संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १०१७ |
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और भूतोंके साथ होते हैं। उनके कण्ठ, तालू और ओठ सूखे रहते हैं। शरीर दुर्बल और मन अत्यन्त भयभीत होता है। उन्हें बार-बार आगसे जलाया जाता है। कोई सींकचोंमें बँधे होते हैं, कुछ पापी गंदगीमें डूबे रहते हैं और कुछ प्रचण्ड बलवान् यमदूतोंद्वारा जलाये और खींचे जाते हैं। किसीकी छातीमें, किसीके मुँहके नीचेके भागमें और किसीके केशोंमें रस्सी बाँधकर घसीटा जाता है। कितने ही जीवोंके ललाटमें बाण धँसाकर उन्हें खींचा जाता है। कितनोंको उत्तान लिटाकर उस दुर्गम मार्गपर घसीटते हुए ले जाया जाता है। कोई पसलीमें बँधे होते हैं, कोई भुजाओंमें, कोई पेट या कमरमें बाँधे जाते हैं; किन्हींके गलेमें फंदा डालकर घसीटा जाता है और वे अत्यन्त दुःखी होते हैं। किन्हींकी जीभमें कील धँसायी जाती है। किन्हींको अर्धचन्द्राकार हाथसे गलेमें पकड़कर (गरमेंचा देकर) इधर-उधर धक्का दिया जाता है। किन्हींके लिंग और अण्डकोषमें रस्सी बाँधकर उन्हें खींचा जाता है। कितने ही पापियोंके हाथ, पैर, कान, ओठ, नासिका, शिश्न, अण्डकोष, मस्तक तथा अन्यान्य अंग काट लिये जाते हैं। कोई अंकुशोंसे छेदे जाते हैं। किन्हींको साँप और बिच्छू काट खाते हैं तथा वे पापी जीव अनाथ, निराश्रय होकर इधर-उधर भागते और चिल्लाते रहते हैं। मुद्गरों और लोहेके डंडोंसे उनपर बार-बार मार पड़ती है। उन्हें भयंकर कोड़ोंसे भी पीटा जाता और भिन्दिपालोंद्वारा पीड़ित किया जाता है। उनके मुँहसे रक्त निकलता रहता है। वे कभी पानीमें गिरा दिये जाते हैं और कभी धूपसे सन्तप्त होकर छायाके लिये प्रार्थना करते हैं।
दानहीन मनुष्योंको इसी प्रकार दुर्दशा भोगते हुए यमलोकमें जाना पड़ता है। जिन्होंने अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर लिया है, वे यमलोकमें सुखपूर्वक जाते हैं। इस तरह उस निकृष्ट मार्गसे यमराजके नगरमें गये हुए पापी जीव आज्ञा मिलनेपर दूतोंद्वारा यमराजके सम्मुख पहुँचाये जाते हैं। वहाँ चित्रगुप्त उन पापियोंको धर्मोपदेश करते हुए उनके पापोंका स्मरण कराते हैं और इस प्रकार कहते हैं—'अरे ओ पापाचारियो! ओ पराये धनको हड़प लेनेवाले लुटेरो! तुमलोगोंने अपने रूप और बलके घमण्डमें आकर परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट किया है। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि जो जिस कर्मको करता है, उसीको उस कर्मका फल भोगना पड़ता है। फिर तुमने अपना ही सत्यानाश करनेके लिये पाप क्यों किया? और अब अपने उन्हीं कर्मोंके कारण जब क्लेश भोगना पड़ता है, तब दुखी क्यों होते हो? सबको अपने-अपने कर्म ही भोगने पड़ते हैं, इसमें किसीका कोई दोष नहीं है।'
तदनन्तर चित्रगुप्तजी यमराजसे कहते हैं—'स्वामिन्! ये भूलोकसे राजालोग आये हैं। इन्हें अपनी बुद्धि और बलपर बड़ा घमण्ड था; ये सभी नरेश अपने भयंकर दुष्कर्मोंसे प्रेरित होकर यहाँ आये हैं।' यमराजसे ऐसा कहकर वे उन राजाओंको सम्बोधित करके कहते हैं—'दुराचारी नरपालो! तुम सब लोग प्रजाका सर्वनाश करनेवाले रहे हो। तुमने थोड़े समयके लिये राज्य पाकर ऐसा पापकर्म क्यों किया? राज्यके लोभसे, मोहवश, अन्यायपूर्ण वृत्तियोंको अपनाकर तुमने जिन पापोंका संग्रह किया है, उनके यथार्थ फलका उपभोग करो। अरे! जिनके लिये तुमने अशुभ कर्म किये हैं, वह राज्य और वे स्त्रियाँ अब कहाँ हैं? वह सब कुछ छोड़कर तुम अकेले यहाँ आये हो। जिनके लिये तुमने प्रजाको सताया और नष्ट किया है, वे तुम्हारे भाई-बन्धु अब तुम्हारी यह यातना नहीं देख पा रहे हैं। इस समय यमदूत जब तुम्हें ऊँचेसे नीचे गिराते हैं, तब उन कर्मोंका कैसा मजा मिल रहा है।'
युधिष्ठिर! इस प्रकार चित्रगुप्तके अनेक तरहके कठोर वचनोंद्वारा उपालम्भ देनेपर वे राजालोग अपने-अपने कर्मोंको सोचते हैं और मौन रह जाते हैं। तदनन्तर धर्मराज यम उनके पापकी शुद्धिके लिये दूतोंको आज्ञा देते हैं—'चण्ड! महाचण्ड! तुम लोग इन राजाओंको पकड़कर