संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ
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| १०१२ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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भद्ररुद्रेश्वरकी महिमा, दुर्वासाजीके द्वारा अमरकण्टकका गयातीर्थके तुल्य होना तथा राजा भरतका यज्ञ
| मार्केण्डेयजी कहते हैं—राजन्! एक भद्र-रुद्रेश्वर नामक लिंग है, जो उत्तम सिद्धियोंको देनेवाला है। पूर्वकल्पमें भद्र और रुद्र नामवाले दो गन्धर्व थे। वे दोनों भाई थे। उन्होंने विधिपूर्वक इस शिवलिंगकी अर्चना करके विद्याधरलोक प्राप्त किया।<br><br>आदिकल्पके चाक्षुष मन्वन्तरमें सत्ययुग आनेपर निमि नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हुए। वे ब्राह्मणके क्रोधसे पक्षी-योनिमें पड़ गये थे। उन्होंने सोमवती अमावास्यामें यहाँ स्नान करके इस तीर्थके माहात्म्यसे पक्षी-योनि त्यागकर स्वर्गलोक प्राप्त किया।<br><br>एक समय उग्र तपस्वी दुर्वासा मुनि सब तीर्थोंमें घूम रहे थे। घूमते-घूमते वे पितरोंके हितकी कामनासे पितृतीर्थ गयाजीमें गये। वहाँ स्नान करके महादेवजी तथा ब्रह्माजीकी पूजा करनेके पश्चात् उन्होंने कुश और तिलयुक्त जलांजलि तथा पिण्ड पितरोंके लिये अर्पण किये। पिण्डदान करके दुर्वासाजीने मुनियोंसे कहा—'मुनिवरो! मैंने सुना था कि इस तीर्थमें पितरलोग उपस्थित होकर अपने हाथसे पिण्ड ग्रहण करते हैं, वह बात आज मैं नहीं देखता। अतः मेरी तो तीर्थयात्रा व्यर्थ हो गयी।'<br><br>मुनि बोले—अमावास्याको यहाँ दिया हुआ पिण्डदान पितरलोग अपने हाथमें लेते हैं, अतः आप अमावास्यातक प्रतीक्षा कीजिये।<br><br>दुर्वासाने कहा—अब न तो यहाँ पिण्ड दूँगा और न स्नान एवं दान ही करूँगा।<br><br>इसके बाद उन्होंने मुनिवर एरण्डसे कहा—आप क्यों अपने शरीरको क्लेश दे रहे हैं? कमण्डलु हाथमें लेकर ॐकारतीर्थ और नर्मदा नदीकी यात्रा कीजिये। ऐसा कहकर दुर्वासा मुनि ऋषियोंके साथ अमरकण्टक पर्वतपर आये और ॐकारेश्वरकी पूजा करके उनका इस प्रकार | स्तवन किया।<br><br>दुर्वासा बोले—कालस्वरूप महादेवजीको नमस्कार है। त्रिमूर्तिधारी शिवको नमस्कार है। अव्यक्त और व्यक्तस्वरूप अनन्तानन्तगामी भगवान् शंकरको नमस्कार है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद जिनके स्वरूप हैं, उन सर्वज्ञ शिवको नमस्कार है। भवोद्भव! जगन्नाथ! उमाकान्त! आपको नमस्कार है। कल्याणकारी सुखदाता भवको नमस्कार है। मंगलकारी शंकरको नमस्कार है। तीन नेत्रोंवाले आपको नमस्कार है। अर्धचन्द्रधारी, श्रीकण्ठ और नीलकण्ठको नमस्कार है। सर्पोंका आभूषण धारण करनेवाले त्रिशूलधारी रुद्रको नमस्कार है। पिनाक धनुष धारण करनेवाले महादेवको नमस्कार है। प्रभो! आप शर्व, सर्वरूप और चराचर जगत्स्वरूप हैं, आपको नमस्कार है। सुरेश्वर! इस लोक और परलोकमें मेरे अपराधको आप क्षमा करें। देवेश! उमापते! आपके समान दूसरा कोई नहीं है।<br><br>यह दिव्य स्तुति सुनकर ॐकारस्वरूपधारी भगवान् शिव बोले—महाभाग! तुम वर माँगो।<br><br>दुर्वासाने कहा—देव! यह तीर्थ गयाके समान हो जाय।<br><br>भगवान् ॐकार बोले—तपोधन! मेरे प्रसादसे यह तीर्थ आजसे ही गयातुल्य हो जायगा।<br><br>इस प्रकार वरदान पाकर ब्रह्मर्षि दुर्वासा अमरकण्टकके पूर्वभागमें मुनियोंके साथ रहने लगे।<br><br>मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभाग! तदनन्तर नर्मदात्तटपर विद्यमान शल्या और विशल्या तीर्थमें जाय। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है। उस तीर्थमें अतिशय उत्तम यज्ञेश्वर तथा धूपेश्वर लिंग हैं। उनको सिद्धिदाता और मोक्षदाता जानो। उस तीर्थमें तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितर सूर्य, चन्द्रमा और नक्षत्रोंके स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं।<br><br>राजन्! सूर्यवंशमें भरत नामसे प्रसिद्ध एक |