भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1039
१०१०* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

जिसके पूजनसे मनुष्य गणपति होता है। वहीं सर्वदेवमय शुभ विमलेश्वर लिंग है। वहाँ स्नान करनेसे मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं और जो मरते हैं, उनका पुनर्जन्म नहीं होता। उस तीर्थमें देवता और असुर सबको निर्मल करके पिनाकधारी महादेव अपने धाममें ले जाते हैं। जो वहाँ तिल, जल और पिण्डदान देकर पितरोंको तृप्त करता है, वह भगवान् महेश्वरके परम धामको जाता है। युधिष्ठिर! विमलेश्वर लिंगको तुम साक्षात् महेश्वर ही समझो। वहीं एक व्याघ्रेश्वर लिंग भी है, जहाँ व्याघ्रीको स्वर्गलोककी प्राप्ति हुई थी। उस तीर्थमें तिल, जल और हविष्यका पिण्डदान देनेसे पुत्र अपने पहले और पीछेकी सौ-सौ पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है और स्वयं जबतक चौदह इन्द्र व्यतीत होते हैं तबतक वरुणलोकमें निवास करता है। व्याघ्रेश्वरदेवके पूजन, कीर्तन और श्रवणसे मनुष्य इन्द्रलोकको प्राप्त होता है।


अमरकण्टकपर सूत्रयागका माहात्म्य, कावेरी-संगम और पयोष्णी-संगमकी महिमा तथा वहाँके अन्य तीर्थोंके सेवनकी महत्ता

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! चन्द्रग्रहण, सूर्य्यग्रहण, षडशीतिमुख, युगादि, विषुव, व्यतिपात, संक्रान्ति, कार्तिक, माघ तथा वैशाखकी पूर्णिमा, कपिलषष्ठी, वैशाख शुक्ला तृतीया, कार्तिक शुक्ला नवमी, माघकी अमावास्या तथा भाद्रपद कृष्णा त्रयोदशी—ये युगादि तिथियाँ हैं। इन पर्वोंमें सूत्रयाग करना चाहिये। भगवान् शंकरके तुल्य जो पर्वत है, उसे उमासहित महादेवजी तथा गणेशजीका स्वरूप समझकर जो सूतसे लपेटता है, वह सहस्रों युगोंतक स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो स्त्री उस पर्वतको सूतसे आवेष्टित करती है, वह पतिसे संयुक्त एवं पुत्रवती होती है। राजन्! रेशमी सूत अथवा कपासका सूत लेकर उसे नौ तागोंका या दस, बारह, अठारह अथवा चौबीस तागोंका कर ले। फिर उसे कोटितीर्थमें धोवे और गन्ध एवं धूपसे सुवासित करे। तत्पश्चात् उसमें फूलकी माला बाँधे और रातमें दीपावली जलावे। ॐकारतीर्थमें विधिपूर्वक रातमें जागरण करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर रहे और निराहार रहकर रात्रि व्यतीत करे। फिर प्रातःकाल ॐकारेश्वरका पूजन एवं उत्सव करे। एकाग्रचित्त होकर अक्षयवटमें सूत बाँधे और सर्वतीर्थमय शुभस्वरूप कोटितीर्थकी यात्रा करे। वहाँसे ऋणमोचन, पापनाशन, नरकेश्वर, गन्धर्वेश्वर और अंगारेश्वरतीर्थमें होते हुए सर्वतीर्थमय ब्रह्मावर्तमें जाय। वहाँ स्नान करके मनुष्य शिवलोकको पाता है। उस तीर्थमें तिल और जल देनेसे पितरोंकी सद्गति होती है। सर्वपापनाशक दारुकेश्वर लिंगके पूजनसे मनुष्य विद्याधर होता है। दारुकेश्वरसे भृगुलिंगके समीप जाय। वहाँ जानेमात्रसे मनुष्य ब्रह्महत्यासे मुक्त हो जाता है। वहाँसे जालेश्वरतीर्थको जाय, जो सब तीर्थोंमें उत्तम है। वहाँ स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। जालेश्वरमें तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको अक्षय गति प्राप्त होती है। जालेश्वरसे पुनः कोटितीर्थमें आवे और विधिपूर्वक स्नान करके ॐकारेश्वर महादेवके श्रीअंगोंमें श्वेत सूत बाँधे। फिर ॐकारेश्वरकी पूजा करके दीपमाला जलावे। तत्पश्चात् इस प्रकार प्रार्थना करे—‘महेश्वर! आपके प्रसादसे मेरा यह सूत्रयाग सफल हो।’ तदनन्तर यतियोंको भोजन करावे और ब्राह्मणोंको यथाशक्ति दक्षिणा दे। उसके बाद भाई-बन्धु और भृत्यवर्गके साथ पारण करे। जो शारीरिक कष्ट उठाकर शिवपर्वतकी परिक्रमा करता है, उसे पग-पगपर यज्ञका फल प्राप्त होता है।

उत्तर और दक्षिणमें जो तीर्थ हैं, वे भगवान् शिवके साक्षात् स्थान कोटितीर्थमें विलीन होते हैं। समुद्रपर्यन्त पृथ्वीमें जो तीर्थ हैं, वे परम-