋत्विजोंके द्वारा आपको यज्ञका अनुष्ठान करना चाहिये। उस समय राजसभामें मरीचि, कश्यप, अंगिरा, गौतम, दुर्वासा, च्यवन, धूम्र, महामुनि कण्व तथा और भी बहुत-से उत्तम व्रतका पालन करनेवाले मुनीश्वर बैठे थे। महाराज इन्द्रद्युम्नने उन सबसे पूछा—'किस तीर्थमें किया हुआ यज्ञ मनोवांछित फल देनेवाला होता है?'
ऋषि बोले—राजन्! इस कार्यके लिये ऋषियोंने अनेक भिन्न-भिन्न तीर्थोंको श्रेष्ठ बताया है।
यह सुनकर दुर्वासाने हँसते हुए कहा—राजन्! ब्राह्मण ज्ञानकी अधिकतासे ज्येष्ठ माने जाते हैं, क्षत्रियोंमें जिसका बल और पराक्रम अधिक हो, वही ज्येष्ठ माना गया है, वैश्योंका ज्येष्ठत्व धन