भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1034

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १००५

देनेवाले हैं, उनको बार-बार नमस्कार है। ब्रह्मा, विष्णु तथा इन्द्रको भी वर देनेवाले सर्वदेवमय शिव! आपको नमस्कार है। रुद्र! पुण्यसे सुशोभित होनेवाली जो आपकी कल्याणमयी अघोर (सौम्य) मूर्ति है, उसके द्वारा आप मुझपर कृपा कीजिये। आपके सब ओर हाथ और पैर हैं। सब ओर नेत्र, सिर और मुख हैं। लोकमें सब ओर आपके कान हैं तथा आप सबको व्याप्त करके स्थित हैं। आपको नमस्कार है।' इस प्रकार स्तुति करनेपर ॐकारलिंगके मध्यभागमें एक दूसरा लिंग दिखायी दिया, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उसने इन्द्रद्युम्नसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो कामना हो, उसके लिये वर माँगो।'

इन्द्रद्युम्न बोले—देव! वहाँ यज्ञ पर्वतपर देवद्रोणीमें भगवती पार्वतीके साथ पूजित होकर आप सदा निवास करें। देवदेवेश्वर! इस तीर्थमें जो प्राणत्याग करे, वह शिवलोकमें जाय।

ॐकारेश्वर बोले—नृपश्रेष्ठ! तुम्हारी यह सब कामना पूर्ण हो।

इतना कहकर वे वहीं अन्तर्धान हो गये। उन्हींके साथ अन्यान्य देवता भी अपने-अपने स्थानको चले गये। भगवान् शंकर कैलाशधामको गये। राजा इन्द्रद्युम्नने वहाँ चार प्रकारके प्राणियोंको सुनाकर कहा—'तुम सब लोग मेरे यज्ञके प्रभावसे नीरोग हो जाओ और सभी तृप्त रहो।' तत्पश्चात् राजा इन्द्रद्युम्नने साष्टांग प्रणाम करके भगवान् विष्णुकी स्तुति की।

राजाने कहा—मैं केशव (जलमें शयन करनेवाले), माधव (लक्ष्मीपति), विष्णु (सर्वव्यापी), गोविन्द, मधुसूदन (मधु दैत्यको मारनेवाले), पद्मनाभ (नाभिसे कमल उत्पन्न करनेवाले), हृषीकेश (इन्द्रियोंके स्वामी), श्रीधर, त्रिविक्रम (तीन विशाल डगवाले विराट्रूपधारी वामन), दामोदर (माता यशोदाके द्वारा रस्सीसे कटिभागमें बँधनेवाले), वासुदेव (वसुदेवपुत्र) तथा श्रीहरि (पाप हरण करनेवाले) को प्रणाम करता हूँ। जो शंख, चक्र, गदा, शार्ङ्गधनुष और वनमालासे विभूषित हैं, सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक, जगत्के स्वामी, लक्ष्मीजीके पति तथा सर्वज्ञोंमें श्रेष्ठ हैं, उन भगवान् श्रीकान्त, श्रीधर, श्रीश एवं श्रीनिवासको मैं नमस्कार करता हूँ। अच्युत! अनन्त! यज्ञेश! यज्ञाधिप! आपको नमस्कार है। ऋक्, साम, अथर्व और यज्ञ (यजुर्वेद)-स्वरूप आपको नमस्कार है। नृसिंह, मत्स्य, वाराह और कूर्मरूप धारण करनेवाले आपको नमस्कार है। पवित्र वाहनपर आरूढ़ होनेवाले गरुड़ध्वज! आपको नमस्कार है। जो सहस्र मस्तकोंवाले, सकल-निष्कल, जाननेयोग्य, पुरुष (अन्तर्यामी), अध्यक्ष (साक्षी) तथा सबके आदिकारण हैं, उन भगवान् नारायणदेवको मैं नमस्कार करता हूँ। दैत्योंका अन्त करनेवाले देवता श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। हिरण्य, पृथ्वी तथा यज्ञको अपने गर्भमें धारण करनेवाले, अमृतकी उत्पत्तिके हेतुभूत श्रीविष्णुको मैं नमस्कार करता हूँ। वासुदेव! श्रीगर्भ एवं ज्ञानगर्भस्वरूप आपको नमस्कार है। प्रभो! आपने ही इस सम्पूर्ण चराचर जगत्की सृष्टि की है। आप ही प्रत्येक युगमें सृष्टि, पालन और संहार करनेवाले हैं। आपके सब ओर नेत्र हैं, सब ओर मुख हैं। आप अव्यक्त एवं जाननेयोग्य हैं। सम्पूर्ण विश्वके आत्मा, प्रकाशक और सबके भीतर निवास करनेवाले आपको नमस्कार है। आप सूर्य, वायु, अग्नि और चन्द्रमा हैं। देवदेवेश्वर! आप ही धाता, इन्द्र और प्रजापति हैं। सुरश्रेष्ठ! आपके ही प्रसादसे मेरे यज्ञकी सिद्धि हुई है।

राजाके द्वारा की हुई यह स्तुति सुनकर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुने कहा—राजन्! तुम कोई वर माँगो।

राजा बोले—ॐकारलिंगके उत्तर भागमें वैदूर्य पर्वतकी चोटीपर आप जनार्दन लिंगके रूपमें निवास करें। यहाँ विधिपूर्वक आपकी पूजा करके मनुष्य श्रीविष्णुधामको प्राप्त हों, पशु-पक्षियोंकी योनिमें न जायँ तथा यमलोकमें भी प्रवेश न करें। यहाँ प्राणत्याग करनेपर मनुष्योंको