संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०११
| पदस्वरूप कोटितीर्थमें लयको प्राप्त होते हैं। नृपश्रेष्ठ! नर्मदा और अमरावती तथा नर्मदा और ॐकारेश्वरके मध्यभागमें कोटितीर्थ विद्यमान है, जिसमें पातालके एक लाख तीर्थ निवास करते हैं। साक्षात् महादेवजीने कपिला और नर्मदाके बीचमें उन सब तीर्थोंकी स्थापना की है। महाराज ! इसके बीच रुद्रावर्तके जलमें जो मनुष्य विधिपूर्वक स्नान करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं तथा जो नर्मदाके उत्तर तटमें निवास करते हैं, वे रुद्रलोकके निवासी होते हैं। जो वाम भाग (दक्षिण तट)-पर निवास करते हैं, वे विष्णुलोकमें जाते हैं। जो अमरकण्टक पर्वतपर पूर्व और पश्चिम भागमें निवास करते हैं, वे रुद्र, ब्रह्मा और विष्णुके लोकमें जाते हैं। सूर्यग्रहणके समय न्यायोपार्जित धनका कोटितीर्थमें दान करनेसे अनेक प्रकारके पुण्य होते हैं। कावेरीके पूर्वभागमें जहाँतक पर्यंक पर्वत है, उसके बीचमें तीर्थोंकी संख्या दस लाख बतायी गयी है। नर्मदासे लेकर जमदग्नि आश्रमके बीचमें श्रीकण्ठ और नीलकण्ठ नामक शिवलिंग स्थित हैं। नर्मदाके उभय तटोंपर एक कोसके भीतर जितने भी स्वयम्भू देवता हैं, उन सबको सिद्धिदायक जानना चाहिये। वे सभी इच्छानुसार काम, भोग और फल देनेवाले हैं। भारत ! यह अमरकण्टक पर्वत जिस प्रकार सब ओरसे पवित्र है, वैसा पवित्र मुझे तीनों लोकोंमें दूसरा कोई पर्वत नहीं दिखायी देता। कोटितीर्थ और अमरकण्टक दोनों ही परम पवित्र हैं। इन्हें स्वर्ग, मोक्ष तथा सम्पूर्ण सिद्धियोंका दाता समझो। चतुर्दशी मंगलवारको जब व्यतिपात योग हो, तब कावेरीसंगममें स्नान करनेसे सहस्रगुना पुण्य होता है। जो शस्त्रद्वारा मारे गये हैं, ऐसे लोगोंके निमित्त वहाँ तिलमिश्रित जलकी अंजलि देनेसे और एकोद्दिष्ट श्राद्ध करनेसे वे स्वर्गलोक पाते हैं। नर्मदा और कावेरीके जल और जंगली तिलसे तृप्त किये हुए पितर परम गतिको प्राप्त होते हैं। सहस्रों धाराओंसे कावेरी नदी इस भूतलपर प्रसिद्ध है। कावेरीके जलसे समस्त पृथ्वी व्याप्त है। | नर्मदाके दक्षिण तटपर वाराह और विन्ध्याचलमें सम्पूर्ण देवताओंको प्रत्यक्ष दिखायी देनेवाली पयोष्णी नदी प्रकट हुई है। पूर्वकालमें महादेवजीके आराधना करनेपर साक्षात् पार्वतीस्वरूपा पयोष्णी नदीका प्रादुर्भाव हुआ है। वह यशस्वी वाराह पर्वतके शरीरसे निकली है। उसमें स्नान करनेपर मनुष्य निश्चय ही इस संसारमें जन्म नहीं लेता। युधिष्ठिर ! वहाँ तिलोदक देनेसे पितर लाखों वर्षोंतक भगवान् शिवके लोकमें क्रीडा करते हैं। चन्द्रग्रहणके समय वाराह और विन्ध्याचल पर्वतपर कुरुक्षेत्रके समान पुण्य होता है। यह साक्षात् भगवान् शंकरका कथन है। वाराह पर्वतसे लेकर पयोष्णी नदीके संगमतक एक करोड़ तीर्थ बताये गये हैं। पयोष्णीसंगममें सोमावर्त नामक तीर्थकी स्थिति कही जाती है। वह स्थान सब ओरसे पवित्र है। जहाँ चार भुजाधारी पुरुषोत्तम भगवान् श्रीपति निवास करते हैं, उस एक कोसके क्षेत्रको विष्णुक्षेत्र जानना चाहिये। आश्विनमासके कृष्ण पक्षकी चतुर्दशी और अमावास्या तथा शुक्ल पक्षकी प्रतिपदा—ये क्रमशः उस तीर्थके पर्व हैं। चतुर्दशीको चारका योग होनेपर अर्थात् मास, पक्ष, तिथि और विष्णुक्षेत्रका संयोग होनेपर वहाँ अमृतकी धारा बहती है। उस दिन वहाँ तर्पण करनेसे पितर अवश्य ही तृप्त होते हैं। सूर्यग्रहणके समय कुरुक्षेत्रमें जो फल बताया गया है, वह तापी और पयोष्णीके संगममें भी प्राप्त होता है। नर्मदाके दक्षिण पातालसे एक तीर्थ प्रकट हुआ है, जो तीनों लोकोंमें कावेरीकुण्डके नामसे विख्यात हुआ है। उसमें स्नानमात्र करनेसे मनुष्य गणाध्यक्ष पदको प्राप्त करता है। वहाँ कुण्डेश्वर नामक एक सिद्धलिंग है, जो देवताओं और सिद्धोंसे सुसेवित है। उस पवित्र लिंगका जो भूलसे भी पूजन कर लेता है, उसके पुण्यकी कोई संख्या नहीं है। स्वयं प्रकट हुए जो स्वयम्भू लिंग हैं, वे स्वर्ग और मोक्ष देनेवाले हैं। कावेरीमें मनुष्य जहाँ-कहीं भी स्नान करता है, वह अश्वमेधके फलको पाकर विष्णुलोकमें प्रतिष्ठित होता है। |
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