संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1044, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०१५
(९३) शम्भु, (९४) विभु, (९५) गणाध्यक्ष, (९६) त्र्यक्ष, (९७) दिवस्पति, (९८) समवाद, (९९) विवाद, (१००) प्रहविष्णु, (१०१) बिवर्धन। ये एक सौ एक रुद्रोंके नाम बताये गये हैं। ये सभी ॐकारमें प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने भूमिपर लोटकर देवाधिदेव महेश्वरको साष्टांग प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके मन-ही-मन उनके स्वरूपका चिन्तन करते हुए वे खड़े हो गये।'
ब्रह्माजीद्वारा किया हुआ यह स्तवन सुनकर महादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।
ब्रह्माजी बोले—देवेश्वर! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपमें मन लगाकर ॐकारस्वरूप आपके आगे इस रुद्रस्तोत्रका पाठ करेंगे, वे इहलोक और परलोकमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करेंगे। एकोत्तरशत नामका नित्य पाठ करके मनुष्य स्वर्गमें जाता है और जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उस-उसको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके दिव्य विमानपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक अपने लोकको चले गये।
कपिला-नर्मदा-संगम और ईशान आदि तीर्थोंकी महिमा, यमलोकके मार्गके कष्टों तथा अट्ठाईस नरककोटियोंका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभाग! जहाँ कपिला और नर्मदाका संगम हुआ है, वहाँ चार हाथके भीतर सप्तपातालवासिनी पिप्पला नदी आकर मिली है। वहीं दो आवर्त बताये गये हैं—कपिलावर्त और पिप्पलावर्त। उस तृप्तिदायक तीर्थको प्राप्त करनेकी पितरलोग भी इच्छा करते हैं। अतः पुत्रको चाहिये कि उस तीर्थमें जाकर पितरोंके लिये यत्नपूर्वक जलांजलि और पिण्डदान दे। जो कोई इस तीर्थमें अमरनाथका दर्शन करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि पर्वके अवसरपर उसका विशेष फल होता है। एक दूसरा ईशानतीर्थ है, जिसके विषयमें पहले सामान्यरूपसे चर्चा की गयी है। वह कपिलाके पूर्व भागमें थोड़ी ही दूरपर स्थित है। उस ईशान-लिंगकी अर्चनासे मनुष्य गणाध्यक्ष पदको प्राप्त होता है। भगवती पार्वतीजीने स्त्रियोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान दिया है कि 'कपिलामें चतुर्दशी और अष्टमीको स्नान करनेसे नारी सौभाग्यवती होती है और उसका पुत्र चिरंजीवी होता है। शिवजीने भी इस वरदानका अनुमोदन किया है। कपिला नदी जहाँसे निकली है और जहाँ नर्मदामें जाकर मिली है, वहाँतक आठ हजार तीर्थ हैं, जो इच्छानुसार फल देनेवाले हैं। उन तीर्थोंमें कपिला गौका दान करे और यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे। वहाँ सदा उपवास करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। वहीं हेमजालेश्वर नामक सिद्धिदायक लिंग है, हेमजालेश्वर देवकी अर्चना करनेसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। पूर्वकालमें वसुदान नामवाले एक राजर्षि हो गये हैं, जिन्होंने धुन्धु दैत्यको मारकर धुन्धुमार नाम धारण किया था। वे इस तीर्थके माहात्म्यसे स्वर्गलोकमें देवभावको प्राप्त हुए। नृपश्रेष्ठ! वहाँ जम्बुकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग है जो पशु-पक्षियोंकी योनिसे छुटकारा दिलानेवाला है। इस पृथ्वीपर नैमिषारण्यतीर्थ, काशीतीर्थ और प्रयागतीर्थ हैं, परंतु अमरेश्वरतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है, जिसे तैंतीस कोटि देवता तथा असुर भी मस्तक नवाते हैं। महाराज! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। सारस्वतलिंग ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है।
युधिष्ठिरने पूछा—विप्रवर! कौन मनुष्य