भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1042, कुल 1406 में से

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पृष्ठ 1042
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०१३

राजा हो गये हैं, जो सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करते थे। एक समय राजा भरतने यज्ञकर्ममें तत्पर हो भृगुपर्वतके दक्षिण भागमें दस योजन विस्तृत यज्ञभूमि निर्माण करायी, जो कुण्ड और यज्ञमण्डपसे सुशोभित थी। यज्ञकी सब सामग्रियोंसे सम्पन्न हो वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनिसे आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए महाराज भरतने यज्ञ प्रारम्भ किया। उन्होंने होमसे सप्तलोकवासी देवताओंको तृप्त किया। इस प्रकार अमित तेजस्वी राजाका यज्ञ अभी चल ही रहा था कि उसका विध्वंस करनेके लिये भयानक रूपवाले राक्षस माल्यवान्, सुमाली, सुकेशी, शंख और दूषण आदि सहस्रोंकी संख्यामें आ धमके। उन्होंने यज्ञकी समस्त वस्तुएँ नष्ट-भ्रष्ट कर डालीं। सब देवता भाग चले, ऋत्विज मार गिराये गये। इस प्रकार राक्षसोंद्वारा उस यज्ञके नष्ट किये जानेपर राजा भरत आहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निकी भाँति क्रोधसे जल उठे और समस्त राक्षसोंका उन्होंने संहार कर डाला। तत्पश्चात् अपने ब्राह्मण ऋत्विजोंको राक्षसोंद्वारा भयभीत, धराशायी तथा मारे गये देख उन्हें बड़ा शोक हुआ। वे देवमन्त्री बृहस्पतिजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आप सब देवताओंके गुरु, तीनों कालकी बातें जाननेवाले तथा त्रिवेदवेत्ता हैं। देवकण्टक राक्षसोंने मेरे लिये आये हुए इन ब्राह्मणोंकी हत्या कर डाली है। इसका प्रायश्चित्त मुझे क्या करना चाहिये।'

बृहस्पतिजी बोले—नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हें संजीवनी विद्या देता हूँ।

उस विद्याके प्रभावसे राजाने सब ब्राह्मणोंको जीवित किया। नूतन जीवन पाकर ब्राह्मणोंने देवगुरु बृहस्पतिकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर पूर्ण तथा उत्तम दक्षिणासे युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ। यज्ञमें जो यूप गड़े थे, उन्हींके मूलसे वहाँ शल्या और विशल्या नामवाली दो नदियाँ प्रकट हुईं। वे दोनों लोकपावनी नर्मदामें मिल गयीं। इसके बाद देवतालोग अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गको चले गये। राजा भरतने भी ब्राह्मणोंके साथ अपनी पुरीमें प्रवेश किया। भरतेश्वरलिंग ब्रह्मयोनिमें स्थित है।


ब्रह्माजीके द्वारा सौम्या दृष्टिसे दानवोंका निवारण तथा रुद्रके एक सौ एक नामोंद्वारा शिवजीका स्तवन

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! जो 'ॐ' इस एक अक्षरका जप और उसके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।* वेदमाता गायत्री ॐकारसे ही प्रकट हुई हैं। 'ॐ' इस एक अक्षरवाले तत्त्वमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों प्रतिष्ठित हैं। ॐकार ही वेदका मूल है। उसीसे श्रुतिरूपा शाखाएँ फैली हुई हैं। स्मृति और आगम ये फल, फूल एवं पत्ते हैं। जैसे ॐकार सब विद्याओंका आदि है, उसी प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देवताओंके आदि हैं। तीनों सन्ध्याएँ, तीनों काल, त्रिविध अग्नि, तीनों लोक तथा धर्म, अर्थ और काम—ये तीन वर्ग—सभी ॐकारमें ही स्थित हैं।

युधिष्ठिर! स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगमें नर्मदाके तटपर रहनेवाले देवताओंको कंकोल, कालिकेय और कालक नामवाले दानवोंने परास्त करके वहाँसे मार भगाया। वे देवता ब्रह्माजीके साथ महादेवजीकी शरणमें गये। तब सात पातालोंको भेदकर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का उच्चारण करते हुए पर्वतसे एक लिंग प्रकट हुआ, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उन लिंगरूपी


* ओमित्येकाक्षरं राजन् व्याहरन् समनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥
(स्क० पु०, आव० रे० ४७। १९-२०)

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