संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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चली। इन सब धाराओंके आपसमें मिल जानेपर ब्रह्मर्षियों और देवताओंने देखा, एक नदी बह रही है। वह नदी कपिला नामसे प्रसिद्ध हुई। कपिला और नर्मदाका जहाँ संगम है, वहाँ रुद्रावर्ततीर्थ बताया गया है।
तदनन्तर दक्षिणाओंद्वारा सब ब्राह्मणोंका भलीभाँति सत्कार किया गया। उन्हें नाना प्रकारके वस्त्राभूषणोंसे विभूषित करके हाथी, घोड़े और रथपर बिठाया गया। देवताओंको भी ऐसा ही सत्कार प्राप्त हुआ। सब देवता सन्तुष्ट होकर राजर्षि वसुदानसे बोले—‘महाभाग! इस यज्ञसे हम बहुत प्रसन्न हैं, तुम कोई वर माँगो।’
वसुदान बोले—देवताओ! नर्मदा और कपिलाके संगममें स्नान करके जो मनुष्य महादेवजीकी पूजा करते हैं, वे दिव्य विमानोंद्वारा स्वर्गलोकमें जायँ और जिनकी यहाँ मृत्यु हो, वे पुनः संसारमें जन्म न लेकर मुक्त हो जायँ।
देवताओंने कहा—राजन्! तुम्हारे सभी अभीष्ट मनोरथ यथेष्ट सफल होंगे।
ऐसा कहकर सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि वसुदान भी वेदवेत्ता ब्राह्मणोंके साथ परम आनन्दसे युक्त हो अयोध्यापुरीमें लौट आये। उस तीर्थके प्रभावसे अन्तःपुर एवं परिवारसहित उन्होंने प्रचुर भोगोंका उपभोग किया और अन्तमें वे भगवान् शिवके परम धाममें गये। युधिष्ठिर! इस प्रकार नर्मदा और कपिलाके संगमका वृत्तान्त बताया गया। इसके श्रवण और कीर्तनसे मनुष्यको संसार-बन्धनसे छुटकारा मिल जाता है।
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अमरावतीमें भगवान्का दैत्यसूदनरूपसे निवास तथा वहाँके अन्यान्य तीर्थों और शिवलिंगोंका माहात्म्य
मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाराज! नर्मदाके दक्षिण और कपिलाके पश्चिम तटपर भगवान् विष्णुकी मनोहर पुरी अमरावती है, जिसमें भगवान् लक्ष्मीपति कोटि कल्प और युगोंतक निवास करते हैं। प्राचीन कालमें देवताओं और असुरोंके युद्धमें देवकण्टक दानवोंद्वारा सब देवता परास्त हो गये। उस समय दानवोंके अत्याचारसे पीड़ित होकर पृथ्वीदेवी और ब्रह्मा आदि देवता क्षीरसागरमें शयन करनेवाले भगवान् विष्णुकी शरणमें गये और उन्हें प्रणाम करके इस प्रकार उनकी स्तुति करने लगे—‘दैत्योंका अन्त करनेवाले जनार्दन! देव! जगन्नाथ! आपकी जय हो। वेदोंके मूलस्थान जगदीश्वर! हम आपकी शरणमें आये हैं, आप हमारी रक्षा करें।’
इस स्तोत्रको सुनकर भगवान् विष्णुने कहा—ब्रह्मन्! भूलोकमें जो-जो दुर्धर्ष दानव हैं, उन सबका मैं शीघ्र ही नाश करूँगा। ऐसा कहकर भगवान् विष्णु देवताओंके साथ आये और सम्पूर्ण लोकोंके हितके लिये अपने सुदर्शनचक्रसे दैत्योंके मस्तक काटने लगे। तब समस्त दानव भगवान् विष्णुके भयसे थर्रा उठे और पृथ्वी छोड़कर रसातलमें भाग गये। तदनन्तर पुनः ब्राह्मण, देवता और तपस्वीजनोंके यज्ञ पूर्ववत् होने लगे। युधिष्ठिर! उस पुरी (अमरावती)-में भगवान् विष्णु दैत्यसूदनके नामसे प्रतिष्ठित हुए। जो मनुष्य वहाँ प्राणत्याग करता है, वह विमानके द्वारा विष्णुलोकमें सम्मानित होता है। कपिलाके पश्चिममें नीलगंगाका आगमन हुआ है। उसमें स्नान करके मनुष्य कोटितीर्थके सेवनका फल पाता है। सुदर्शन, दैत्यसूदन, विष्ण्वावर्त, शिवावर्त और लक्ष्म्यावर्त—इन तीर्थोंमें जो दान दिया जाता है, उसका पुण्य असंख्य होता है। वहाँ श्रीविष्णुको प्रसन्न करके मनुष्य अनन्त फलका भागी होता है। श्रीविष्णुक्षेत्रका