भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1035

१००६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


आपके परम धामकी प्राप्ति हो और इस तीर्थमें पितरोंके निमित्त अन्नदान करनेपर वे पितर आपके प्रसादसे विष्णुधामको प्राप्त करें।

भगवान् विष्णुने कहा—नृपश्रेष्ठ ! मैं यहीं अवतार धारण करूँगा और तुमने जो कुछ माँगा है, वह सब मेरे प्रसादसे पूर्ण होगा।

ऐसा कहकर शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णु अपने धामको चले गये। युधिष्ठिर ! इस प्रकार राजा इन्द्रद्युम्नके महान् यज्ञका वर्णन किया गया। उस यज्ञसे ही वह पर्वत समस्त संसारमें पुण्यतीर्थके रूपमें विख्यात हुआ। सिद्धेश्वरलिंगको ब्रह्माका और नारायणेश्वरको श्रीहरिका स्वरूप समझो। इसके श्रवण और कीर्तनसे मनुष्य विष्णुलोकमें सम्मानित होता है।

तत्पश्चात् सत्यव्रतपरायण राजाने तीर्थोंका स्तवन किया—पितरोंका उद्धार करनेके लिये समस्त तीर्थोंको मेरा बार-बार नमस्कार है।

तीर्थ बोले—महाभाग ! तुम हमसे मनोवांछित वर माँगो।

इन्द्रद्युम्नने कहा—तीर्थगण ! आप सब लोग मुझपर अनुग्रह करके ॐकारके समीपवर्ती तीर्थमें निवास करें।

'एवमस्तु' कहकर तीर्थोंने नर्मदा नदीका इस प्रकार स्तवन किया—अनेक कल्पपर्यन्त स्थित रहनेवाली तथा महादेवजीकी सर्वोत्कृष्ट कलास्वरूपा नर्मदादेवीको हम नमस्कार करते हैं। सब लोकोंमें अत्यन्त प्रसिद्ध एवं नदियोंमें श्रेष्ठ नर्मदाको हम मस्तक नवाते हैं। देवि ! आप हम तीर्थोंके प्रभावसे नहीं, किंतु स्वभावसे ही परम पवित्र हैं, ठीक उसी तरह जैसे भगवान् सूर्यकी प्रभा और अग्निदेवकी कान्ति पवित्र होती है।

नर्मदाकी स्तुति करके तीर्थोंने इन्द्रद्युम्नसे कहा—राजेन्द्र ! जैसे चन्द्रमाकी कला पवित्र होती है, उसी प्रकारसे महानदी नर्मदा भी हैं। यों कहकर सब तीर्थ अन्तर्धान हो गये। तदनन्तर नृपश्रेष्ठ इन्द्रद्युम्नने अर्घ्य देकर गंगाजीकी स्तुति की—'गंगा, भागीरथी, देवि, भोगवती, शुभा, जाह्नवी, मोक्षदा, भद्रा, तारिणी और पापनाशिनी इत्यादि नामोंसे प्रसिद्ध गंगादेवीको मैं नमस्कार करता हूँ। मातः ! आप ही स्वर्गमें देवाधिदेवोंसे वन्दित मन्दाकिनी कहलाती हैं। आप ही वेदमाता गायत्री, उमा और कात्यायनी हैं। देवि ! आपको साक्षात् महादेवजीने अपने सिरपर धारण किया है। इससे अधिक आपके विषयमें और क्या कहा जा सकता है। भगवान् चन्द्रार्धशेखरको छोड़कर दूसरा कौन आपकी स्तुति करनेमें समर्थ है?'

गंगाजीने कहा—महाराज ! मैं प्रसन्न हूँ। तुम कोई वर माँगो।

राजाने कहा—देवेश्वरि ! आप सदा यहीं निवास करें।

गंगा बोली—राजेन्द्र ! ऐसा ही होगा। मैं अपने एक अंशसे सदा यहीं प्रवाहित होऊँगी।

ऐसा कहकर गंगा अपने स्थानको चली गयीं। इसके बाद राजा इन्द्रद्युम्नने नर्मदादेवीकी स्तुति की—'देवि ! तुम्हारे जलके प्रभावसे मैंने देवताओं और पितरोंको सन्तुष्ट किया है। तुमने चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकीको पवित्र किया है। तुम सम्पूर्ण प्राणियोंकी माता और मनुष्योंको संसार-सागरसे पार उतारनेवाली हो। महादेवि ! मेकला, कल्पगा, नर्मदा और जलपूर्णा इत्यादि नामोंसे विख्यात होकर तुम विन्ध्यपर्वतकी शोभा बढ़ाती हो। शुभे ! सहस्रों वर्षतक तुम्हारी स्तुतिमें संलग्न रहनेपर भी कौन तुम्हारा भलीभाँति स्तवन कर सकता है।'

इस स्तोत्रसे सन्तुष्ट होकर नर्मदाने कहा—'राजन् ! तुम क्या चाहते हो, कहो। मैं तुम्हें वर दूँगी, जिससे सिद्धिको प्राप्त होओगे।' नर्मदाका यह वचन सुनकर ब्राह्मणोंसहित शिवभक्तिपरायण राजाने हँसते हुए कहा—'देवि !