संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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और धान्यकी अधिकतापर निर्भर है तथा शूद्र जन्म एवं आयुके अनुसार ही ज्येष्ठ माने जाते हैं।* सात कल्पोंतक जीवित रहनेवाले तीनों वेदोंके ज्ञाता त्रिकालज्ञ महर्षि मार्कण्डेयजीके रहते हुए धर्मका निरूपण एवं निश्चय करनेकी शक्ति किसमें है? महाराज! आप नर्मदाके तटपर विद्यमान धर्मारण्यमें जाइये। वहाँ मार्कण्डेयजी जहाँ बतावें, उसी स्थानपर अपना यज्ञ प्रारम्भ करें।
‘देवर्षे! आप जैसा कहते हैं, वैसा ही करूँगा’—यों कहकर राजा इन्द्रद्युम्नने अपने मन्त्री देवगर्भको यज्ञकी सब सामग्री ले चलनेका आदेश दिया और स्वयं वहाँके ब्राह्मणों एवं मुनियोंके साथ दिव्य वाहनपर बैठकर बड़ी प्रसन्नताके साथ यात्रा की। उनके साथ अन्तःपुरकी रानियाँ भी थीं। सबके साथ राजा इन्द्रद्युम्न धर्मारण्यमें पहुँचे, जहाँ मार्कण्डेयजी विद्यमान थे। वहाँ जाकर उन्होंने मार्कण्डेयजीको साष्टांग प्रणाम और उनका यथावत् पूजन किया। राजा इन्द्रद्युम्नको आया देख महामुनि मार्कण्डेयजीने पूछा—‘नृपश्रेष्ठ! कुशल तो है न? बहुत दिनोंके बाद दिखायी दिये हो। इन ब्रह्मर्षियोंके साथ यहाँ किस प्रयोजनसे तुम्हारा आगमन हुआ है?’
इन्द्रद्युम्न बोले—द्विजश्रेष्ठ! मैं यज्ञ करनेके लिये आया हूँ, सो किस तीर्थमें उसका अनुष्ठान करूँ?
मार्कण्डेयजीने कहा—राजन्! समुद्रपर्यन्त पृथ्वीपर जितने तीर्थ हैं, वे सब नर्मदा नदीमें स्नान करनेके लिये आते हैं। उत्तरमें जितने शिवलिंग हैं और दक्षिणमें जो-जो तीर्थ हैं, वे सब कोटितीर्थमें लीन होते हैं, इसीलिये उसका नाम कोटितीर्थ हुआ है। भगवान् शंकरने पूर्वकालमें पार्वतीदेवी, कार्तिकेयजी, ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्र आदि देवताओंके सम्मुख इस तीर्थके माहात्म्यका इस प्रकार वर्णन किया है—‘ॐकारेश्वरके समीप नर्मदामें कोटितीर्थ बताया गया है। वहाँ जो दान, होम, यज्ञ तथा दुष्कर तप आदि पुण्यकर्म किया जाता है, उसके पुण्यका अन्त नहीं है। ग्रहणकालमें कुरुक्षेत्रकी प्रशंसा की जाती है। परंतु नर्मदा सदा सब कार्योंके लिये पुण्यदायिनी कही गयी है। अतः तुम कोटितीर्थमें यज्ञ करो।
यह सुनकर परम धर्मात्मा राजा इन्द्रद्युम्नने अमित तेजस्वी मार्कण्डेय मुनिके चरण पकड़े और कहा—मुने! आपने जो कुछ कहा है, उसके लिये मैं अपने ऊपर आपका बहुत बड़ा अनुग्रह मानता हूँ। इसी समय सुन्दर यज्ञयूप, विभिन्न देशोंके क्षत्रियवृन्द, गौ, अश्व, हाथी तथा अन्यान्य आवश्यक सामग्री साथ लेकर मन्त्री देवगर्भ वहाँ आ पहुँचे। तब राजाने तीस योजनका एक विशाल यज्ञ-मण्डप बनवाया। उसमें बहुत-से यूप लगाये और अपने प्रमाणके अनुसार नाना प्रकारके कुण्ड निर्माण कराये। यज्ञ प्रारम्भ हुआ और वेदमन्त्रोंकी उच्चारण-ध्वनिसे भूमि और आकाशका मध्यभाग गूँज उठा। सूर्यके सदृश तेजस्वी अग्निदेव अपने धूमरहित स्वरूपसे प्रज्वलित हो रहे थे। महाराज इन्द्रद्युम्नने उस यज्ञमें ब्रह्मा, विष्णु तथा शिवका भी आवाहन किया। इनके साथ सम्पूर्ण देवता भी पधारे। राजाके यज्ञमें घी और दूधकी नदियाँ बहती थीं, जहाँ दही और खीरकी कीच जमी हुई थी। अनेक प्रकारके भक्ष्य-भोज्य पदार्थ सदा सबके लिये प्रस्तुत रहते थे। देवता, मुनि तथा चार प्रकारके प्राणिसमुदाय भलीभाँति तृप्त हुए। अन्तमें ब्राह्मणोंको प्रचुर दक्षिणा दी गयी। इस प्रकार वह यज्ञ सम्पूर्ण हुआ।
तदनन्तर ध्रुव तथा ब्रह्मपुत्र महर्षियोंको विदा करके ॐकारेश्वरके स्वरूपको जानकर राजाने उनका पूजन किया। मणि-माणिक्य आदि रत्नोंसे पहले ॐकारलिंगको विभूषित किया। फिर गन्ध, नाना प्रकारके धूप, कपूर, अगर, चन्दन, ध्वज, छत्र, वितान, व्यजन और दिव्य चामरोंसे पूजा सम्पन्न करके इस प्रकार स्तुति की—‘जिस बिन्दुयुक्त ॐकारका योगीजन सदा ध्यान करते हैं तथा जो ॐकारस्वरूप काम और मोक्ष
* विप्राणां ज्ञानतो ज्यैष्ठ्यं क्षत्रियाणां तु वीर्यतः। वैश्यानां धान्यधनतः शूद्राणां चैव जन्मतः॥ (स्क० पु०, आव० रे० ३४। १९-२०)