संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००७ |
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यदि मुझे वर देना चाहती हो तो अपने दक्षिण तटसे लेकर उत्तर तटतक सात धाराएँ कर लो।'
नर्मदा बोलीं—राजन् ! मेरे प्रभाव और प्रसादसे यह सब हो जायगा। इस बीचमें जो कुछ दान दिया जायगा, उसका पुण्य असंख्य होगा। यहाँ दान देनेवालोंका पुनः इस संसारमें जन्म नहीं होगा। शूद्र, चाण्डाल, मृग, पशु और सर्प आदि भी नीलगंगा-संगममें स्नान करने अथवा प्राण त्यागनेपर स्वर्गधामको जायँगे। | तत्पश्चात् नर्मदाको नमस्कार करके राजा इन्द्रद्युम्न अपने वाहनपर आरूढ़ हुए और सहस्रों राजाओंके साथ अपनी राजधानी देवनिर्मित पुरी अयोध्याको चले गये। वहाँ दीर्घकालतक राज्य करनेके पश्चात् वे स्वर्गलोगमें गये।<br><br>युधिष्ठिर! यह प्राचीन इतिहास तुमको सुनाया गया है। जो इसे कहते और सुनते हैं, वे यमलोक नहीं देखते और पापयोनिमें नहीं जाते हैं।
<div align="center">~~ ० ~~</div>पुराणलक्षण, कलिकालका प्रभाव तथा राजर्षि वसुदानके यज्ञमें प्रकट हुई कपिला और नर्मदाके संगमका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! सर्ग, प्रतिसर्ग, वंश, मन्वन्तर और वंशानुचरित—ये पुराणके पाँच लक्षण हैं*। कलियुगमें मनुष्य प्रायः असमर्थ और अल्पजीवी होंगे। बुद्धिहीन तथा दुराचारपरायण होंगे। स्वाध्याय, वषट्कार, तप और यज्ञ आदि कोई भी सत्कर्म उनके द्वारा न होगा। वे स्त्रियोंकी कामना रखनेवाले और विषयलोलुप होंगे। ब्राह्मण सकामभावसे ही कर्म करनेवाले और याचक होंगे। सदा दान लेंगे और परिवारके भरण-पोषणमें ही आसक्त रहेंगे। स्त्रियोंके प्रति आसक्ति होनेके कारण वे आत्माको नहीं जानेंगे। धर्मिष्ठ और तपस्वी भी कुकर्म करेंगे। कलिकाल आनेपर अधिकांश लोग वाममार्गी और दिगम्बर हो जायँगे। सब प्रजा एक वर्णकी हो जायगी। राजा म्लेच्छ होगा। हीनयुग आनेपर जब भगवान् विष्णुका बौद्धावतार होगा, तब मनुष्य अल्पायु, अल्पवीर्य तथा अल्पपराक्रमी होंगे। नाना प्रकारके देशव्यापी उपद्रव होते रहेंगे। चाण्डालोंके वंशमें उत्पन्न ब्राह्मण वेदोंको पढ़ावेंगे। दूसरोंको वेदका उपदेश करेंगे और अपने वेद बेचेंगे। धन पानेके लोभसे राजाओंके दरबारमें जायँगे। अग्निहोत्र और कन्याओंका विक्रय करेंगे। कलियुगके वेदपाठी ब्रह्मचर्यव्रतसे रहित होंगे। दस-बारह | वर्षोंकी बालिका भी गर्भ धारण करेगी। स्त्री अपने पतिका और पुत्र अपने माता-पिताका आदर नहीं करेंगे। बहू सासकी और पुत्री माताकी बात नहीं मानेगी। ये सब बातें यहाँ संक्षेपसे बतायी गयी हैं।<br><br>युधिष्ठिर! एक दिव्य कथा श्रवण करो, जो सब पापोंका नाश करनेवाली है।<br><br>पूर्वकालमें वसुदान नामवाले एक चक्रवर्ती राजर्षि थे। उनकी राजधानी अयोध्या थी। उनके राज्यमें कोई दीन, दुःखी अथवा दरिद्र नहीं होता था। प्रत्येक गाय स्वयं ही इच्छानुसार दुग्ध देनेवाली और पृथ्वी हरी-भरी खेतीसे सुशोभित थी। एक समय राजर्षि वसुदान वेदके पारंगत ब्राह्मण ऋत्विजोंके साथ यज्ञकी सब सामग्रीका संग्रह करके अमरेश्वरतीर्थमें गये। वहाँ उनका यज्ञ प्रारम्भ हुआ और निर्विघ्न समाप्त भी हो गया। अवभृथके जलसे वहाँकी स्वर्णनिर्मित समूची पृथ्वी भीग गयी। उस यज्ञमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवका एक साथ ही पूजन किया गया और वहाँ होमसे दूध और घीकी पृथक्-पृथक् धाराएँ बह निकलीं। गोमूत्रकी भी एक धारा बहने लगी और वेदोंके पारंगत विद्वान् ऋषि-मुनियोंने देवताओंको जो स्नान कराया था, उस जलकी भी एक धारा बह
* सर्गश्च प्रतिसर्गश्च वंशो मन्वन्तराणि च। वंशानुचरितं चेति पुराणं पञ्चलक्षणम्॥ (स्क० पु०, आव० रे० ३५। १५)