संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १०१३ |
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राजा हो गये हैं, जो सम्पूर्ण पृथ्वीका शासन करते थे। एक समय राजा भरतने यज्ञकर्ममें तत्पर हो भृगुपर्वतके दक्षिण भागमें दस योजन विस्तृत यज्ञभूमि निर्माण करायी, जो कुण्ड और यज्ञमण्डपसे सुशोभित थी। यज्ञकी सब सामग्रियोंसे सम्पन्न हो वेदमन्त्रोंके उच्चारणकी ध्वनिसे आकाश और पृथ्वीको गुँजाते हुए महाराज भरतने यज्ञ प्रारम्भ किया। उन्होंने होमसे सप्तलोकवासी देवताओंको तृप्त किया। इस प्रकार अमित तेजस्वी राजाका यज्ञ अभी चल ही रहा था कि उसका विध्वंस करनेके लिये भयानक रूपवाले राक्षस माल्यवान्, सुमाली, सुकेशी, शंख और दूषण आदि सहस्रोंकी संख्यामें आ धमके। उन्होंने यज्ञकी समस्त वस्तुएँ नष्ट-भ्रष्ट कर डालीं। सब देवता भाग चले, ऋत्विज मार गिराये गये। इस प्रकार राक्षसोंद्वारा उस यज्ञके नष्ट किये जानेपर राजा भरत आहुतिसे प्रज्वलित हुए अग्निकी भाँति क्रोधसे जल उठे और समस्त राक्षसोंका उन्होंने संहार कर डाला। तत्पश्चात् अपने ब्राह्मण ऋत्विजोंको राक्षसोंद्वारा भयभीत, धराशायी तथा मारे गये देख उन्हें बड़ा शोक हुआ। वे देवमन्त्री बृहस्पतिजीसे बोले—'ब्रह्मन्! आप सब देवताओंके गुरु, तीनों कालकी बातें जाननेवाले तथा त्रिवेदवेत्ता हैं। देवकण्टक राक्षसोंने मेरे लिये आये हुए इन ब्राह्मणोंकी हत्या कर डाली है। इसका प्रायश्चित्त मुझे क्या करना चाहिये।'
बृहस्पतिजी बोले—नृपश्रेष्ठ! मैं तुम्हें संजीवनी विद्या देता हूँ।
उस विद्याके प्रभावसे राजाने सब ब्राह्मणोंको जीवित किया। नूतन जीवन पाकर ब्राह्मणोंने देवगुरु बृहस्पतिकी बड़ी प्रशंसा की। तदनन्तर पूर्ण तथा उत्तम दक्षिणासे युक्त वह यज्ञ समाप्त हुआ। यज्ञमें जो यूप गड़े थे, उन्हींके मूलसे वहाँ शल्या और विशल्या नामवाली दो नदियाँ प्रकट हुईं। वे दोनों लोकपावनी नर्मदामें मिल गयीं। इसके बाद देवतालोग अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गको चले गये। राजा भरतने भी ब्राह्मणोंके साथ अपनी पुरीमें प्रवेश किया। भरतेश्वरलिंग ब्रह्मयोनिमें स्थित है।
ब्रह्माजीके द्वारा सौम्या दृष्टिसे दानवोंका निवारण तथा रुद्रके एक सौ एक नामोंद्वारा शिवजीका स्तवन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! जो 'ॐ' इस एक अक्षरका जप और उसके अर्थभूत परब्रह्म परमात्माका चिन्तन करते हुए शरीरका त्याग करता है वह परम गतिको प्राप्त होता है।* वेदमाता गायत्री ॐकारसे ही प्रकट हुई हैं। 'ॐ' इस एक अक्षरवाले तत्त्वमें ब्रह्मा, विष्णु और शिव तीनों प्रतिष्ठित हैं। ॐकार ही वेदका मूल है। उसीसे श्रुतिरूपा शाखाएँ फैली हुई हैं। स्मृति और आगम ये फल, फूल एवं पत्ते हैं। जैसे ॐकार सब विद्याओंका आदि है, उसी प्रकार भगवान् महेश्वर सम्पूर्ण देवताओंके आदि हैं। तीनों सन्ध्याएँ, तीनों काल, त्रिविध अग्नि, तीनों लोक तथा धर्म, अर्थ और काम—ये तीन वर्ग—सभी ॐकारमें ही स्थित हैं।
युधिष्ठिर! स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगमें नर्मदाके तटपर रहनेवाले देवताओंको कंकोल, कालिकेय और कालक नामवाले दानवोंने परास्त करके वहाँसे मार भगाया। वे देवता ब्रह्माजीके साथ महादेवजीकी शरणमें गये। तब सात पातालोंको भेदकर 'ॐ भूर्भुवः स्वः' का उच्चारण करते हुए पर्वतसे एक लिंग प्रकट हुआ, जो प्रज्वलित कालाग्निके समान कान्तिमान् था। उन लिंगरूपी
* ओमित्येकाक्षरं राजन् व्याहरन् समनुस्मरन्। यः प्रयाति त्यजन् देहं स याति परमां गतिम्॥
(स्क० पु०, आव० रे० ४७। १९-२०)
| १०१४ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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भगवान् शिवने कहा—'ब्रह्मन्! तुम लोकोंमें शान्ति स्थापित करनेवाली सौम्या इष्टिको अपने रुचिके अनुसार करो। इसके लिये मैंने तुम्हें वेद समर्पित किये हैं।' तब ब्रह्माजीने दैत्योंका विनाश करनेवाली रौद्री इष्टि तथा लोकोंमें शान्ति स्थापित करनेवाली सौम्या इष्टिका अनुष्ठान किया। उस भयंकर इष्टिको देखकर ब्रह्माजीके शापके भयसे उद्विग्न हो सब दानव दसों दिशाओंमें भाग गये। भगवान् ॐकारके प्रभावसे देवता निर्भय हो गये। उस समय सुरेश्वर शिवका पूजन करके देवताओंने स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। मार्कण्डेयलिंग, अविमुक्तलिंग, केदारलिंग, अमरेश्वर ओंकारलिंग तथा महाकाललिंग—इन पाँच पवित्र शिवलिंगोंका जो प्रतिदिन प्रातःकाल उठकर कीर्तन करता है, वह सब तीर्थोंके सेवनका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जिसके चार कोसके अंदर ब्रह्महत्या नहीं प्रवेश करती, उस कावेरीके तटपर आग्नेयलिंग और सिद्धलिंग विद्यमान हैं। वहीं शिवखात नामक तीर्थ है, जिसमें स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। जो कोई वहाँ पितरोंके लिये श्राद्ध एवं तिलोदक देता है, उसने मानो कोटिसहस्र युगोंतकके लिये पितरोंको तृप्त कर दिया है।
युधिष्ठिर! तदनन्तर भगवान् ॐकारने ब्रह्माजीको मन्त्रोपदेश किया। ब्रह्माजीने उनका उपदेश सुनकर इस प्रकार उनकी स्तुति की—'जो आकाशके तुल्य सर्वत्र व्यापक तथा आकाशका भी संहार करनेवाले हैं, जिनका कहीं अन्त नहीं है, कोई स्वामी नहीं है, जो अमृत एवं ध्रुवस्वरूप हैं, उन भगवान् शिवको नमस्कार है। जो कल्याणकी उत्पत्तिके स्थान, सनातन, योगासनपर विराजमान, योगाभ्यासपरायण तथा आकाशको हर लेनेवाले हैं, उन भगवान् शंकरको नमस्कार है। ॐकारस्वरूप एवं सबकी उत्पत्तिके कारण शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शिवको नमस्कार है। सबकी उत्पत्तिके कारण शिवको नमस्कार है। सर्वेश्वर शिवको नमस्कार है। मूर्द्धारूप तत्पुरुषको, मुखस्वरूप अघोरको, हृदयस्वरूप वामदेवको, गुह्यस्वरूप सद्योजातको और सर्वमूर्ति ॐकारको बार-बार नमस्कार है। (यहाँतक भगवान् रुद्रके सोलह नाम पूरे होते हैं *।) (१७) कलातीत, (१८) अव्यय, (१९) बुद्ध, (२०) वज्रदेहोपमर्दन, (२१) अध्यक्ष, (२२) विधु, (२३) शास्ता, (२४) पिनाकी, (२५) त्रिदशाधिप, (२६) अग्नि, (२७) रुद्र, (२८) हुताश, (२९) पिंगल, (३०) पावन, (३१) हर, (३२) ज्वलन, (३३) दहन, (३४) वस्तु, (३५) भस्मान्त, (३६) क्षमन्तक, (३७) अपमृत्युहर, (३८) धाता, (३९) विधाता, (४०) कर्त्ता, (४१) काल, (४२) धर्मपति, (४३) शास्ता, (४४) वियोक्ता, (४५) अनवम (न्यूनतारहित), (४६) प्रिय, (४७) निमित्त, (४८) वारुण, (४९) हन्ता, (५०) क्रूरदृष्टि, (५१) भयावह, (५२) ऊर्ध्वदृष्टि, (५३) विरूपाक्ष, (५४) दंष्ट्रावान्, (५५) धूम्रलोचन, (५६) बाल, (५७) अतिबल, (५८) पाशहस्त, (५९) महाबल, (६०) श्वेत, (६१) विरूप, (६२) रुद्र, (६३) दीर्घबाहु, (६४) जडान्तक, (६५) शीघ्र, (६६) लघु, (६७) वायुवेग, (६८) भीम, (६९) वडवामुख, (७०) पंचशीर्षा, (७१) कपर्दी, (७२) सूक्ष्म, (७३) तीक्ष्ण, (७४) क्षपान्तक, (७५) निधीश, (७६) रौद्रवान्, (७७) धन्वी, (७८) सौम्यदेह, (७९) प्रमर्दन, (८०) अनन्त-पालक, (८१) धार, (८२) पातालेश, (८३) सधूम्र, (८४) शाश्वत, (८५) शर्व, (८६) सर्वपिंग, (८७) करालवान्, (८८) विष्णु, (८९) ईश, (९०) महात्मा, (९१) सुख, (९२) मृत्युविवर्जित,
* (१) व्योमसंख्यायी, (२) सर्वव्यापी व्योमहर, (३) अनन्त, (४) अनाथ, (५) अमृत, (६) ध्रुव, (७) शाश्वतशम्भव, (८) योगपीठसंस्थित, (९) नित्ययोगयोगी, (१०) शिव, (११) सर्वप्रभव, (१२) ईशान, (१३) तत्पुरुष, (१४) अघोर, (१५) वामदेव, (१६) सद्योजात।
- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०१५
(९३) शम्भु, (९४) विभु, (९५) गणाध्यक्ष, (९६) त्र्यक्ष, (९७) दिवस्पति, (९८) समवाद, (९९) विवाद, (१००) प्रहविष्णु, (१०१) बिवर्धन। ये एक सौ एक रुद्रोंके नाम बताये गये हैं। ये सभी ॐकारमें प्रतिष्ठित हैं। इस प्रकार स्तुति करके ब्रह्माजीने भूमिपर लोटकर देवाधिदेव महेश्वरको साष्टांग प्रणाम किया और उनकी परिक्रमा करके मन-ही-मन उनके स्वरूपका चिन्तन करते हुए वे खड़े हो गये।'
ब्रह्माजीद्वारा किया हुआ यह स्तवन सुनकर महादेवजीने कहा—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारे इस दिव्य स्तोत्रसे बहुत प्रसन्न हूँ, तुम कोई वर माँगो।
ब्रह्माजी बोले—देवेश्वर! जो ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य आपमें मन लगाकर ॐकारस्वरूप आपके आगे इस रुद्रस्तोत्रका पाठ करेंगे, वे इहलोक और परलोकमें समस्त कामनाओंको प्राप्त करेंगे। एकोत्तरशत नामका नित्य पाठ करके मनुष्य स्वर्गमें जाता है और जिस-जिस वस्तुकी कामना करता है, उस-उसको अवश्य प्राप्त कर लेता है।
ऐसा कहकर ब्रह्माजी भगवान् महेश्वरको नमस्कार करके दिव्य विमानपर आरूढ़ हो प्रसन्नतापूर्वक अपने लोकको चले गये।
कपिला-नर्मदा-संगम और ईशान आदि तीर्थोंकी महिमा, यमलोकके मार्गके कष्टों तथा अट्ठाईस नरककोटियोंका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—महाभाग! जहाँ कपिला और नर्मदाका संगम हुआ है, वहाँ चार हाथके भीतर सप्तपातालवासिनी पिप्पला नदी आकर मिली है। वहीं दो आवर्त बताये गये हैं—कपिलावर्त और पिप्पलावर्त। उस तृप्तिदायक तीर्थको प्राप्त करनेकी पितरलोग भी इच्छा करते हैं। अतः पुत्रको चाहिये कि उस तीर्थमें जाकर पितरोंके लिये यत्नपूर्वक जलांजलि और पिण्डदान दे। जो कोई इस तीर्थमें अमरनाथका दर्शन करता है, उसे अश्वमेध-यज्ञका फल प्राप्त होता है। चन्द्रग्रहण और सूर्यग्रहण आदि पर्वके अवसरपर उसका विशेष फल होता है। एक दूसरा ईशानतीर्थ है, जिसके विषयमें पहले सामान्यरूपसे चर्चा की गयी है। वह कपिलाके पूर्व भागमें थोड़ी ही दूरपर स्थित है। उस ईशान-लिंगकी अर्चनासे मनुष्य गणाध्यक्ष पदको प्राप्त होता है। भगवती पार्वतीजीने स्त्रियोंके लिये प्रसन्नतापूर्वक यह वरदान दिया है कि 'कपिलामें चतुर्दशी और अष्टमीको स्नान करनेसे नारी सौभाग्यवती होती है और उसका पुत्र चिरंजीवी होता है। शिवजीने भी इस वरदानका अनुमोदन किया है। कपिला नदी जहाँसे निकली है और जहाँ नर्मदामें जाकर मिली है, वहाँतक आठ हजार तीर्थ हैं, जो इच्छानुसार फल देनेवाले हैं। उन तीर्थोंमें कपिला गौका दान करे और यथाशक्ति ब्राह्मणोंको भोजन करावे। वहाँ सदा उपवास करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करे। वहीं हेमजालेश्वर नामक सिद्धिदायक लिंग है, हेमजालेश्वर देवकी अर्चना करनेसे मनुष्य यमलोकको नहीं देखता। पूर्वकालमें वसुदान नामवाले एक राजर्षि हो गये हैं, जिन्होंने धुन्धु दैत्यको मारकर धुन्धुमार नाम धारण किया था। वे इस तीर्थके माहात्म्यसे स्वर्गलोकमें देवभावको प्राप्त हुए। नृपश्रेष्ठ! वहाँ जम्बुकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक शिवलिंग है जो पशु-पक्षियोंकी योनिसे छुटकारा दिलानेवाला है। इस पृथ्वीपर नैमिषारण्यतीर्थ, काशीतीर्थ और प्रयागतीर्थ हैं, परंतु अमरेश्वरतीर्थ तीनों लोकोंमें प्रसिद्ध है, जिसे तैंतीस कोटि देवता तथा असुर भी मस्तक नवाते हैं। महाराज! वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। सारस्वतलिंग ब्रह्महत्याका नाश करनेवाला है।
युधिष्ठिरने पूछा—विप्रवर! कौन मनुष्य
| १०१६ | * संक्षिप्त स्कन्दपुराण * |
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यमराजके लोकमें जाते हैं और यमलोकके नरक कैसे हैं? ये सब मुझे बताइये।
**मार्कण्डेयजीने कहा—**सब दानोंमें अन्नदानको उत्तम माना गया है। वह सबको प्रसन्न करनेवाला, पुण्यजनक तथा बल और पुष्टिको बढ़ानेवाला है। तीनों लोकोंमें अन्नदानके समान दूसरा कोई दान नहीं है। अन्नसे ही प्राणी उत्पन्न होते और अन्नका अभाव होनेपर मर जाते हैं। शरीरमें रक्त, मांस, मज्जा और वीर्य—ये सब अन्नसे ही क्रमशः बनते हैं। वीर्यसे ही प्राणियोंकी उत्पत्ति होती है। इसलिये सम्पूर्ण जगत् अन्नमय है। सुवर्ण, रत्न, अश्व, हाथी, स्त्री, माला और चन्दन आदि भोगसामग्रियोंसे भी अन्नभोजनके समान सुख नहीं मिलता। युधिष्ठिर! इस कारण अन्नदान महान् पुण्यदायक है। अन्नदाताको प्राणदाता कहा गया है। अतः सदा ही अन्नदान करना चाहिये। इस लोक और परलोकमें अन्नपान आदि जो कुछ भी ऐश्वर्य है, वह सब अन्नदानका ही फल बताया गया है। जो पापी मनुष्य कुकर्म करते और ऐसे दानसे मुँह मोड़ते हैं, वे अत्यन्त भयानक दक्षिण मार्गसे यमलोकको जाते हैं। यमलोक सब ओरसे छियासी हजार योजन विस्तृत है। वहाँ नाना प्रकारके भयानक रूप धारण करनेवाले यमदूत रहते हैं और उन्हींके कारण वह पुरी बड़ी भयंकर प्रतीत होती है। दुष्टात्मा, क्रूर एवं पापी पुरुषोंके लिये यमपुरी दूर होनेपर भी निकट-सी ही प्रतीत होती है। वे तीखे काँटोंसे युक्त, कंकड़-पत्थरोंसे विभूषित, छुरेकी धारोंसे आच्छादित और तीक्ष्ण पत्थरोंसे निर्मित मार्गसे यात्रा करते हैं। कहीं लकड़ी चीरनेवाले घातक आरोंसे और कहीं लोहेकी भयंकर सूइयोंसे वे मार्ग भरे होते हैं। कहीं फैली हुई लताओंके कारण दुर्गम एवं वृक्षश्रेणियोंसे व्याप्त पर्वत उन मार्गोंको रोके रहते हैं। यमपुरीके मार्गमें कहीं भयंकर गड्ढे तथा तपे हुए ढेले और ईंटें रहती हैं, कहीं तपायी हुई बालू बिछी होती है, कहीं तीखी नोकवाली कीलें गड़ी होती हैं और अनेक टूटी हुई गलियोंसे मार्ग आच्छादित रहता है। ऐसे भयंकर अन्धकारसे ढके हुए कष्टदायक मार्गसे पापियोंको यमलोकमें जाना पड़ता है। उन मार्गोंमें तपे हुए अंगारे बिछे होते हैं और दहकते हुए दावानलका सामना करना पड़ता है। कहीं तपायी हुई शिलाएँ रखी रहती हैं और कहीं इतनी कीचड़ होती है कि चलनेवाले जीवका शरीर कटि (कमर)-तक उसमें डूब जाता है। कहीं दूषित जल और कहीं कण्डियोंकी सुलगती हुई आगसे वह मार्ग व्याप्त रहता है। कहीं गीध, वक, व्याघ्र, दुष्ट कीट, बिच्छू, अजगर, भयानक मच्छर और जहरीले साँप, मतवाले हाथी, सिंह और भैंसे आदि जीवोंसे यमपुरीका मार्ग भरा रहता है। भयंकर डाकिनी, शाकिनी, विकराल राक्षस, महाघोर व्याधि, दुर्धर्ष अग्नि, प्रचण्ड आँधी, बड़े-बड़े पत्थरोंकी भारी वर्षा आदिका कष्ट सहन करते हुए पापी जीव यमलोककी यात्रा करते हैं। कहीं-कहीं उनपर चारों ओरसे बाणवर्षा की जाती है और कहीं बिजलियाँ गिरती हैं। कहीं दारुण उल्कापात होता है और कहीं दहकते हुए अंगारोंकी वृष्टि होती है तथा इन सबका आघात सहते हुए उन्हें आगे बढ़ना पड़ता है। कहीं बड़ी भयानक आवाज होती है, जिससे वे बार-बार थर्रा उठते हैं। कहीं सब ओरसे पैने अस्त्र-शस्त्रोंकी बौछारसे भरे हुए मार्गके बीचसे निकलना पड़ता है। कहीं अत्यन्त खारे जलकी धारासे वे बार-बार नहा उठते हैं। अत्यन्त सर्दी और छुरेकी धार आदिका कष्ट भोगते हैं। अनेक प्रकारके सहस्रों क्लेशोंका सामना करते हैं। इस प्रकार यमलोकका मार्ग सन्तापपूर्ण, भयंकर, दुर्गम तथा विश्रामरहित होता है। वह सब दुःखोंका आश्रय एवं कष्टप्रद होता है। यमकी आज्ञाका पालन करनेवाले महाघोर यमदूत उसी मार्गसे बलपूर्वक पापियोंको ले जाते हैं। वे सभी जीव अकेले, पराधीन तथा मित्र और बन्धु-बान्धवोंसे रहित होते हैं। अपने कुकर्मोंके लिये बार-बार शोक करते और दग्ध होते रहते हैं। वे प्रेतों
| * आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * | १०१७ |
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और भूतोंके साथ होते हैं। उनके कण्ठ, तालू और ओठ सूखे रहते हैं। शरीर दुर्बल और मन अत्यन्त भयभीत होता है। उन्हें बार-बार आगसे जलाया जाता है। कोई सींकचोंमें बँधे होते हैं, कुछ पापी गंदगीमें डूबे रहते हैं और कुछ प्रचण्ड बलवान् यमदूतोंद्वारा जलाये और खींचे जाते हैं। किसीकी छातीमें, किसीके मुँहके नीचेके भागमें और किसीके केशोंमें रस्सी बाँधकर घसीटा जाता है। कितने ही जीवोंके ललाटमें बाण धँसाकर उन्हें खींचा जाता है। कितनोंको उत्तान लिटाकर उस दुर्गम मार्गपर घसीटते हुए ले जाया जाता है। कोई पसलीमें बँधे होते हैं, कोई भुजाओंमें, कोई पेट या कमरमें बाँधे जाते हैं; किन्हींके गलेमें फंदा डालकर घसीटा जाता है और वे अत्यन्त दुःखी होते हैं। किन्हींकी जीभमें कील धँसायी जाती है। किन्हींको अर्धचन्द्राकार हाथसे गलेमें पकड़कर (गरमेंचा देकर) इधर-उधर धक्का दिया जाता है। किन्हींके लिंग और अण्डकोषमें रस्सी बाँधकर उन्हें खींचा जाता है। कितने ही पापियोंके हाथ, पैर, कान, ओठ, नासिका, शिश्न, अण्डकोष, मस्तक तथा अन्यान्य अंग काट लिये जाते हैं। कोई अंकुशोंसे छेदे जाते हैं। किन्हींको साँप और बिच्छू काट खाते हैं तथा वे पापी जीव अनाथ, निराश्रय होकर इधर-उधर भागते और चिल्लाते रहते हैं। मुद्गरों और लोहेके डंडोंसे उनपर बार-बार मार पड़ती है। उन्हें भयंकर कोड़ोंसे भी पीटा जाता और भिन्दिपालोंद्वारा पीड़ित किया जाता है। उनके मुँहसे रक्त निकलता रहता है। वे कभी पानीमें गिरा दिये जाते हैं और कभी धूपसे सन्तप्त होकर छायाके लिये प्रार्थना करते हैं।
दानहीन मनुष्योंको इसी प्रकार दुर्दशा भोगते हुए यमलोकमें जाना पड़ता है। जिन्होंने अपने पापोंका प्रायश्चित्त कर लिया है, वे यमलोकमें सुखपूर्वक जाते हैं। इस तरह उस निकृष्ट मार्गसे यमराजके नगरमें गये हुए पापी जीव आज्ञा मिलनेपर दूतोंद्वारा यमराजके सम्मुख पहुँचाये जाते हैं। वहाँ चित्रगुप्त उन पापियोंको धर्मोपदेश करते हुए उनके पापोंका स्मरण कराते हैं और इस प्रकार कहते हैं—'अरे ओ पापाचारियो! ओ पराये धनको हड़प लेनेवाले लुटेरो! तुमलोगोंने अपने रूप और बलके घमण्डमें आकर परायी स्त्रियोंका सतीत्व नष्ट किया है। तुम्हें ज्ञात होना चाहिये कि जो जिस कर्मको करता है, उसीको उस कर्मका फल भोगना पड़ता है। फिर तुमने अपना ही सत्यानाश करनेके लिये पाप क्यों किया? और अब अपने उन्हीं कर्मोंके कारण जब क्लेश भोगना पड़ता है, तब दुखी क्यों होते हो? सबको अपने-अपने कर्म ही भोगने पड़ते हैं, इसमें किसीका कोई दोष नहीं है।'
तदनन्तर चित्रगुप्तजी यमराजसे कहते हैं—'स्वामिन्! ये भूलोकसे राजालोग आये हैं। इन्हें अपनी बुद्धि और बलपर बड़ा घमण्ड था; ये सभी नरेश अपने भयंकर दुष्कर्मोंसे प्रेरित होकर यहाँ आये हैं।' यमराजसे ऐसा कहकर वे उन राजाओंको सम्बोधित करके कहते हैं—'दुराचारी नरपालो! तुम सब लोग प्रजाका सर्वनाश करनेवाले रहे हो। तुमने थोड़े समयके लिये राज्य पाकर ऐसा पापकर्म क्यों किया? राज्यके लोभसे, मोहवश, अन्यायपूर्ण वृत्तियोंको अपनाकर तुमने जिन पापोंका संग्रह किया है, उनके यथार्थ फलका उपभोग करो। अरे! जिनके लिये तुमने अशुभ कर्म किये हैं, वह राज्य और वे स्त्रियाँ अब कहाँ हैं? वह सब कुछ छोड़कर तुम अकेले यहाँ आये हो। जिनके लिये तुमने प्रजाको सताया और नष्ट किया है, वे तुम्हारे भाई-बन्धु अब तुम्हारी यह यातना नहीं देख पा रहे हैं। इस समय यमदूत जब तुम्हें ऊँचेसे नीचे गिराते हैं, तब उन कर्मोंका कैसा मजा मिल रहा है।'
युधिष्ठिर! इस प्रकार चित्रगुप्तके अनेक तरहके कठोर वचनोंद्वारा उपालम्भ देनेपर वे राजालोग अपने-अपने कर्मोंको सोचते हैं और मौन रह जाते हैं। तदनन्तर धर्मराज यम उनके पापकी शुद्धिके लिये दूतोंको आज्ञा देते हैं—'चण्ड! महाचण्ड! तुम लोग इन राजाओंको पकड़कर
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नरकोंकी आगमें तपाओ और इन्हें पापोंसे शुद्ध करो।' तब वे दूत शीघ्र उठकर उन राजाओंके पाँव पकड़ लेते हैं और वेगपूर्वक घुमाते हुए उन्हें खूब तपी हुई भूमिपर फेंक देते हैं और लोहेके वृक्षोंपर भी पटक देते हैं। उन प्रहारोंसे जर्जर होकर वे राजा अचेत और निश्चेष्ट हो जाते हैं। फिर वायुका स्पर्श होनेपर वे धीरे-धीरे सचेत होते हैं। तब उन्हें पापसे शुद्ध करनेके लिये यमदूत नरकके समुद्रमें डाल देते हैं। नरकोंकी अट्ठाईस श्रेणियाँ हैं, जो सातवें पातालके अन्तमें घोर अन्धकारके भीतर स्थित हैं। (१) अतिघोरा, (२) रौद्रा, (३) घोरतमा, (४) अत्यन्त दुःखजननी, (५) घोररूपा, (६) तरणतारा, (७) भयानका, (८) कालरात्रि, (९) घटोत्कटा, (१०) चण्डा, (११) महाचण्डा, (१२) चण्डकोलाहला, (१३) प्रचण्डा, (१४) वराग्निका, (१५) जघन्या, (१६) अवरालोमा, (१७) भीषणी, (१८) नायिका, (१९) कराला, (२०) विकराला, (२१) वज्रविंशति, (२२) अस्ता, (२३) पंचकोणा, (२४) सुदीर्घा, (२५) परिवर्तुला, (२६) सप्तभौमा, (२७) अष्टभौमा और (२८) दीर्घमाया—ये ही नरकोंकी अट्ठाईस कोटियाँ हैं। इन सबके क्रमशः पाँच-पाँच नायक होते हैं। इनमें पहला रौरव है, क्योंकि उसमें पड़े हुए प्राणी रोते रहते हैं। दूसरा महारौरव है, जिसकी दुःसह पीड़ाओंसे महान् साहसी भी रो देते हैं। तीसरा तम, चौथा शीत और पाँचवाँ उष्ण है—इस प्रकार पहली कोटिके ये पाँच नायक माने गये हैं। दूसरी कोटिके १ अघोर, २ तीक्ष्ण, ३ पद्म, ४ संजीवन और ५ शठ—ये पाँच नायक हैं। तीसरी कोटिके नायक हैं—१ महामाय, २ विलोम, ३ कण्टक, ४ कटक और ५ तीव्र। चौथी कोटिके नायक १ वाम, २ कराल, ३ किंकरल, ४ प्रकम्पन और ५ महाचक्र हैं। पाँचवी कोटिके नायक १ सुपद्म, २ कालसूत्र, ३ प्रगर्जन, ४ सूचीमुख और ५ सुनेमि हैं। छठी कोटिके नायक १ खादक, २ सुप्रपीडित, ३ कुम्भीपाक, ४ सुपाक और ५ क्रकच हैं। सातवीं कोटिके नायक १ सुदारुण, २ अंगाररात्रि, ३ पचन, ४ असृक्पूयभव तथा ५ सुतीक्ष्ण हैं। आठवीं कोटिके १ शुण्ड, २ शकुनि, ३ महासंवर्तक, ४ ऋतु और ५ तप्तजन्तु—ये पाँच नायक हैं। नवीं कोटिके नायक १ पंकलेप, २ पूतिमान्, ३ हृद, ४ त्रपु और ५ उच्छ्वास हैं। दसवीं कोटिके नायक १ निरुच्छ्वास, २ सुदीर्घ, ३ क्रूर, ४ शाल्मलि और ५ उष्ट्रित हैं। ग्यारहवीं कोटिके नायक १ महानाद, २ प्रवाह, ३ सुप्रवाहन, ४ वृषाश्रय तथा ५ वृषश्व हैं। बारहवीं कोटिके १ सिंहानन, २ व्याघ्रानन, ३ गजानन, ४ श्वानन और ५ सूकरानन—ये पाँच नायक हैं। तेरहवीं कोटिके नायक १ अजानन, २ महिषानन, ३ मेषानन, ४ मूषकानन तथा ५ खरानन हैं। चौदहवीं कोटिके १ ग्राहानन, २ कुम्भीरानन, ३ नक्रानन, ४ महाघोर और ५ भयानक—ये पाँच नायक हैं। पंद्रहवीं कोटिके नायक १ सर्वभक्ष, २ स्वभक्ष, ३ सर्वकर्मा, ४ अश्व तथा ५ वायस हैं। सोलहवीं कोटिके नायक १ गृध्रोलूक, २ उलूक, ३ शार्दूल, ४ कपि और ५ कच्छुर हैं। सत्रहवीं कोटिके १ गण्डक, २ पूतिवक्त्र्य, ३ रक्तास्य, ४ पूतिमूत्रिक और ५ कणधूम्र—ये पाँच नायक हैं। अठारहवीं कोटिके नायक १ तुषाराग्नि, २ कृत्रिमान्, ३ निरय, ४ आतोद्य और ५ प्रतोद्य हैं। उन्नीसवीं कोटिके नायक १ रुधिरोध, २ भोजन, ३ कालात्मग, ४ अनुभक्ष और ५ सर्वभक्षक हैं। बीसवीं कोटिके १ सुदारुण, २ कर्कट, ३ विशाल, ४ विकट और ५ कटपूतन—ये पाँच नायक हैं। इक्कीसवीं कोटिके नायक १ अम्बरीष, २ कटाह, ३ कष्टदायिनी वैतरणी, ४ सुतप्त तथा ५ लोहशंकु हैं। बाईसवीं कोटिके नायक १ एकपाद, २ अश्रुपूरण, ३ घोर असिपत्रवन, ४ प्रतिष्ठित अस्थिलिंग और ५ तिलयन्त्र हैं। तेईसवीं कोटिके १ अतसीयन्त्र, २ इक्षुयन्त्र, ३ कूट, ४ पाप तथा ५ प्रमर्दन—ये पाँच नायक हैं। चौबीसवीं कोटिके नायक १ महाचुल्ली, २ विचुल्ली, ३ तप्त लोहमयी शिला, ४ क्षुरधार
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पर्वत तथा ५ मय हैं। पचीसवीं कोटिके नायक १ यमल पर्वत, २ सूचीकूप, ३ विष्ठाकूप, ४ अन्धकूप और ५ पतन हैं। छब्बीसवीं कोटिके १ पातन, २ मुसली, ३ वृषली, ४ अशिवा तथा ५ संकटला—ये पाँच नायक हैं। सत्ताईसवीं कोटिके नायक १ तालपत्र वन, २ असिगहन, ३ महामोहक, ४ सम्मोहन तथा ५ अस्थिभंग हैं। अट्ठाईसवीं कोटिके नायक १ तप्ताचलमय, २ अगुण, ३ बहुदुःख, ४ महादुःख तथा ५ कश्मल हैं। इनके सीवा यमल, हालाहल, विरूप, श्वरूप, च्युतमानस, एकपाद, त्रिपाद और तीव्र आदि नरक हैं। इस प्रकार यहाँ नरकोंके अट्ठाईस पंचक बताये गये हैं।
पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार क्रमशः एक-एक नरकका उपभोग करते हैं। अपनी कुत्सित कामनाओंके कारण जो कुकर्मोंका संग्रह किया गया है, उसीके फलस्वरूप तपायी हुई लोहेकी साँकलसे बाँधकर अँधेरेमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी शाखाओंमें पापी मनुष्य लटका दिये जाते हैं। फिर यमदूत उन सबको बड़े जोर-जोरसे झुलाते हैं। वेगपूर्वक झुलाये हुए वे सभी पापी अचेत हो जाते हैं। फिर आकाशमें लटकते हुए उनके पैरोंमें सौ भार लोहा बाँध देते हैं। उस महान् भारसे वे सब लोग अत्यन्त सन्तप्त होते हैं और अपने-अपने कर्मोंका स्मरण करते हुए निश्चल भावसे मौन रह जाते हैं। तत्पश्चात् क्रमशः आगमें तपाकर खूब लाल किये हुए लोहेके कँटीले दण्डोंसे यमदूत उनके मस्तकपर मारते हैं। इसके बाद उन्हें विष्ठा और कीटोंसे भरे हुए कुएँमें डाल देते हैं। घोर यमदूत सब ओरसे घेरकर पापियोंको आगमें पकाते हैं। उसके बाद उनके शरीरपर नमकीन पानी डाल देते हैं। कितने ही पापियोंको लोहेके कड़ाहमें बैंगनकी तरह भूनते हैं, फिर गंदे कुएँमें डाल देते हैं। मेदा, रक्त और पीबसे भरी हुई बावलीमें भी पापियोंको फेंक दिया जाता है और वहाँ उन्हें कीड़े तथा कौए लोहेके समान तीखी चोंचोंसे नोच-नोचकर खाते हैं। कितने ही पापी मनुष्योंको तीखे त्रिशूलोंमें गुम्फित करके उन्हें धधकते हुए अंगारोंपर मांसकी भाँति पकाया जाता है। इसी प्रकार यमदूत पापियोंको खूब तपे हुए तेलसे भरे कड़ाहोंमें अनेक बार पकाते हैं। जो असत्य और अप्रिय बोलनेवाले हैं, उनकी छातीपर चढ़कर और पाँवसे दबाकर तपाये हुए मजबूत सँड़सेसे उनकी जीभ उखाड़ ली जाती है। दम्भपूर्ण झूठे शास्त्रसे प्रेरित होकर जो ब्राह्मण यज्ञके नामपर अधिक धनका संग्रह करता है, उसकी जिह्वा भी तीखे भालेसे छेदी जाती है। जो मूढ़ मानव माता-पिता और गुरुको फटकारते हैं, उनके मुँहमें बार-बार बालू भरकर पानीसे सींचा जाता है। तदनन्तर खारा और गरम जल भरा जाता है। फिर खौलते हुए तेलको उड़ेल दिया जाता है। यमदूत उन पापियोंके पैर पकड़कर कीड़ोंसे भरी हुई विष्ठापर घसीटते हैं। फिर सींगसे दबाकर उन्हें लोहेके शाल्मलि वृक्षमें बाँध दिया जाता है। उसके बाद वे महाबली भयानक दूत उन्हें पीछेकी ओरसे मारते हैं। अत्यन्त प्रबल दाँतीदार आरेसे मस्तककी ओरसे चीरते हैं। अपने भयानक कर्मोंके परिणामसे वे पापी जीव भूख लगनेपर अपना ही मांस खाते और प्यास लगनेपर अपना ही रक्त पीते हैं। जिन मूढ़ पुरुषोंने कभी अन्न और जलका दान नहीं किया है और न किसीके दानका अनुमोदन ही किया है, वे मुद्गरोंसे जर्जर करके ईखकी तरह पेरे जाते हैं। घोर असिताल वनमें खण्ड-खण्ड करके काटे जाते हैं। उनके सब अंगोंमें सूई चुभोयी जाती है। तत्पश्चात् उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया जाता है। शूलीपर चढ़ाकर उन्हें बार-बार हिलाया और खींचा जाता है। फिर भी उनकी मृत्यु नहीं होती।
१०२० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
उनके शरीरसे मांस नोच लिया जाता है। लोहेके मुद्गरोंसे मारकर उनकी हड्डियाँ चूर-चूर कर दी जाती हैं। बलोन्मत्त यमदूत उस दशामें भी उन्हें अनेक बार जल्दी-जल्दी घसीटते हैं और वे पापी जीव दीर्घकालतक नरकमें रहकर दारुण यातनाएँ भोगते हैं। उनका मुँह बालूसे भरा होता है, इसलिये वे स्वाँसतक नहीं ले पाते। इन सब यातनाओंके बाद अनेक प्रकारके यमदूत रौरव आदि नरकोंमें उन्हें पीड़ा देते हैं। महारौरवकी पीड़ाओंसे महान् धीर पुरुष भी रो देते हैं। मुख, लिंग, गुदा पार्श्व, पैर, छाती और मस्तकमें तपाये हुए लोहेके तीखे मुद्गरोंसे यमदूत मारते हैं। जो स्त्रियाँ पराये पतियोंका आलिंगन करती हैं और अपने पतिकी सेवामें नहीं रहतीं, ऐसी स्त्रियोंसे यमदूत कहते हैं—'अरी! अब तू क्यों जल्दीसे भागी जा रही है? स्मरण है या नहीं, तूने अपने पतिको धोखा दिया था और एक पापान्ध परपुरुषको सुखपूर्वक गलेसे लगाया था?' ऐसा कहकर वे उन्हें लोहकुम्भ नामक नरकमें फेंक देते हैं और धीरे-धीरे पकाते हैं। कभी उन्हें प्रज्वलित अग्निमें राँधते हैं, तप्तशिलाओंपर बिठाते हैं, अँधेरे कुएँमें डालते हैं और अजगर सर्पोंद्वारा डँसाते हैं। जो धर्मका उपदेश देनेवाले महात्मा आचार्यकी निन्दा करते हैं, शिवभक्त, ब्राह्मण तथा सनातन शिवधर्मपर दोषारोपण करते हैं, उनकी छाती, कण्ठ, जिह्वा, शरीरकी सन्धियों तथा दोनों ओठोंमें काँटी ठोंककर यमदूत उन्हें कील देते हैं।
इस प्रकार पापाचारी पुरुषोंको यमलोकमें बड़ी भयानक यातनाएँ दी जाती हैं। एक-एक नरकमें सैकड़ों और सहस्रों प्रकारकी ऐसी यातनाएँ जाननी चाहिये, जो समस्त पापकर्मियोंको प्राप्त होती हैं। सम्पूर्ण नरकोंमें ऐसी-ऐसी अनन्त पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं। अपने-अपने कर्मोंसे नरकोंमें गिराये हुए पापी जीव क्रमशः सभी नरकोंमें पकाये जाते हैं। महापातकी मनुष्य सब नरकोंमें चन्द्रमा और नक्षत्रोंकी स्थितिकालतक अनेकानेक यमदूतोंद्वारा पीड़ा भोगते रहते हैं। यही दशा पातकियोंकी भी होती है। उपपातकियोंको इनसे आधी यातना प्राप्त होती है। तात युधिष्ठिर! कब किसकी मृत्यु हो जायगी, यह ज्ञात नहीं होता और अकस्मात् यदि मृत्यु आ गयी तो कौन मनुष्य यहाँ वर्ष या दिन पा सकता है। फिर तो सब कुछ छोड़कर अकेले ही परलोककी यात्रा करनी पड़ेगी। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके सत्यधर्मपरायण होओ। यह सब नरकोंका लक्षण तुमसे बताया गया।
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दान, पुण्य, शिवध्यान और नर्मदासेवनसे नरकसे उद्धार होनेका तथा संसारसे वैराग्यका उपदेश
युधिष्ठिरने पूछा— मुने! किस धर्मके द्वारा इस परम दुस्तर संसार-सागरको पार किया जा सकता है?
मार्कण्डेयजी बोले— मनुष्य अनेक प्रकारके राग और लोभके वशीभूत होकर संसारमें नाना प्रकारके क्लेश उठाता है। गर्भमें पड़ जानेसे मनुष्य कहे हुए शास्त्रको नहीं समझता और स्वर्ग तथा मोक्षसाधक कर्मोंकी चर्चा नहीं सुनता। सम्पूर्ण कामनाओं और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले भगवान् शंकरके ध्यानमें वह अज्ञानवश कष्ट मानने लगता है। वास्तवमें भगवान् शिवका चिन्तन ही नरकसे छुड़ाकर अपना परम अद्भुत कल्याण करनेवाला है। जो जम्बूद्वीपमें आकर मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है, तथापि नर्मदादेवीकी शरणमें नहीं जाता, वह भाग्यहीन है। इस संसारमें पापसे दूषित चित्तवाले मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली नर्मदासे बढ़कर दूसरी कौन नदी है? जो पापहारिणी महादेवी नर्मदाका ध्यान करते हैं, उनकी पापराशि नष्ट हो जाती है। जो नर्मदाका मनसे स्मरण और वाणीद्वारा कीर्तन करता है, वह परलोकमें जानेपर
- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२१
यमदूतोंद्वारा पीड़ित नहीं होता। नरकमें स्थित होनेपर भी जो नर्मदा नदी एवं भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करता है, उसे यमराजके दूत तत्काल त्याग देते हैं। यदि वैदूर्य पर्वत एवं अमरकण्टकपर भोग और मोक्ष फल देनेवाले परमेश्वर 'ॐकारजी' विद्यमान हैं, तो पापी मनुष्य यहाँ क्यों शोक करते हैं? वहीं सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले सिद्धलिंग सिद्धेश्वर, यज्ञेश्वर और शशिभूषण हैं। नर्मदाके दक्षिण भागमें महेश्वर एवं कपिलेश्वरलिंग हैं। उस स्थानको विद्वान् पुरुष शिवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य सदा पुष्प, धूप, आरती और तर्पण आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इन लिंगोंकी अर्चना करते हैं, वे नरकसे छूटकर शिवलोकको जाते हैं। अनघ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बताया। पापी पुरुषोंको यमराजने यह बताया है कि 'जो लोग गोदान, स्वर्णदान, तिलदान, अन्नदान, जलदान, सब सामग्रियोंका दान तथा महल और बगीचेका दान करते हैं, वे घोर नरकस्वरूप यमलोकमें नहीं जाते। भगवान् शिवके वचनानुसार वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'
सम्मानको अपमानने, प्रियजनोंके संयोगको वियोगने और जवानीको बुढ़ापेने ग्रस लिया है। सारा सुख दुःखके उपद्रवसे युक्त है। जब बाल पक जाते हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, तब वृद्धावस्थामें जर्जरशरीर होकर विद्वान् मनुष्य क्या कर सकता है? स्त्री और पुरुषोंका यौवन तथा रूप, जो एक-दूसरेको बहुत ही प्रिय लगता है, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंके लिये अप्रिय हो जाता है। जो अपने-आपको अपूर्व शिथिलतासे युक्त देखकर भी संसारसे विरक्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है? जराग्रस्त मनुष्य अशक्त होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्ध मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष किसी भी पुरुषार्थका साधन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसलिये बुढ़ापा आनेसे पहले ही धर्माचरण करे। युधिष्ठिर! शरीरमें वात, पित्त और कफ आदिकी विषमता होती रहती है तथा वात, पित्त, कफका समूह शरीरसे ही उत्पन्न बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर सदा रोगोंका ही आश्रय है, ऐसा जानना चाहिये। जब वातका प्रकोप होता है और मनुष्य ज्वरसे पीड़ित होता है, तब अनेक प्रकारसे होनेवाले रोगोंके कारण उसे बहुत दुःख सहन करने पड़ते हैं। इस शरीरमें मृत्युके साधन सौसे भी अधिक हैं। इनमेंसे एक मृत्यु तो कालरूप है और शेष मृत्युएँ आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक होती हैं वे ओषधिसेवन तथा जप, होम और दान आदिसे शान्त हो जाती हैं; परंतु कालरूप मृत्यु किसी उपायसे भी शान्त नहीं होती। विष और मद्य आदिसे मनुष्यकी अपमृत्यु होती है। अतः इन सब वस्तुओंका सेवन कदापि न करे। अनेक प्रकारके रोग, कष्ट, सर्प आदि जीव, विष और मारण आदिके प्रयोग—ये सब देहधारियोंके लिये मृत्युके द्वार हैं। यदि मनुष्यका मृत्युकाल आ पहुँचा है, उस समय रोग, सर्प आदिसे पीड़ित हो तो साक्षात् धन्वन्तरि भी उसे नहीं बचा सकते। कालपीड़ित मनुष्यकी रक्षा करनेमें ओषधि, तप, दान, मित्र और बान्धव—कोई भी समर्थ नहीं हैं। मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई शत्रु नहीं है तथा समस्त देहधारियोंके लिये मृत्युके समान दूसरा कोई काल नहीं है। युधिष्ठिर! श्रेष्ठ और सुन्दर स्त्री, पुत्र, मित्र, राज्य तथा ऐश्वर्य आदि नाना प्रकारके सम्पूर्ण सुखोंको मृत्यु सहसा छीन लेती है। राजन्! भाई-बन्धु आदिके रूपमें जो यह दुस्तर संसार है, इसका तुम्हें यत्किंचित् परिचय दिया गया है। यह सब परिणामी—नाशवान् है, कालका भोजन है। ऐसा जानकर प्रयत्नपूर्वक नर्मदाका सेवन करना चाहिये। नर्मदा सब दुःखोंका निवारण और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाली है। जो जिन कामनाओंको पाना चाहता है, नर्मदादेवी उसे वे सभी वस्तुएँ देती हैं।
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१०२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
मातंग, मृगवन और वाराहतीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—माहिष्मतीपुरीके पश्चिम अशोकवनिका नामक एक पापहारी तीर्थ है, जो सब प्रकारके शोकोंका विनाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करके अपने वैभवके अनुसार गौरीदेवीका पूजन करे। वहीं मातंगमुनिका आश्रम है। जो स्त्री शुक्ल और कृष्ण पक्षकी तृतीयाको गन्ध, धूप, चन्दन, नाना प्रकारके उपहार तथा दीपावली जलाने आदिके द्वारा वहाँ भक्तिपूर्वक गौरीदेवीका पूजन करती है, वह रूप और सौभाग्यसे सम्पन्न पति प्राप्त करती है।
युधिष्ठिर ! पूर्व कल्पकी बात है—मातंग नामसे प्रसिद्ध देवर्षिने नर्मदा नदीके तटपर रहकर बड़ी दुष्कर तपस्या की थी। महर्षियोंके सत्संग और नर्मदाके दर्शनसे उन्होंने पाप-बुद्धिका परित्याग करके धर्म-बुद्धिका आश्रय लिया था। 'मैं विरक्त और भिक्षु हूँ' ऐसा विचारकर वे अशोकवनिकामें गये और जटा, वल्कल धारण करके कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर रहे। सब मन्त्रोंमें उत्तम 'ॐ नमः शिवाय' इस षडक्षर मन्त्रका वे दिन-रात अपने हृदयमें चिन्तन करते थे। उनकी उस पराभक्तिको जानकर देवाधिदेव महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'सुव्रत ! इस ध्यानसे तुम्हारा कल्याण हो, तुम वर माँगो।'
मातंग बोले—देवेश्वर ! यह तीर्थ मातंगके नामसे विख्यात हो। इसमें चाण्डाल, श्वपच आदि पापयोनिके जीव तथा जप आदिसे रहित पुरुष भी पापमुक्त होते रहें। जो यहाँ स्नान करके नर्मदातटवर्ती मातंगेश्वरलिंगका पूजन करे, उसका संसार-बन्धन छूट जाय।
मातंग मुनिका यह वचन सुनकर महादेवजी बोले—मुने ! मेरे प्रसादसे यह सब कुछ तुम्हारे इच्छानुसार होगा। ऐसा कहकर भगवान् शिव पर्वतश्रेष्ठ कैलासको चले गये और मातंग मुनि वरदान पाकर दिव्य विमानपर आरूढ़ हो उमा-महेश्वर-धामको चले गये। चैत्रके कृष्ण पक्षमें जो चतुर्दशी और अमावास्या तिथि आती है, उसमें वहाँ जो कुछ दान, होम आदि किया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें तिल और जलद्वारा तर्पण करनेसे और गुड़-सत्तूका पिण्डदान देनेसे चौदह इन्द्रोंके स्थित कालतक पितर तृप्त रहते हैं। अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध स्थान मातंग-तीर्थ कहलाता है, वह नर्मदाके उत्तर तटपर विद्यमान है।
युधिष्ठिर ! अब मैं नर्मदाके दक्षिण तटपर विद्यमान मृगवन नामक तीर्थका वर्णन करूँगा। महाराज ! वहाँ एकादशीको स्नान करके शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका अर्चन करे और निराहार रहकर रात बितावे। प्रातःकाल होनेपर फिर गन्ध और पुष्पोंद्वारा मृगवनमें श्रीहरिकी पूजा करे। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेका पुण्य होता है। तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको वैष्णव पदकी प्राप्ति होती है। वहीं उत्तम वाराहतीर्थ है, जहाँ वाराहरूप धारण करके भगवान्ने इस पृथ्वीका उद्धार किया था और वहीं अमित तेजस्वी श्रीहरिने विश्वरूपको भी धारण किया था। जो पतिव्रता नारी मासोपवास व्रत करके वहाँ विधिपूर्वक स्नान करती है, वह विष्णुधामको जाती है।
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* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२३
संसारसे मुक्त होनेके लिये पाप और पाखण्डी जनोंके त्याग तथा शिव एवं नर्मदाके आश्रय लेनेका उपदेश
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! नर्मदातटपर उत्तम सिद्धि देनेवाला मनोरथ नामक एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ स्नान करके मनुष्य जिस-जिस मनोरथको चाहता है, उस तीर्थके प्रभावसे वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। वहीं संगमपर अंगारेश्वरदेव स्थित हैं, जहाँ स्नान-मात्र करनेवाला मनुष्य गणपति-पदपर प्रतिष्ठित होता है।
पाप बड़े ही कड़वे और अत्यन्त दुःख देनेवाले होते हैं। इसलिये पाप कभी नहीं करना चाहिये। जिस देश-कालमें और जैसी आयुके द्वारा मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है, वह उसी प्रकार उसे भोगना पड़ता है। अतः अपनी शक्तिके अनुसार याचकको निरन्तर दान देना चाहिये। विद्वान् पुरुष शास्त्र और युक्तियोंद्वारा सदा आत्माके कल्याणका विचार करे। केवल अनुमानके ही द्वारा उसपर विचार नहीं करना चाहिये। कर्मोंके हीन और उत्तम नाना प्रकारके फल बताये गये हैं; अतः मनुष्य कोई कर्म करनेके पहले उसकी परीक्षा कर ले। जिसका श्रेष्ठ और महान् फल हो, वही पुण्यकर्म है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह पाखण्डी, शास्त्रविपरीत कर्म करनेवाले, वैडालव्रती (दम्भी), शठ, युक्तिवादी, तीर्थनिन्दक, दिगम्बर तथा अन्यान्य पाखण्डी जनोंको दूरसे ही त्याग दे। नंगे, मथमुण्डे और विष्ठाभोजी अघोरी—कलियुगमें धर्मके विपरीत आचार उपस्थित करते हैं। अतः उनके चलाये हुए पाखण्डका परित्याग करके तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका आचरण करे। सब धर्मोंमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवजीके वचन ही प्रमाण हैं। जो उनके विपरीत बर्ताव करता है वह निश्चय ही नरकमें गिरता है। पितरोंका तर्पण करे, भिखारीको भीख दे, सब प्राणियोंपर दया करे तथा नर्मदाजीकी माहात्म्य-कथाका चिन्तन करे। यही सब कर्मोंको शुद्ध करनेवाला सम्पूर्ण ज्ञान है। जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, स्वभावसे सबके स्वामी, सर्वज्ञ और परिपूर्ण हैं, वे भगवान् शिव शैवशास्त्रोंद्वारा जाननेयोग्य हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित जो ज्ञान है, वह संशयरहित एवं सम्पूर्ण प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाला है। जो सर्वज्ञ हैं, सम्पूर्ण हैं, स्वभावतः निर्मल तथा सम्पूर्ण दोषोंसे रहित हैं, वे कल्याणमय शिव कोई विपरीत बात कैसे कह सकते हैं?
भगवान् शिवकी आज्ञाके बिना संसारकी सृष्टि कैसे हो सकती है? यदि कहें कि प्रकृतिसे सृष्टि होती है, तो ठीक नहीं, क्योंकि वह जड है। यदि कहा जाय कि जीवात्मा ही सृष्टि करता है, तो यह भी उचित नहीं है; क्योंकि वह सर्वज्ञ नहीं, अज्ञ है। परमाणु आदि जो प्राकृत तत्त्व हैं, वे सब अचेतन हैं; अतः वे किसी बुद्धिमान् सहायकके बिना न तो स्वयं रचना कर सकते हैं, न देख ही सकते हैं। जैसे कुम्भकारके बिना मिट्टी स्वयं घड़ेके रूपमें नहीं परिणत होती, उसी प्रकार जड प्रकृति बुद्धिमान् चेतनके बिना स्वयं कुछ नहीं कर सकती। जैसे यह घोर संसार-समुद्र अनादिकालसे चला आ रहा है, उसी प्रकार इस संसारसे छुड़ानेवाले भगवान् शिव भी अनादि हैं। जैसे ओषधि स्वभावसे ही रोगोंका निवारण करनेवाली है, उसी प्रकार भगवान् शिव भी स्वभावसे ही घोर संसार-बन्धनका नाश करनेवाले माने गये हैं। जैसे वैद्यके बिना रोगी क्लेश उठाते हैं, उसी प्रकार भगवान् शिवके बिना सम्पूर्ण जगत् दुःख उठाता है। अतः अनादि, सर्वज्ञ, परिपूर्ण, परम शिव ही सबके त्राता हैं। उनके सिवा दूसरा कोई पुरुष इस संसार-समुद्रसे रक्षा करनेवाला नहीं है। जो अपने हृदयमें भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए शिवज्ञानका अभ्यास करते हैं, उन्हें अवश्य ज्ञान होता है। नरश्रेष्ठ! ऐसा जानकर शिवस्वरूपा नर्मदादेवीका आश्रय
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लेकर उसके तटपर धन-धान्यसे सम्पन्न दिव्य गृह तथा अच्छे-अच्छे अन्य आवश्यक सामान ब्राह्मणोंको आदरपूर्वक देने चाहिये। अनाथ, अत्यन्त वृद्ध, विकल एवं कुटुम्बी ब्राह्मणको विशेषरूपसे देना चाहिये। जो ब्राह्मणको काठ और मिट्टीसे बना हुआ गृह दान करता है अथवा उसके लिये अमरकण्टकपर सब ओर सुन्दर-सुन्दर दिव्य भवन निर्माण कराता है, वह सर्वोत्तम दानका फल प्राप्त करता है। केवल यही दान उसके समस्त कामनाओं और प्रयोजनोंका साधक होता है। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता है, वह सब पापोंसे मुक्त होता है।
शिवलोककी उत्कृष्टता, गोसेवाका महत्त्व, दानकी महिमा तथा नर्मदातटपर दान एवं शिवध्यानका माहात्म्य
**युधिष्ठिरजी बोले—**भगवन्! गोलोक कैसा बताया गया है, किस कर्मसे उसकी प्राप्ति होती है और कौन-कौन वहाँ निरन्तर रहते हैं?
**मार्कण्डेयजीने कहा—**सब लोकोंसे ऊपर महादेवजीका लोक है, वह परम दिव्य और सर्वश्रेष्ठ है। वहीं वृषभरूपसे धर्म भी विद्यमान हैं। जहाँ उनके पति वृषभरूप धर्म हैं, वहीं गोमाताएँ भी निवास करती हैं और उसी लोकमें देवताओं और असुरोंसे पूजित नर्मदादेवी भी विद्यमान हैं। उन्हींके जलसे गौएँ, बछड़े तथा सब देवता तृप्त होते हैं। ब्रह्मा, विष्णु, उमासहित महेश्वर, देवता, ऋषि, पितृगण, मातृगण तथा अन्यान्य लोकोंसहित शिवलोक और नर्मदालोक भी इस गोलोकके अन्तर्गत हैं। रुद्रलोकके जो गुण हैं, वही गोलोकके हैं। नन्दा, भद्रा, सुभद्रा, सुशीला तथा सुरभि—ये पाँच गोमाताएँ शिवलोकसे प्रकट हुई हैं। छठी नर्मदादेवी भी वहींसे सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेकी इच्छासे प्रकट हुई हैं। महाराज! ये सब लोकमाताएँ अपने गुणोंद्वारा इस सम्पूर्ण जगत्को सदा तृप्त करती रहती हैं।
शिवलोकसे प्रकट हुई गौएँ यहाँ आकर घास खाती हैं, वनमें चरती हैं, निर्मल जल पीती हैं, शरीरको पवित्र करती हैं और मधुर दूध देती हैं, जिससे सम्पूर्ण जीव-जगत् जीवन धारण करता है। जैसे छोटे बच्चेवाली स्त्रियोंसे घरकी शोभा होती है, उसी प्रकार छोटे बछड़ेवाली गौओंसे जिनका घर सुशोभित है, उनके शरीरमें पाप कहाँसे रह सकते हैं। जो लोग ॐकार और नर्मदाका सदैव शिवरूपसे स्मरण करते हैं, उनका पुनः इस संसार-सागरमें जन्म नहीं होता। जो घास और जल देकर गौओंके प्रति परम भक्तिभाव रखते हैं, वे उन गौओंके प्रसादसे शिवलोकमें जाते हैं। ये गोमाताएँ सदा अनुकूल रहनेपर समस्त कामनाओंको देनेवाली हैं। जो इन कल्याणमयी गौओंकी रक्षा करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं। जो उत्तम विधिके साथ एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक भगवान् शिवका पूजन करते हैं, वे निश्चय ही शिवके धामको जाते हैं। भगवान् शिवके निवासस्थानरूप तीर्थोंमें जो मनुष्य श्रद्धापूर्वक जाते हैं, विशेषतः जो नर्मदा और अमरकण्टककी यात्रा करते हैं, वे ब्रह्मा, विष्णु और शिवके लोकोंमें विहार करते हैं। राजन्! इस प्रकार तुम्हें नर्मदाका मंगलमय अवतार बताया गया है।
**युधिष्ठिरजी बोले—**मुने! अब मैं दान-धर्मका विधान सुनना चाहता हूँ। जो लोग दरिद्र और भिक्षुक हैं, उन्हें शिवधामकी प्राप्ति कैसे होती है?
**मार्कण्डेयजीने कहा—**राजन्! कमल, बिल्वपत्र, कुश और नर्मदाका जल—इन सबको भगवान् ब्रह्माजीने सामान्यतः धर्मका हेतु बताया है (ये सर्वसुलभ हैं)। सभी धर्म, पुराण और श्रुतियाँ—ये श्रद्धा और विश्वाससे ही पावन होते हैं।
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२५
पुराणों और श्रुतियोंके उपदेश किये हुए धर्मका आचरण करनेसे मनुष्य स्वर्गलोकमें जाते हैं। जो शिवजीका ध्यान करनेवाले ब्राह्मणको श्रद्धापूर्वक रूई भरा हुआ बिस्तर, कटिसूत्रसहित लाल वस्त्र, नवीन वस्त्रमें लपेटा हुआ तथा पवित्र धूपसे सुवासित किया हुआ यज्ञोपवीत देता है, वह रूईके उन वस्त्रोंमें जितने तन्तु होते हैं और उन तन्तुओंमें जितने रोम होते हैं, उतने सहस्र वर्षोंतक शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो भगवान् शिवके उद्देश्यसे शिवभक्तको नैवेद्य देता है अथवा शाक, मूल, फल आदि अर्पण करता है, वह तण्डुल, फल और दल आदिकी जितनी संख्या होती है, उतने सहस्र वर्षोंतक शिवलोकमें सम्मानित होता है। जो शिवभक्तको दही-भातसे भरा हुआ सुन्दर भिक्षापात्र अर्पण करता है, वह शिवधाममें निवास करता है। जो अपनी शक्तिके अनुसार शैवव्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणको भोजन कराता है, वह भगवान् शिवके लोकमें प्रतिष्ठित होता है। जो भक्तिपूर्वक शिवकी पूजा करते हैं, वे शिवलोकमें जाते हैं।
इस प्रकार प्रसंगवश शिवलोक, गोलोक* और नर्मदालोकका वर्णन किया गया है, जहाँ शिवभक्त पुरुषोंका निवास है। जो ज्ञानयोगसे शान्तचित्त हो परम शिवका जप करते हैं, वे सब दुःखोंसे मुक्त हो सदा सुखी बने रहते हैं। पृथिवी, जल, तेज, वायु, आकाश, अहंकार, सत्त्वगुण और प्रकृति—इन आठ आवरणोंसे युक्त शिवलोक है। वह दस हजार सूर्योंके समान कान्तिमान् परम स्थान है। ज्ञान और ध्यानमें संलग्न, शान्त, भिक्षान्नभोजी, जितेन्द्रिय, भगवान् शिवकी प्रसन्नताके लिये सत्कर्म करनेवाले और जिनके पाप दग्ध हो गये हैं, ऐसे श्रेष्ठ ब्राह्मण ही उस परम धाम शिवलोकको पानेके अधिकारी हैं। जिस सत्यस्वरूप लोकमें शुद्धचित्त एवं अविद्या आदिके क्लेशोंसे रहित महात्मा पुरुष निवास करते हैं, उसी उत्तम पदको नर्मदाजीका सेवन करनेवाले मनुष्य भी पा लेते हैं।
जो नर्मदाके तटपर मेरे बताये अनुसार दान करते हैं, वे सब कुछ जाननेवाले, सर्वत्र जानेकी शक्ति रखनेवाले शुद्ध एवं परिपूर्ण हो जाते हैं। जो शुद्धकर्मोंमें तत्पर रहते हैं, वे परम ऐश्वर्यसे सम्पन्न हो अपनी इच्छाके अनुसार साकार या निराकार रूपमें स्थित होते हैं। सम्पूर्ण जगत्के स्वामी पार्वतीवल्लभ भगवान् नीलकण्ठका यह दिव्य स्थान नित्य, विशुद्ध, अविनाशी एवं सदा एकरस रहनेवाला है। जो लोग नर्मदाके तटपर रहकर शिवजीके ज्ञानका अभ्यास करते हैं, वे काम-तृष्णासे मुक्त होकर शिवलोकमें जाते हैं। जो एक दिन भी शिवधर्मका पालन करते हुए भगवान् शिवके ध्यानमें तत्पर होता है, उसके धर्मका अन्त नहीं है।
अमरावतीके दक्षिण विष्णु-मन्दिरकी महिमा, मेघवनका महत्त्व तथा विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम
मार्कण्डेयजी कहते हैं— गौएँ बड़ी पवित्र वस्तु हैं; वे सब प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाली हैं। अतः गोदान और शिवभक्तिसे मनुष्य पापमुक्त हो जाता है। वैवस्वत मन्वन्तरमें राजर्षि वीरणके पुरोहित मैत्रेयजी हुए थे, जिन्होंने नर्मदाके तटपर भगवान् विष्णुका मन्दिर बनवाया है। वह मन्दिर अमरावती पुरीके दक्षिण दिशामें नर्मदा-तटपर विद्यमान है। उसके माहात्म्यसे और नर्मदाके प्रभावसे वे द्विजश्रेष्ठ भगवान् विष्णुके लोकमें आनन्द भोगते हैं।
युधिष्ठिर ! नर्मदाके पश्चिम और उत्तर तटपर जो-जो उत्तम तीर्थ हैं, उनका वर्णन सुनो। यज्ञ पर्वतपर मेघवन नामसे प्रसिद्ध एक वन है, जहाँ
* यह गोलोक शिवलोकका ही एक अंग है।
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पूर्वकालमें चक्रवर्ती राजा रन्तिदेवने देवता, असुर और मनुष्योंसहित अपने कुलको गोलोकमें पहुँचाया है।
विभिन्न तीर्थोंकी महाशक्तियोंके नाम इस प्रकार हैं— (१) काशीमें विशालाक्षी, (२) नैमिषारण्यमें लिंगधारिणी, (३) प्रयागमें ललिता देवी, (४) गन्धमादनमें कामुका देवी, (५) मानसमें कुमुदा, (६) अम्बरमें विश्वयोनि, (७) गोमन्त पर्वतपर गोमती, (८) मन्दराचलपर कामचारिणी, (९) चित्ररथ वनमें मदोत्कटा, (१०) हस्तिनापुरमें तपन्ती, (११) कान्यकुब्जमें गौरी, (१२) कमल पर्वतपर प्रभा, (१३) एकाग्रक्षेत्रमें कीर्तिमती, (१४) विश्वेश्वरक्षेत्रमें विश्वा, (१५) पुष्करमें पुरूहूता (१६) केदारमें मार्गदायिनी, (१७) हिमालयपर नन्दा, (१८) गोकर्णक्षेत्रमें भद्रकर्णिका, (१९) स्थानेश्वरमें भवानी, (२०) विल्वकमैं विल्व-पत्रिका, (२१) श्रीशैलपर माधवी, (२२) भद्रेश्वरमें भद्रा, (२३) वाराह पर्वतपर जया, (२४) कमलालयमें कमला, (२५) रुद्रकोटिमैं रुद्राणी, (२६) कालंजरेमें कोटि, (२७) महालिंगमें कपिला, (२८) माकोटमें मुकुटेश्वरी, (२९) शालग्राममें महादेवी, (३०) शिवलिंगमें जलप्रिया, (३१) मायापुरीमें कुमारी, (३२) सन्तानमें ललिता, (३३) उत्पलक्षेत्रमें सहस्राक्षी, (३४) हिरण्याक्षमें महोत्पला, (३५) तीर्थामैं मंगला, (३६) पुरुषोत्तमक्षेत्रमें विमला, (३७) विपाशामैं अमोघाक्षी, (३८) पुण्ड्रवर्धनमें पाटला, (३९) सुपार्श्वमें नारायणी, (४०) त्रिकूटमें भद्रसुन्दरी, (४१) विपुलमें विपुला, (४२) प्रलयाचलमें कल्याणी, (४३) विकोटितीर्थमें कोटी, (४४) यमुनामें मृगावती, (४५) करवीरमें महालक्ष्मी, (४६) विनायकमें उमादेवी, (४७) वैद्यनाथमें आरोग्या, (४८) महाकालमें महेश्वरी, (४९) कृष्णतीर्थमें अभया, (५०) विन्ध्य-गिरिकी कन्दरामें अमृता, (५१) माण्डव्यतीर्थमें माण्डुका, (५२) माहेश्वरपुरमें स्वाहा, (५३) प्रचण्डतीर्थमें छागलम्बा, (५४) अमरकण्टकमें चण्डिका, (५५) सोमेश्वरमें वाराही, (५६) प्रभासमें पुष्करावती, (५७) सरस्वतीमें देवमाता, (५८) पारावतमें पारा, (५९) महालयमें महाभागा, (६०) पयोष्णीमें पिंगलेश्वरी, (६१) कृतशौतीतर्थमें संहिता, (६२) कार्तिकेयमें शांकरी, (६३) उत्पलावर्षकमें लोला, (६४) शोणसंगममें सुभद्रा, (६५) मालासिद्धतलमें लक्ष्मी, (६६) भारताश्रममें अनन्ता, (६७) जालन्धरेमें सिद्धमुखी, (६८) किष्किन्धा पर्वतपर तारा, (६९) देवदारुवनमें पुष्टि, (७०) कश्मीरमण्डलमें मेधा, (७१) हिमालयमें भीमा देवी, (७२) वस्त्रेश्वरतीर्थमें तुष्टि, (७३) कपालमोचनमें सिद्धि, (७४) कायावरोहणमें माता, (७५) शंखोद्धारमें धृति, (७६) पिण्डारकमें ध्वनि, (७७) चन्द्रभागामें कला, (७८) अक्षोदमें शिवधारिणी, (७९) वैजयन्तीमें ऋता, (८०) बदरीमें ओषधि, (८१) उत्तरकुरुमें भी ओषधि, (८२) कुशद्वीपमें कुशोदका, (८३) हिमकूटमें मन्मथा, (८४) प्रमतमें सत्यवादिनी, (८५) अश्वत्थमें वन्दिनी, (८६) वैश्रवण (कुबेरतीर्थ)-में निधि, (८७) वेदवदनमें गायत्री, (८८) शिवके समीप पार्वती, (८९) देवलोकमें इन्द्राणी, (९०) ब्राह्मणके मुखमें सरस्वती, (९१) सूर्यबिम्बमें प्रभा, (९२) मातृकातीर्थमें मातृका, (९३) वैष्णवतीर्थमें वैष्णवी, (९४) सतियोंमें अरुन्धती, (९५) अप्सराओंमें तिलोत्तमा, (९६) सब देहधारियोंमें चिति, (९७) ब्रह्मकला तथा (९८) शक्ति।
ये नाम और तीर्थ संक्षेपसे बताये गये हैं। जो प्रातःकाल उठकर इनका पाठ करता है, वह परम गतिको प्राप्त होता है। इन तीर्थोंमें स्नान करके जो मनुष्य इन शक्तियोंका दर्शन करते हैं, वे सब पापोंसे मुक्त हो परम गतिको प्राप्त होते हैं। जो इन देवियोंके तीर्थस्थानोंमें अपने शरीरका त्याग करता है, वह ब्रह्मलोकको भेदकर शिवजीके परम धामको प्राप्त करता है। गोदानके समय, श्राद्धमें, विवाह आदि मंगलकार्योंमें तथा देवार्चनके समय भी जो इन नामोंका पाठ करता है, वह ब्रह्मपदको प्राप्त होता है।
- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२७
अशोकवनिकातीर्थमें महाराज रविश्चन्द्रके द्वारा यज्ञ, दान तथा मुनियोंका उद्धार
मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके दक्षिण भागमें माण्डव्यमुनिका आश्रम है। उसमें विभाण्डक, गार्ग्य तथा ऋष्यशृंग आदि उत्तम व्रतका पालन करनेवाले महर्षि सहस्रोंकी संख्यामें निवास करते हैं। राजन्! अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध उत्तम तीर्थकी महिमा सुनो। वहाँ भगवान् शंकर पार्वतीदेवीके साथ निवास करते हैं। वहाँ विशोका नदी और नर्मदाका संगम हुआ है। वहाँ स्नान करनेवाले मनुष्य स्वर्गमें जाते हैं और जिनकी वहाँ मृत्यु हो जाती है, वे मुक्त हो जाते हैं। वहीं अशोकेश्वरलिंग है, जो प्रत्यक्ष ही सिद्धि एवं कल्याण प्रदान करनेवाला है। उसी तीर्थमें देवर्षि नारदने शापभ्रष्ट ब्राह्मणोंको शापसे मुक्त किया था और अब वे ब्राह्मण उस तीर्थके माहात्म्यसे देवता होकर देवलोकमें आनन्द भोगते हैं।
स्वायम्भुव मन्वन्तरके आदिकल्पके सत्ययुगकी बात है। चन्द्रवंशमें रविश्चन्द्र नामसे प्रसिद्ध एक महायशस्वी चक्रवर्ती राजा हो गये हैं, जो कांची नगरीके नरेश थे। उन्होंने समस्त पृथ्वीका धर्मपूर्वक पालन किया था। एक समय वे अगस्त्येश्वरतीर्थमें गये जहाँ भगवान् शंकरका सुन्दर मन्दिर विद्यमान है। अगस्त्य आदि सभी तपस्वी मुनि उस तीर्थका सेवन करते हैं। वहाँ नर्मदा बहती हैं और अमरकण्टक पर्वत भी सुशोभित होता है। सूर्यग्रहणके समय राजा रविश्चन्द्र उस स्थानपर गये जहाँ मुनिमण्डलीसे घिरे हुए महर्षि अगस्त्य तपस्या करते थे। उस समय महातपस्वी शाण्डिल्यजीने महर्षि अगस्त्यको प्रणाम करके पूछा—'तपोनिधे! महातेजस्वी राजा रविश्चन्द्र आपके आश्रमपर पधारे हैं। मैं उनका पुरोहित हूँ। यदि आप कृपापूर्वक स्वीकार करें तो राजा आपके चरणारविन्दोंका अर्चन करना चाहते हैं।'
अगस्त्यजी बोले—नृपश्रेष्ठ रविश्चन्द्र यहाँ शीघ्र आवें और सिंहासनपर विराजमान हों। उनकी आज्ञा पाकर राजा वहाँ आये और उन्होंने मुनिके चरणोंका स्पर्श किया। मुनिने अर्घ्य और पाद्य आदिके द्वारा राजाका सत्कार किया और कुशल-समाचार पूछते हुए कहा—'महाभाग! आप अन्तःपुर और परिवारके साथ सकुशल तो हैं न?'
राजा बोले—मुनीश्वर! आज मेरा जन्म और जीवन सफल हुआ, जो आपके चरणारविन्दोंका दर्शन पाकर मैं सब पापोंसे मुक्त हो गया। मुनिश्रेष्ठ! सर्वतीर्थमयी नर्मदा नदी तो सर्वत्र शुभ और पावन हैं। मैं किस स्थानपर यज्ञ करूँ?
अगस्त्यजीने कहा—राजन्! एकमात्र नर्मदादेवी ही पुण्यमयी और शुभ हैं। जम्बूद्वीप एक लाख योजनका बताया गया है, उसमें जितने भी चराचर प्राणी हैं, उनमेंसे जो तपस्यासे हीन हैं वे भी नर्मदाका जलपान करनेसे भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं। ॐकार आदि शिवलिंग और वैदूर्य आदि पर्वत, द्वापर और कलियुगमें परम पावन होते हैं। नर्मदाके दक्षिण और उत्तर भागमें जो यह देव-दानववन्दित भूमि है इसे यज्ञभूमि कहते हैं। इसीमें अशोकवनिका है, जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। यहाँ किया हुआ यज्ञ बिना किसी विघ्न-बाधाके परिपूर्ण होता है। ऐसा भगवान् शंकरका कथन है।
राजा बोले—महामुने! आपका कल्याण हो, मैं आपके साथ वहीं चलूँगा।
ऐसा कहकर मुनियोंसे घिरे हुए राजा रविश्चन्द्र नर्मदाके दक्षिण तटपर वर्तमान सुन्दर पुण्यतीर्थ अशोकवनिकामें आये। वहाँ दस योजन विस्तृत भूमिमें यज्ञमण्डप बनाया गया और यूप गाड़े गये। उस मण्डपके सभी द्वार और स्तम्भ मणि-माणिक्य तथा रत्नोंकी राशिसे शोभा पा रहे थे। विश्वामित्र, भरद्वाज, कश्यप, भार्गव, ब्रह्मदृश्य, लोमश था दूसरे-दूसरे श्रेष्ठ महर्षि उस यज्ञमें
१०२८ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
सम्मिलित हुए। प्रचुर दक्षिणा पानेवाले ब्राह्मणोंने यज्ञ प्रारम्भ किया। सब देवता बड़े प्रसन्न और तृप्त हुए। इसी समय महान् क्रोधी दुर्वासाजी, यमराज, चित्रगुप्त, काल और मृत्यु भी आये। उस यज्ञमें इनके लिये कोई भाग नहीं दिया गया था। यह देखकर ये सभी कुपित हो उठे। उन सबको रुष्ट देखकर राजा रविश्चन्द्रने कहा— 'यज्ञके समयमें कोई मनुष्य भी आ जाय तो वह चार भुजाधारी भगवान् विष्णुके समान पूजनीय होता है। आपलोगोंको भी मैं अभीष्ट वस्तु दूँगा। अतः प्रसन्न हों।' इस प्रकार राजाके द्वारा अर्घ्य, पाद्य आदि देकर प्रसन्न कराये जानेपर वे सब मुनि सन्तुष्ट हुए।
उस समय दुर्वासाजीने कहा—राजन्! पूर्वकालमें जटा और वल्कल धारण करनेवाले तपस्वीलोग नेपालमें देवताओंके देवता भगवान् पशुपतिकी भक्तिभावसे पूजा करते थे, परंतु उनके साथ उन्होंने पार्वतीजीकी पूजा नहीं की। इसलिये पार्वतीजीने उन ब्राह्मणोंको शाप दिया—'तुमलोग एक सहस्र वर्षोंतक कुत्तेकी योनिमें रहोगे।' तबसे वे मुनीश्वर लोग कुत्तेकी योनिमें पड़े हुए हैं। राजन्! हमारा प्रिय करनेकी इच्छासे तुम उन सबको शापसे मुक्त कर दो।
राजा बोले—मैं उन ब्राह्मणोंको उस शापसे मुक्त करूँगा।
ऐसा कहकर राजाने अपने दूतोंको वनमें भेजा। दूतोंने उन वनवासी मुनियोंको नमस्कार करके उनके पूर्वजन्मका स्मरण कराया। तब वे सब लोग अशोकवनिकामें आये। उन सबको देखकर चक्रवर्ती राजा रविश्चन्द्रने बड़ी प्रसन्नताके साथ कहा—'भगवान् अशोकेश्वर एवं नर्मदादेवीकी महिमासे, मेरे दानके प्रभावसे तथा महर्षियोंके प्रसादसे ये सब मुनि कुत्तेकी योनि त्याग कर शिवलोकमें चले जायें और इनका सब पाप मुझमें आ जाय।'
राजाके ऐसा कहते ही वे सब मुनि तत्क्षण शापसे मुक्त हो गये और राजासे इस प्रकार बोले—आप ही हमारे माता-पिता और मोक्षदाता गुरु हैं। ऐसा कहकर वे सब महर्षि उमामहेश्वर-धामको चले गये।
तब सम्पूर्ण देवताओंने राजाको धन्यवाद दिया। देवताओंकी दुन्दुभियाँ बजने लगीं और आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई।
उस समय दुर्वासाजीने कहा—महाराज! क्षत्रियोंमें मैंने तुम्हारे समान दूसरे किसीको न तो देखा है और न सुना ही है। मनुष्योंके लिये अपने प्राणोंको त्याग देना तो सुकर है, परंतु अपने संचित धर्मका त्याग करना बहुत ही कठिन है। तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।
तब राजा हँसते हुए बोले—मुने! हमारे दानके प्रभावसे पापबुद्धिवाले मनुष्य भी उत्तम पदको प्राप्त हों, यही मेरा प्रिय वर है।
'एवमस्तु'—ऐसा ही होगा—यह कहकर मुनिवर दुर्वासा वहीं अन्तर्धान हो गये। अमित तेजस्वी राजाके उस अद्भुत कर्मको देखकर धर्मराजने कहा—'राजन्! मैं तुम्हें वर देता हूँ, जिसने अपना उत्तम पुण्य दे दिया, उसने यमलोक और देवलोकको भी जीत लिया। राजेन्द्र! तुम अवश्य वर पानेके योग्य हो।'
रविश्चन्द्र बोले—सूर्यनन्दन! मेरे सौ यज्ञ, दान और तपस्याके प्रभावसे वे सभी पापी जीव शिवधामको प्राप्त हो जायँ, जो इस समय पापयोनिमें पड़े हुए हैं। मैं इसी वरको प्राप्त करना चाहता हूँ, आप मुझपर कृपा करें।
यमराजने कहा—सत्यधर्मका पालन करनेवाले राजेन्द्र! तुम्हारी यह इच्छा पूर्ण हो। सुव्रत! इस सत्यके प्रभावसे तुम उत्तम लोकको जाओ। राजन्! तुमने जिन सैकड़ों क्षत्रियों और सहस्रों अन्यान्य जीवोंका पापसे उद्धार किया है, उन सबकी कोई गणना नहीं है।
ऐसा कहकर धर्मराज देव-दानववन्दित कामिक विमानपर आरूढ़ हो अपने लोकको चले गये।
$\sim\sim\circ\sim\sim$
- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२९
वागीश्वरतीर्थमें राजा ब्रह्मदत्तके यज्ञमें प्रेतोंका उद्धार तथा सहस्रावर्त आदि तीर्थोंकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके उत्तर तटपर वागीश्वर नामका एक पुर है, वहाँ वागु नामवाली नदी नर्मदाके साथ मिली है। उस संगममें जो स्नान करते हैं वे स्वर्गको जाते हैं और जो मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। वहाँ दानवोंका विनाश करनेवाली वागीशा चामुण्डा रहती हैं। मणिभद्र और वीरभद्र आदि सैकड़ों राजा उस तीर्थके प्रभावसे शापमुक्त हुए हैं। वहाँ तिलसहित पिण्डदान करनेसे पितरोंको उत्तम गति प्राप्त होती है। सूर्यवंशमें अयोध्याके चक्रवर्ती राजा ब्रह्मदत्त प्रसिद्ध हैं। वे धन-धान्यसे सम्पन्न तथा भय और दरिद्रतासे रहित थे। उनके शासनकालमें समस्त प्रजा बड़े आनन्दसे रहती थी। उन्होंने नर्मदा और वागुके संगममें एक श्रेष्ठ यज्ञ किया था, जिसमें ब्रह्मा, इन्द्र, विष्णु, गणेश तथा महादेवजी आदिने प्रत्यक्ष प्रकट होकर अपना भाग ग्रहण किया। राजा ब्रह्मदत्तकी यज्ञभूमि दस योजनतक फैली हुई थी। उनका यह यज्ञ स्वारोचिष मन्वन्तरके आदि-कल्पवाले सत्ययुगमें हुआ था। उस समय ब्रह्मदत्तके यज्ञसे तथा वागीश्वर और नर्मदाके प्रसादसे प्रेतोंको भी बड़ी तृप्ति हुई। वे प्रेत पहलेके वानप्रस्थ ऋषि थे। उन्होंने स्त्रियोंके आग्रहसे सूर्यग्रहणके अवसरपर कुरुक्षेत्रमें बहुत-सा दान लिया था। इसीसे वे प्रेतभावको प्राप्त हुए थे। प्रेत होनेपर भी उन्हें पूर्वजन्मका स्मरण बना रहा। अतः एकान्तमें बैठकर वे अपने विषयमें इस प्रकार शोक करने लगे—'अहो! जिनके लिये हमने प्रतिग्रह स्वीकार किया, वे हमारे पुत्र, पत्नी, भृत्य और भाई-बन्धु तो ज्यों-के-त्यों बने हुए हैं; वे उस प्रतिग्रहकी आगमें दग्ध नहीं हुए हैं। हमें अकेले ही उस आगमें जलना पड़ा है। यमदूतोंसे पकड़े हुए प्राणियोंके साथ उनके माता-पिता, भाई-बन्धु, स्त्री-पुत्र और धन आदि भी नहीं जाते, एकमात्र धर्म ही उनका साथ देता है।'
इस प्रकार दीर्घकालतक शोक करके स्त्री-पुत्रसे रहित हुए वे प्रेतगण सारी पृथ्वीपर घूम-घामकर नारदजीके उपदेशसे उमापति शिवका ध्यान करते हुए उसी वागीशपुरमें चले आये। वहाँ स्नान करके उन्होंने भगवान् शिव, विष्णु और सूर्यदेवका पूजन किया। ब्रह्मदत्तके उस यज्ञमें आकर वे सभी पापमुक्त हो गये और ब्रह्माजीके लोकमें गये। तदनन्तर राजा ब्रह्मदत्तके ऊपर फूलोंकी वर्षा होने लगी।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्रतिग्रह एक भारी ग्रह है। जो लोभ और मोहसे मोहित हो उस ग्रहसे ग्रस्त हो गये हैं, वे घोर नरकमें डूबते हैं। यद्यपि वेदोक्त यज्ञ और तीर्थयात्रा आदि सत्कर्म भी सफल होते हैं, उनके द्वारा सद्गतिमें सहायता मिलती है, तथापि प्रतिग्रह (दान) लेनेवाले मनुष्य अपने आत्माको क्लेश देते हैं। दाता और याचककी क्या गति होती है, इसकी सूचना उनके हाथोंसे ही मिल जाती है। देनेवाला ऊपरको जाता है और लेनेवाला नीचेको।
सहस्रावर्त नामसे प्रसिद्ध एक तीर्थ है। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करनेवाले पुरुषको वृषोत्सर्गका फल प्राप्त होता है और वह अपनी सात पीढ़ीहतकको पवित्र कर देता है। नर्मदाके उत्तर तटपर यह तीर्थ सहस्र धनुषतक फैला हुआ है। उसके अन्तमें काराका उत्तम वन है। वहाँ स्नान करनेसे अग्निष्टोम यज्ञका फल मिलता है और मनुष्य स्वर्गलोकको जाता है। नर्मदाके उत्तर भागमें सौगन्धिक नामक परम सुन्दर वन है, जिसमें प्रवेश करके मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। तदनन्तर नदियोंमें उत्तम सरस्वती नदी हैं। उनके जलमें स्नान करना चाहिये। वहाँ देवताओं और पितरोंका तर्पण करके मनुष्य अश्वमेध यज्ञका फल पाता है। वहीं ईशानाध्युषित नामक परम दुर्लभ तीर्थ है। नरश्रेष्ठ ! व्यतिपात योग, संक्रान्ति और ग्रहणके समय उस
१०३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *
तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र कपिला गौओं, सुगन्धित पदार्थों और सुवर्णोंके दानका तथा पंच-यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। भारत! वहीं त्रिशूल नामक तीर्थ है। वहाँ जाकर जो स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करता है, वह देहत्यागके पश्चात् गणपति-पदको प्राप्त होता है। युधिष्ठिर! नर्मदाके उत्तर तटपर ब्रह्मह्रद नामसे विख्यात एक तीर्थ है जो इच्छानुसार भोग एवं फल देनेवाला है। यहाँपर श्राद्धका दान देनेसे पितर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। नर्मदाके उत्तर भागमें अत्यन्त उत्तम सोमतीर्थ है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है।
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देवपथतीर्थ, शुक्लतीर्थ, दीप्तिकेश्वरकी महिमा, देवासुरोंके द्वारा महादेवजीकी स्तुति तथा वैष्णव तीर्थकी महिमा
मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर देवपथ नामक सर्वदेवमय शुभ तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष सब यज्ञोंका फल पाता है। वहीं देवपथ नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग भी है, जिसका श्रद्धापूर्वक दर्शन करनेसे पितरोंकी उत्तम गति होती है। वहीं सहस्रयज्ञ नामका उत्तम तीर्थ है, जहाँ मार्गशीर्ष मासमें एकादशी तिथिको भगवान् विष्णुकी पूजा करके मनुष्य सहस्र यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाता है। उस तीर्थके प्रभावसे वह पापरहित हो जाता है। वह यमलोकको नहीं देखता और पशु-पक्षियोंकी योनिमें भी नहीं जाता। तदनन्तर शुक्लतीर्थमें जाय। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य दस गोदानका फल पाता है। शुक्लतीर्थ आठ हाथका है। वहाँ कालाग्निरुद्र तथा श्रीकण्ठदेव हैं। पूर्वकालमें इन्द्रने भी देवदेव उमापतिको नर्मदाके जलसे नहलाकर बिल्वपत्रोंद्वारा उनका पूजन किया था। शुक्लतीर्थके प्रभावसे ही देवता उद्दीप्त हो रहे हैं। वहीं कश्यपजीका देवताओं और सिद्धोंसे सेवित पुण्य आश्रम है। वहाँ दस हजार मुनि शुक्लेश्वरकी उपासना करते हैं। कुबेरने सूर्यग्रहणके अवसरपर शुक्लतीर्थमें चन्दन, अगर, कपूर, फूल-माला, चँदोवा, ध्वज तथा दीपमाला आदि उपचारोंसे महेश्वरका पूजन किया था। अतः उस तीर्थके प्रभावसे ही वे यक्षोंके राजा और धनके स्वामी हुए हैं। उसी तीर्थके प्रभावसे देवताओंने देवलोकमें नाना प्रकारके भोग प्राप्त किये हैं। वह तीर्थ सर्वतीर्थमय और सर्वदेवमय है। वहाँ स्नान और महादेवजीका पूजन करके मनुष्य सब देवताओं और दैत्योंके गणोंसे पूजित होता है।
राजन्! ययाति नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन किया है। जहाँ पुण्यसलिला मधुमती नदी नर्मदाके साथ मिली है, वहाँ उन्होंने ब्राह्मण-ऋत्विजोंके साथ यज्ञ प्रारम्भ किया था। वहीं मध्येश्वरलिंग है जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गमें जाते हैं और जो वहाँ मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। उसी स्थानपर भगवान् विष्णुने मधु और कैटभ नामक दैत्योंका वध किया था। वहाँ श्रीविष्णुदेवके पूजनसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। उस तीर्थमें तिलोंके साथ जलदान और पिण्डदान करनेसे पितर चौदह इन्द्रोंकी स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं। ययातिका यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् वहाँ पातालसे कालाग्निके समान कान्तिमान् एक शिवलिंग प्रकट हुआ। भारत! उस लिंगकी प्रभासे सम्पूर्ण जगत् उज्ज्वल हो गया। तब लिंगरूपधारी भगवान् वृषध्वजने राजा ययातिसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।'
ययाति बोले—देव! आप भगवती पार्वतीके साथ यहाँ रहें और इस स्थानका कभी त्याग न करें। यहाँ किये हुए यज्ञ, दान आदि सब
* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३१
कार्य सदा अक्षय हों। तपस्या और दानसे रहित पापी मनुष्य भी यहाँ स्नान करके शुक्लतीर्थके प्रभावसे आपके लोकमें चले जायें।
महादेवजीने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होगा।
तत्पश्चात् सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि ययाति भी दीर्घकालतक राज्यका पालन करके अन्तमें स्वर्गलोकको गये।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—दीप्तिकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक सिद्धलिंग कहा गया है, जिससे श्रेष्ठ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी प्रसिद्ध नहीं है। दीप्तिकेश्वर देवका दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेसे अनेक जन्मोंका घोर पाप क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो मानव एक दिन या दो घड़ी भी उनकी पूजा करता है वह इस भयानक संसार-समुद्रमें फिर जन्म नहीं लेता।
देवताओंके स्वामी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्यान्य देवताओंके द्वारा विभिन्न नामोंसे उन उमावल्लभ महादेवजीकी स्तुति इस प्रकार की गयी— भगवान् शिव सदा रहनेवाले, अचल, प्रभा, प्रकाशरूप, दीप्तिमान्, श्रेष्ठ वर देनेवाले, अभीष्ट मनोरथ, पापहारी, श्वेतवर्ण, सब प्राणियोंका संहार करनेवाले, सर्वसमर्थ, संसारके कारण, वैराग्य एवं मोक्षके कारण, संयमरूप, सनातन, अटल, श्मशानवासी, भगवान्, आकाशमें विचरनेवाले, इन्द्रियोंमें व्याप्त, वन्दना करनेयोग्य, महान् कर्म करनेवाले, तपस्वी, समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, मतवाले वेषमें अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाके पालक और स्वामी, विराट्स्वरूप, विशाल शरीरवाले, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, विविध रूपोंवाले, छोटे रूपवाले, मनन करनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके पालक, छिपे रूपवाले, सदाप्रसन्न, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले, प्रवृत्तिमार्गमें स्थित, महान् अंगोंवाले, समष्टिरूप, सबके सुनिश्चित आधार, सब कामनाओंसे सम्पन्न, स्वतः प्रकट होनेवाले, आदि और अन्त अर्थात् सृष्टि और संहार करनेवाले, जीवोंके आश्रय, सहस्रों नेत्रोंवाले, भयंकर नेत्रोंवाले, चन्द्रस्वरूप अथवा उमासहित, नक्षत्रोंको सिद्ध करनेवाले, चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह, ग्रहपति, श्रेष्ठ, तपस्याके साक्षी, बलस्वरूप, खड़े रहनेवाले, यज्ञरूपी मृगपर बाण चलानेवाले, पापरहित, महान् तपस्वी, दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले, सबकी उत्पत्तिके आदिकारण, दीनोंपर दया करनेवाले, सूर्यरूपसे वर्ष पूरा करनेवाले, मन्त्र, प्रमाण, परम तपःस्वरूप, योगी, योगकी महान् शक्तिसे सम्पन्न, महान् वीर्यवाले, हर, महाचेता, सर्वज्ञ, कारणसहित, संहारकारी, हरण करनेवाले, कमण्डलुधारी, धनुष धारण करनेवाले, सबके प्राणोंको अपने हाथपर रखनेवाले, प्रतापवान्, जीवात्मारूप, अपनेसे भिन्न अन्य किसी ईश्वरसे रहित, शूलधारी, खट्वांगधारी, पट्टिशधारी, पवित्र, पवित्रस्वरूप, तेजःस्वरूप, तेज प्रकट करनेवाले, आश्रयस्वरूप, मुकुट धारण करनेवाले, सुमुख, जलमें रहनेवाले, विस्तार करनेवाले, सूर्यरूप, सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले, सुन्दर तीर्थरूप, अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले, शृगालेश्वररूपसे प्रकट, सर्वप्रयोजनरूप, सूँड धारण करनेवाले गणेशरूप, निर्मल, जलके आधारभूत कमण्डलुकी भाँति सम्पूर्ण संसारके आश्रय, अजन्मा, सुगन्धित माला धारण करनेवाले, हरिणरूपधारी, कपाल धारण करनेवाले, जिनके वीर्यकी गति ऊपरकी ओर है ऐसे, ऊपरके लोकोंके साक्षी, ऊँची उठी हुई भुजाओंवाले, नभ, अष्टमूर्तियोंमेंसे आकाशरूप, तीन जटा धारण करनेवाले, सब जीवोंके आवासस्थान, रुद्र, कार्तिकेयरूपसे देवताओंके सेनानायक, सर्वव्यापक, दिनमें चलने-फिरनेवाले, रातमें विचरनेवाले, जिनके श्रीअंगोंसे उत्तम सुगन्ध निकल रही है ऐसे, सम्पूर्ण दिशाओंके स्वामी राजाओंको मारनेवाले परशुरामरूप, त्रिपुरासुर-अन्धकासुर आदि दैत्योंको मारनेवाले, धारण-पोषण करनेवाले, रूपगुणस्वरूप, सिंह और
| १०३२ | संक्षिप्त स्कन्दपुराण |
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शार्दूलरूपसे प्रकट—व्याघ्रेश्वर, गजासुरका गीला चमड़ा धारण करनेवाले, पीड़ा हरनेवाले, समयसे योगसाधनामें तत्पर, महानादस्वरूप, सबके निवासस्थान, चारों ओर जानेवाले मार्गस्वरूप, दुर्धर्ष प्रेतोंमें विचरनेवाले, समस्त प्राणियोंमें रहनेवाले, महान् ईश्वर, अनेक रूपोंमें प्रकट, बहुत धनवाले, समस्त पुरुषार्थस्वरूप, उत्तम गतिस्वरूप, ताण्डव-नृत्यको पसंद करनेवाले, ताण्डव-नृत्य करनेवाले, नाचनेवाले, मेघस्वरूप, भयंकर, बड़ी भारी तपस्या करनेवाले, सबमें वास करनेवाले, अविनाशी, पर्वतोंको धारण करनेवाले आकाशरूप, सहस्रों रूपोंमें प्रकट, जाननेयोग्य, उद्योग एवं निश्चयरूप, निर्णय एवं सिद्धान्तरूप, अन्याय न सहनेवाले, क्षमाशील, चतुर, दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले, दक्षयज्ञका अपहरण करनेवाले, उत्तम उत्सवरूप, मध्यस्थ, विरोधियोंके तेजका अपहरण करनेवाले, दक्ष-यज्ञमें देवताओंके यज्ञभागका हनन करनेवाले, प्रसन्न, पूजित, सबके उत्पादक, गम्भीर गर्जना करनेवाले, गाम्भीर्ययुक्त, गम्भीर, हविष्य पहुँचानेवाले अग्निस्वरूप, वटवृक्षरूप, बरगद या अक्षयवटरूप, नक्षत्रोंकी भाँति चमकनेवाले, समर्थ, विभु, तीखे बाणवाले, सूर्य और चन्द्ररूप नेत्रोंवाले, महादेव, कर्म और कालके ज्ञाता, यज्ञ एवं व्रतकी दीक्षा देनेवाले, भक्तोंद्वारा प्रसन्न किये जानेवाले, यज्ञस्वरूप, समुद्ररूप, समुद्रान्तर्वर्ती बडवानल नामक अग्नि, यज्ञमें आहुतिरूपसे प्राप्त हविष्यके भोक्ता, अग्निमुख, प्रसन्नात्मा, अग्निरूप, महान् तेजस्वी, उत्तम तेजस्वी, विजय, जय, ज्योतिर्मण्डलके आश्रय, सिद्धिरूप, शत्रुओंसे मेल रखनेकी नीतिरूप, अवसर देखकर शत्रुके साथ युद्ध करनेकी नीतिरूप, शिखाधारी, दण्डधारी, जटा धारण करनेवाले, लपटवाले, मूर्तिमान् जलरूप, बलहीन, बाह्यस्वरूप, बाँसका डंडा धारण करनेवाले, पापियोंको वेतालकी भाँति भय देनेवाले, कालाग्नि, कालको भी दण्ड देनेवाले, तारास्वरूप अथवा अविनाशी शरीरवाले, अभ्युदयरूप, ब्रह्मारूप, सुगन्ध वहन करनेवाले वायुरूप, सबसे ज्येष्ठ, प्रजाजनोंके रक्षक, विष्णुस्वरूप, भुजाकी भाँति सबके सहायक, यज्ञमें विशिष्ट भाग ग्रहण करनेवाले, सब ओर मुखवाले, संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले, देवसमुदायरूप, सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले, जगत्स्वरूप रजोगुणरहित, भस्म लगानेवाले, बड़े आचारवान्, विख्यात यशवाले, आदिरहित, सब प्राणियोंके आदिकारण, सबके आदिपुरुष, सबके जन्मदाता, सबके ज्ञानदाता, सर्पस्वरूप, महान् आवाससे युक्त, तुच्छ वस्तु (धतूरों)-की माला धारण करनेवाले, मस्तकपर उठती हुई गंगाकी लहरोंको जाननेवाले, तीन वेद और तीनों लोक जिनके पद अर्थात् स्थान हैं, वे भगवान् शिव त्रिनेत्रधारी, अव्यक्त, सब बन्धनोंसे मुक्त करनेवाले, ज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, असुन्दर वस्त्र धारण करनेवाले, समस्त साधनोंसे सेवित, अपने मस्तकसे गंगाजीका स्रोत बहानेवाले, विभागरहित, सदा एकरस, यज्ञविभागके ज्ञाता, सबमें सदा रहनेवाले, सर्वत्र विचरनेवाले, दुर्वासामुनिस्वरूप, भैरव, यमराजस्वरूप, शीतल, चन्द्रस्वरूप, यज्ञस्वरूप, सबका धारण-पोषण करनेवाले, विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, लाल-लाल आँखोंवाले, बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, विजयस्वरूप, विशिष्ट विद्वान्, संग्रह, विग्रह, कर्म, नागेन्द्र-हारसे विभूषित, सबमें प्रमुख, विमुक्तदेह, शरीरमें रहनेवाले प्राणस्वरूप, कर्दमरूप, सर्वाचारस्वरूप, प्रसन्नतारूप, खेचरस्वरूप, बल और रूप धारण करनेवाले, आकाशवृत्तिरूप, निपात, सर्परूप, खलरूप, रौद्ररूप, देवताओंमें सूर्यरूप, रत्नस्वरूप किरणोंसे युक्त, उत्तम तेजवाले, वायुके समान वेगवाले, महान् वेगवाले, मनके समान वेगवाले, रात्रिचारी, सर्वावास, लक्ष्मीके निवासस्थान, व्यापक, लोकेश जिनकी कलाएँ हैं वे, हर, मुनि, आत्मगति, लोक, सहस्रमुख, विभुस्वरूप, यक्षोंसे युक्त, कुबेररूप, बाज पक्षीके समान वेगवाले, प्रकाशरूप, प्रजाओंके स्वामी, मतवाले, कामदेवके तुल्य रूपवाले, अर्थ और अनर्थकी प्राप्तिमें कारण, महान् सिद्धयोगस्वरूप, भक्तोंके क्लेशोंका अपहरण