भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1051

१०२२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


मातंग, मृगवन और वाराहतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—माहिष्मतीपुरीके पश्चिम अशोकवनिका नामक एक पापहारी तीर्थ है, जो सब प्रकारके शोकोंका विनाश करनेवाला है। वहाँ स्नान करके अपने वैभवके अनुसार गौरीदेवीका पूजन करे। वहीं मातंगमुनिका आश्रम है। जो स्त्री शुक्ल और कृष्ण पक्षकी तृतीयाको गन्ध, धूप, चन्दन, नाना प्रकारके उपहार तथा दीपावली जलाने आदिके द्वारा वहाँ भक्तिपूर्वक गौरीदेवीका पूजन करती है, वह रूप और सौभाग्यसे सम्पन्न पति प्राप्त करती है।

युधिष्ठिर ! पूर्व कल्पकी बात है—मातंग नामसे प्रसिद्ध देवर्षिने नर्मदा नदीके तटपर रहकर बड़ी दुष्कर तपस्या की थी। महर्षियोंके सत्संग और नर्मदाके दर्शनसे उन्होंने पाप-बुद्धिका परित्याग करके धर्म-बुद्धिका आश्रय लिया था। 'मैं विरक्त और भिक्षु हूँ' ऐसा विचारकर वे अशोकवनिकामें गये और जटा, वल्कल धारण करके कन्द, मूल, फलका आहार करते हुए एक सहस्र दिव्य वर्षोंतक भगवान् शिवकी आराधनामें तत्पर रहे। सब मन्त्रोंमें उत्तम 'ॐ नमः शिवाय' इस षडक्षर मन्त्रका वे दिन-रात अपने हृदयमें चिन्तन करते थे। उनकी उस पराभक्तिको जानकर देवाधिदेव महादेवजीने उन्हें प्रत्यक्ष दर्शन दिया और कहा—'सुव्रत ! इस ध्यानसे तुम्हारा कल्याण हो, तुम वर माँगो।'

मातंग बोले—देवेश्वर ! यह तीर्थ मातंगके नामसे विख्यात हो। इसमें चाण्डाल, श्वपच आदि पापयोनिके जीव तथा जप आदिसे रहित पुरुष भी पापमुक्त होते रहें। जो यहाँ स्नान करके नर्मदातटवर्ती मातंगेश्वरलिंगका पूजन करे, उसका संसार-बन्धन छूट जाय।

मातंग मुनिका यह वचन सुनकर महादेवजी बोले—मुने ! मेरे प्रसादसे यह सब कुछ तुम्हारे इच्छानुसार होगा। ऐसा कहकर भगवान् शिव पर्वतश्रेष्ठ कैलासको चले गये और मातंग मुनि वरदान पाकर दिव्य विमानपर आरूढ़ हो उमा-महेश्वर-धामको चले गये। चैत्रके कृष्ण पक्षमें जो चतुर्दशी और अमावास्या तिथि आती है, उसमें वहाँ जो कुछ दान, होम आदि किया जाता है, वह अक्षय फल देनेवाला होता है। उस तीर्थमें तिल और जलद्वारा तर्पण करनेसे और गुड़-सत्तूका पिण्डदान देनेसे चौदह इन्द्रोंके स्थित कालतक पितर तृप्त रहते हैं। अशोकवनिका नामसे प्रसिद्ध स्थान मातंग-तीर्थ कहलाता है, वह नर्मदाके उत्तर तटपर विद्यमान है।

युधिष्ठिर ! अब मैं नर्मदाके दक्षिण तटपर विद्यमान मृगवन नामक तीर्थका वर्णन करूँगा। महाराज ! वहाँ एकादशीको स्नान करके शंख-चक्र-गदाधारी भगवान् विष्णुका अर्चन करे और निराहार रहकर रात बितावे। प्रातःकाल होनेपर फिर गन्ध और पुष्पोंद्वारा मृगवनमें श्रीहरिकी पूजा करे। वहाँ एक ब्राह्मणको भोजन करानेपर लाख ब्राह्मणोंको भोजन करानेका पुण्य होता है। तिल और जलकी अंजलि देनेसे पितरोंको वैष्णव पदकी प्राप्ति होती है। वहीं उत्तम वाराहतीर्थ है, जहाँ वाराहरूप धारण करके भगवान्ने इस पृथ्वीका उद्धार किया था और वहीं अमित तेजस्वी श्रीहरिने विश्वरूपको भी धारण किया था। जो पतिव्रता नारी मासोपवास व्रत करके वहाँ विधिपूर्वक स्नान करती है, वह विष्णुधामको जाती है।

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