संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1052, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२३
संसारसे मुक्त होनेके लिये पाप और पाखण्डी जनोंके त्याग तथा शिव एवं नर्मदाके आश्रय लेनेका उपदेश
मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! नर्मदातटपर उत्तम सिद्धि देनेवाला मनोरथ नामक एक तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात है। वहाँ स्नान करके मनुष्य जिस-जिस मनोरथको चाहता है, उस तीर्थके प्रभावसे वह सब कुछ प्राप्त कर लेता है। वहीं संगमपर अंगारेश्वरदेव स्थित हैं, जहाँ स्नान-मात्र करनेवाला मनुष्य गणपति-पदपर प्रतिष्ठित होता है।
पाप बड़े ही कड़वे और अत्यन्त दुःख देनेवाले होते हैं। इसलिये पाप कभी नहीं करना चाहिये। जिस देश-कालमें और जैसी आयुके द्वारा मनुष्य शुभाशुभ कर्म करता है, वह उसी प्रकार उसे भोगना पड़ता है। अतः अपनी शक्तिके अनुसार याचकको निरन्तर दान देना चाहिये। विद्वान् पुरुष शास्त्र और युक्तियोंद्वारा सदा आत्माके कल्याणका विचार करे। केवल अनुमानके ही द्वारा उसपर विचार नहीं करना चाहिये। कर्मोंके हीन और उत्तम नाना प्रकारके फल बताये गये हैं; अतः मनुष्य कोई कर्म करनेके पहले उसकी परीक्षा कर ले। जिसका श्रेष्ठ और महान् फल हो, वही पुण्यकर्म है। बुद्धिमान् पुरुषको चाहिये कि वह पाखण्डी, शास्त्रविपरीत कर्म करनेवाले, वैडालव्रती (दम्भी), शठ, युक्तिवादी, तीर्थनिन्दक, दिगम्बर तथा अन्यान्य पाखण्डी जनोंको दूरसे ही त्याग दे। नंगे, मथमुण्डे और विष्ठाभोजी अघोरी—कलियुगमें धर्मके विपरीत आचार उपस्थित करते हैं। अतः उनके चलाये हुए पाखण्डका परित्याग करके तीनों वेदोंद्वारा प्रतिपादित धर्मका आचरण करे। सब धर्मोंमें ब्रह्मा, विष्णु और शिवजीके वचन ही प्रमाण हैं। जो उनके विपरीत बर्ताव करता है वह निश्चय ही नरकमें गिरता है। पितरोंका तर्पण करे, भिखारीको भीख दे, सब प्राणियोंपर दया करे तथा नर्मदाजीकी माहात्म्य-कथाका चिन्तन करे। यही सब कर्मोंको शुद्ध करनेवाला सम्पूर्ण ज्ञान है। जो आदि, मध्य और अन्तसे रहित, स्वभावसे सबके स्वामी, सर्वज्ञ और परिपूर्ण हैं, वे भगवान् शिव शैवशास्त्रोंद्वारा जाननेयोग्य हैं। उनके द्वारा प्रतिपादित जो ज्ञान है, वह संशयरहित एवं सम्पूर्ण प्रयोजनोंकी सिद्धि करनेवाला है। जो सर्वज्ञ हैं, सम्पूर्ण हैं, स्वभावतः निर्मल तथा सम्पूर्ण दोषोंसे रहित हैं, वे कल्याणमय शिव कोई विपरीत बात कैसे कह सकते हैं?
भगवान् शिवकी आज्ञाके बिना संसारकी सृष्टि कैसे हो सकती है? यदि कहें कि प्रकृतिसे सृष्टि होती है, तो ठीक नहीं, क्योंकि वह जड है। यदि कहा जाय कि जीवात्मा ही सृष्टि करता है, तो यह भी उचित नहीं है; क्योंकि वह सर्वज्ञ नहीं, अज्ञ है। परमाणु आदि जो प्राकृत तत्त्व हैं, वे सब अचेतन हैं; अतः वे किसी बुद्धिमान् सहायकके बिना न तो स्वयं रचना कर सकते हैं, न देख ही सकते हैं। जैसे कुम्भकारके बिना मिट्टी स्वयं घड़ेके रूपमें नहीं परिणत होती, उसी प्रकार जड प्रकृति बुद्धिमान् चेतनके बिना स्वयं कुछ नहीं कर सकती। जैसे यह घोर संसार-समुद्र अनादिकालसे चला आ रहा है, उसी प्रकार इस संसारसे छुड़ानेवाले भगवान् शिव भी अनादि हैं। जैसे ओषधि स्वभावसे ही रोगोंका निवारण करनेवाली है, उसी प्रकार भगवान् शिव भी स्वभावसे ही घोर संसार-बन्धनका नाश करनेवाले माने गये हैं। जैसे वैद्यके बिना रोगी क्लेश उठाते हैं, उसी प्रकार भगवान् शिवके बिना सम्पूर्ण जगत् दुःख उठाता है। अतः अनादि, सर्वज्ञ, परिपूर्ण, परम शिव ही सबके त्राता हैं। उनके सिवा दूसरा कोई पुरुष इस संसार-समुद्रसे रक्षा करनेवाला नहीं है। जो अपने हृदयमें भगवान् शिवका चिन्तन करते हुए शिवज्ञानका अभ्यास करते हैं, उन्हें अवश्य ज्ञान होता है। नरश्रेष्ठ! ऐसा जानकर शिवस्वरूपा नर्मदादेवीका आश्रय