संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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भगवान् शिवने कहा—'ब्रह्मन्! तुम लोकोंमें शान्ति स्थापित करनेवाली सौम्या इष्टिको अपने रुचिके अनुसार करो। इसके लिये मैंने तुम्हें वेद समर्पित किये हैं।' तब ब्रह्माजीने दैत्योंका विनाश करनेवाली रौद्री इष्टि तथा लोकोंमें शान्ति स्थापित करनेवाली सौम्या इष्टिका अनुष्ठान किया। उस भयंकर इष्टिको देखकर ब्रह्माजीके शापके भयसे उद्विग्न हो सब दानव दसों दिशाओंमें भाग गये। भगवान् ॐकारके प्रभावसे देवता निर्भय हो गये। उस समय सुरेश्वर शिवका पूजन करके देवताओंने स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। मार्कण्डेयलिंग, अविमुक्तलिंग, केदारलिंग, अमरेश्वर ओंकारलिंग तथा महाकाललिंग—इन पाँच पवित्र शिवलिंगोंका जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर कीर्तन करता है, वह सब तीर्थोंके सेवनका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जिसके चार कोसके अंदर ब्रह्महत्या नहीं प्रवेश करती, उस कावेरीके तटपर आग्नेयलिंग और सिद्धलिंग विद्यमान हैं। वहीं शिवखात नामक तीर्थ है, जिसमें स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। जो कोई वहाँ पितरोंके लिये श्राद्ध एवं तिलोदक देता है, उसने मानो कोटिसहस्र युगोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर दिया है।
युधिष्ठिर! तदनन्तर भगवान् ॐकारने ब्रह्माजीको मन्त्रोपदेश किया। ब्रह्माजीने उनका उपदेश सुनकर इस प्रकार उनकी स्तुति की—'जो आकाशके तुल्य सर्वत्र व्यापक तथा आकाशका भी संहार करनेवाले हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है, कोई स्वामी नहीं है, जो अमृत एवं ध्रुवस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जो कल्याणकी उत्पत्तिके स्थान, सनातन, योगासनपर विराजमान, योगाभ्यासपरायण तथा आकाशको हर लेनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है। ॐकारस्वरूप एवं सबकी उत्पत्तिके कारण शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शिवको नमस्कार है। सबकी उत्पत्तिके कारण शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शिवको नमस्कार है। मूर्द्धारूप तत्पुरुषको, मुखस्वरूप अघोरको, हृदयस्वरूप वामदेवको, गुह्यस्वरूप सद्योजातको और सर्वमूर्ति ॐकारको बार-बार नमस्कार है। (यहाँतक भगवान् रुद्रके सोलह नाम पूरे होते हैं *।) (१७) कलातीत, (१८) अव्यय, (१९) बुद्ध, (२०) वज्रदेहोपमर्दन, (२१) अध्यक्ष, (२२) विधु, (२३) शास्ता, (२४) पिनाकी, (२५) त्रिदशाधिप, (२६) अग्नि, (२७) रुद्र, (२८) हुताश, (२९) पिंगल, (३०) पावन, (३१) हर, (३२) ज्वलन, (३३) दहन, (३४) वस्तु, (३५) भस्मान्त, (३६) क्षमन्तक, (३७) अपमृत्युहर, (३८) धाता, (३९) विधाता, (४०) कर्त्ता, (४१) काल, (४२) धर्मपति, (४३) शास्ता, (४४) वियोक्ता, (४५) अनवम (न्यूनतारहित), (४६) प्रिय, (४७) निमित्त, (४८) वारुण, (४९) हन्ता, (५०) क्रूरदृष्टि, (५१) भयावह, (५२) ऊर्ध्वदृष्टि, (५३) विरूपाक्ष, (५४) दंष्ट्रावान्, (५५) धूम्रलोचन, (५६) बाल, (५७) अतिबल, (५८) पाशहस्त, (५९) महाबल, (६०) श्वेत, (६१) विरूप, (६२) रुद्र, (६३) दीर्घबाहु, (६४) जडान्तक, (६५) शीघ्र, (६६) लघु, (६७) वायुवेग, (६८) भीम, (६९) वडवामुख, (७०) पंचशीर्षा, (७१) कपर्दी, (७२) सूक्ष्म, (७३) तीक्ष्ण, (७४) क्षपान्तक, (७५) निधीश, (७६) रौद्रवान्, (७७) धन्वी, (७८) सौम्यदेह, (७९) प्रमर्दन, (८०) अनन्त-पालक, (८१) धार, (८२) पातालेश, (८३) सधूम्र, (८४) शाश्वत, (८५) शर्व, (८६) सर्वपिंग, (८७) करालवान्, (८८) विष्णु, (८९) ईश, (९०) महात्मा, (९१) सुख, (९२) मृत्युविवर्जित,
* (१) व्योमसंख्यायी, (२) सर्वव्यापी व्योमहर, (३) अनन्त, (४) अनाथ, (५) अमृत, (६) ध्रुव, (७) शाश्वतशम्भव, (८) योगपीठसंस्थित, (९) नित्ययोगयोगी, (१०) शिव, (११) सर्वप्रभव, (१२) ईशान, (१३) तत्पुरुष, (१४) अघोर, (१५) वामदेव, (१६) सद्योजात।