संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १००९ ---|---
प्रमाण एक कोसका बताया गया है। उसके भीतर ब्रह्महत्याका प्रवेश नहीं होता। जो वहाँ एक मासतक उपवास तथा अग्निहोत्र करता है, जो स्त्री वहाँ पातिव्रत्यधर्मका पालन करती है तथा जो मनुष्य स्वाध्याय, यज्ञ, चान्द्रायण, पराक तथा पितरोंका तिल और जलसे तर्पण करते हैं, उनके पितर तृप्त होकर भगवान् विष्णुके धाममें विहार करते हैं और उन मनुष्योंको भी अपने सत्कर्मोंका उत्तम फल प्राप्त होता है। जो एकरात्र, त्रिरात्र, कृच्छ्र, सान्तपन, अतिकृच्छ्र, पर्णकृच्छ्र तथा अन्यान्य वैष्णवव्रत करता है और जो दोनों पक्षोंकी एकादशीको भोजन नहीं करता है, वह इन व्रतोंके द्वारा भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है। चाण्डाल, श्वपच अथवा पशु-पक्षीकी योनिमें पड़ा हुआ प्राणी भी यदि इस तीर्थमें अपने प्राणोंका त्याग करता है, तो वह भगवान् विष्णुके लोकमें जाता है। इस तीर्थमें मासोपवासव्रत करनेवाले पुरुषों तथा पतिव्रता स्त्रियोंको देखकर धर्मराज स्वयं ही वहाँ जा उनके लिये अर्घ्य समर्पण करते हैं और उन महात्माओंको वैष्णवलोकका दर्शन कराकर लौट आते हैं। ब्रह्माजीके मानसपुत्र सप्तर्षियोंने एक समय धर्मराजसे पूछा- 'धर्म ! क्या कारण है कि आप यहाँ स्वयं पैदल विचर रहे हैं? इससे हमें बड़ा विस्मय हुआ है। महाभाग! इसका कारण बताइये?'
यह सुनकर धर्मराजने हँसते हुए कहा- मुनिवरो ! मेरे भयंकर दूत पतिव्रता स्त्रियों, मासोपवासी पुरुषों तथा इन सबके विमानोंकी उज्ज्वल दीप्तिकी ओर दृष्टिपात करनेमें असमर्थ हो रहे हैं। इसलिये वे लौट गये हैं। इसीलिये मैं पैदल गया था।
मार्कण्डेयजी कहते हैं- राजन् ! अमरावतीमें अमिततेजस्वी भगवान् विष्णुका निवास है। वहाँ किया हुआ श्रीहरिका पूजन कलियुगके दोषोंका नाश करनेवाला है। नर्मदाके उत्तर तटपर एक अन्य श्रेष्ठ देवता हैं, जो ब्रह्मेश्वरके नामसे विख्यात हैं। वे सब पापोंका नाश करनेवाले हैं। उनके पूजनसे पापराशि नष्ट होती है और पितर तृप्त होकर ब्रह्मलोकको प्राप्त होते हैं। लंकेश्वरसे दक्षिण सिद्धलिंग बताया गया है। उसके पूजन और स्पर्शसे गणपतिपदकी प्राप्ति होती है। विश्वेश्वर नामक महालिंग सर्वदेवमय और शुभ है। वैशाख शुक्ला अष्टमीको उसके पूजनसे मनुष्य दस हजार शिवलिंगोंकी पूजाका फल पाता है और भगवान् शिवका अनुचर होता है। महाराज ! तत्पश्चात् नर्मदा नदीके उत्तर तटकी यात्रा करे। वहाँ परम सिद्धिदायक पापनाशन लिंग है। वहाँ स्नान, तर्पण और पूजन करनेसे ब्रह्महत्याका नाश होता है। उसके बाद सब पापोंका नाश करनेवाला ऋणमोचन लिंग है। उसके पूजनसे अनेक जन्मोंका ऋण नष्ट हो जाता है। ऋणमोचनके दर्शनपूर्वक तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितर तबतक तृप्त रहते हैं, जबतक कि सूर्य, चन्द्रमा और ताराओंकी स्थिति बनी रहती है। नर्मदा और चरुके संगममें शास्त्रोक्त रीतिसे स्नान करके संगमके जल और बिल्वपत्रसे जो महादेवजीको स्नान कराता और उनकी पूजा करता है, उसकी उमा-महेश्वरधामसे कभी पुनरावृत्ति नहीं होती। चतुष्केश्वर नामक एक सिद्धलिंग है, जो आँवलेके फलके बराबर है। देवता और दैत्य उसका पूजन करते हैं। मनुष्य उसे नहीं देख पाते। जो परम धार्मिक पुत्र उस तीर्थमें श्राद्ध करता है, उसके पितर महाप्रलय कालतक तृप्त रहते हैं। चरु नामवाली नदी यज्ञ पर्वतसे निकली है। पूर्वकालमें अपने पुरोहित बृहस्पतिजीके साथ देवराज इन्द्रने यहाँ यज्ञ किया था। तबसे लोकमें समस्त देवताओंद्वारा इसकी परम पवित्र महिमाका गान किया जाता है। वहाँ दारुवन नामसे विख्यात एक तीर्थ है, जो पृथ्वीपर सबके द्वारा सेवित होता है। त्रेतामें साठ हजार तपस्वी मुनियोंने उस तीर्थमें निवास किया था। वे सभी कन्द-मूल-फलका आहार करनेवाले और अग्निहोत्रपरायण थे। इस तीर्थके प्रभावसे उन्हें ब्रह्मलोककी प्राप्ति हुई है। दारुवनमें सब पापोंका नाश करनेवाला एक शिवलिंग है,