संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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यमराजके लोकमें जाते हैं और यमलोकके नरक कैसे हैं? ये सब मुझे बताइये।
**मार्कण्डेयजीने कहा—**सब दानोंमें अन्नदानको उत्तम माना गया है। वह सबको प्रसन्न करनेवाला, पुण्यजनक तथा बल और पुष्टिको बढ़ानेवाला है। तीनों लोकोंमें अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते और अन्नका अभाव होनेपर मर जाते हैं। शरीरमें रक्त, मांस, मज्जा और वीर्य—ये सब अन्नसे ही क्रमशः बनते हैं। वीर्यसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इसलिये सम्पूर्ण जगत् अन्नमय है। सुवर्ण, रत्न, अश्व, हाथी, स्त्री, माला और चन्दन आदि भोगसामग्रियोंसे भी अन्नभोजनके समान सुख नहीं मिलता। युधिष्ठिर! इस कारण अन्नदान महान् पुण्यदायक है। अन्नदाताको प्राणदाता कहा गया है। अतः सदा ही अन्नदान करना चाहिये। इस लोक और परलोकमें अन्नपान आदि जो कुछ भी ऐश्वर्य है, वह सब अन्नदानका ही फल बताया गया है। जो पापी मनुष्य कुकर्म करते और ऐसे दानसे मुँह मोड़ते हैं, वे अत्यन्त भयानक दक्षिण मार्गसे यमलोकको जाते हैं। यमलोक सब ओरसे छियासी हजार योजन विस्तृत है। वहाँ नाना प्रकारके भयानक रूप धारण करनेवाले यमदूत रहते हैं और उन्हींके कारण वह पुरी बड़ी भयंकर प्रतीत होती है। दुष्टात्मा, क्रूर एवं पापी पुरुषोंके लिये यमपुरी दूर होनेपर भी निकट-सी ही प्रतीत होती है। वे तीखे काँटोंसे युक्त, कंकड़-पत्थरोंसे विभूषित, छुरेकी धारोंसे आच्छादित और तीक्ष्ण पत्थरोंसे निर्मित मार्गसे यात्रा करते हैं। कहीं लकड़ी चीरनेवाले घातक आरोंसे और कहीं लोहेकी भयंकर सूइयोंसे वे मार्ग भरे होते हैं। कहीं फैली हुई लताओंके कारण दुर्गम एवं वृक्षश्रेणियोंसे व्याप्त पर्वत उन मार्गोंको रोके रहते हैं। यमपुरीके मार्गमें कहीं भयंकर गड्ढे तथा तपे हुए ढेले और ईंटें रहती हैं, कहीं तपायी हुई बालू बिछी होती है, कहीं तीखी नोकवाली कीलें गड़ी होती हैं और अनेक टूटी हुई गलियोंसे मार्ग आच्छादित रहता है। ऐसे भयंकर अन्धकारसे ढके हुए कष्टदायक मार्गसे पापियोंको यमलोकमें जाना पड़ता है। उन मार्गोंमें तपे हुए अंगारे बिछे होते हैं और दहकते हुए दावानलका सामना करना पड़ता है। कहीं तपायी हुई शिलाएँ रखी रहती हैं और कहीं इतनी कीचड़ होती है कि चलनेवाले जीवका शरीर कटि (कमर)-तक उसमें डूब जाता है। कहीं दूषित जल और कहीं कण्डियोंकी सुलगती हुई आगसे वह मार्ग व्याप्त रहता है। कहीं गीध, वक, व्याघ्र, दुष्ट कीट, बिच्छू, अजगर, भयानक मच्छर और जहरीले साँप, मतवाले हाथी, सिंह और भैंसे आदि जीवोंसे यमपुरीका मार्ग भरा रहता है। भयंकर डाकिनी, शाकिनी, विकराल राक्षस, महाघोर व्याधि, दुर्धर्ष अग्नि, प्रचण्ड आँधी, बड़े-बड़े पत्थरोंकी भारी वर्षा आदिका कष्ट सहन करते हुए पापी जीव यमलोककी यात्रा करते हैं। कहीं-कहीं उनपर चारों ओरसे बाणवर्षा की जाती है और कहीं बिजलियाँ गिरती हैं। कहीं दारुण उल्कापात होता है और कहीं दहकते हुए अंगारोंकी वृष्टि होती है तथा इन सबका आघात सहते हुए उन्हें आगे बढ़ना पड़ता है। कहीं बड़ी भयानक आवाज होती है, जिससे वे बार-बार थर्रा उठते हैं। कहीं सब ओरसे पैने अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछारसे भरे हुए मार्गके बीचसे निकलना पड़ता है। कहीं अत्यन्त खारे जलकी धारासे वे बार-बार नहा उठते हैं। अत्यन्त सर्दी और छुरेकी धार आदिका कष्ट भोगते हैं। अनेक प्रकारके सहस्रों क्लेशोंका सामना करते हैं। इस प्रकार यमलोकका मार्ग सन्तापपूर्ण, भयंकर, दुर्गम तथा विश्रामरहित होता है। वह सब दुःखोंका आश्रय एवं कष्टप्रद होता है। यमकी आज्ञाका पालन करनेवाले महाघोर यमदूत उसी मार्गसे बलपूर्वक पापियोंको ले जाते हैं। वे सभी जीव अकेले, पराधीन तथा मित्र और बन्धु-बान्धवोंसे रहित होते हैं। अपने कुकर्मोंके लिये बार-बार शोक करते और दग्ध होते रहते हैं। वे प्रेतों