संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1050, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०२१
यमदूतोंद्वारा पीड़ित नहीं होता। नरकमें स्थित होनेपर भी जो नर्मदा नदी एवं भगवान् शिव और विष्णुका स्मरण करता है, उसे यमराजके दूत तत्काल त्याग देते हैं। यदि वैदूर्य पर्वत एवं अमरकण्टकपर भोग और मोक्ष फल देनेवाले परमेश्वर 'ॐकारजी' विद्यमान हैं, तो पापी मनुष्य यहाँ क्यों शोक करते हैं? वहीं सम्पूर्ण लोकोंपर अनुग्रह करनेवाले सिद्धलिंग सिद्धेश्वर, यज्ञेश्वर और शशिभूषण हैं। नर्मदाके दक्षिण भागमें महेश्वर एवं कपिलेश्वरलिंग हैं। उस स्थानको विद्वान् पुरुष शिवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य सदा पुष्प, धूप, आरती और तर्पण आदिके द्वारा भक्तिपूर्वक इन लिंगोंकी अर्चना करते हैं, वे नरकसे छूटकर शिवलोकको जाते हैं। अनघ! तुमने जो कुछ पूछा था, वह सब मैंने तुम्हें बताया। पापी पुरुषोंको यमराजने यह बताया है कि 'जो लोग गोदान, स्वर्णदान, तिलदान, अन्नदान, जलदान, सब सामग्रियोंका दान तथा महल और बगीचेका दान करते हैं, वे घोर नरकस्वरूप यमलोकमें नहीं जाते। भगवान् शिवके वचनानुसार वे सब पापोंसे मुक्त हो जाते हैं।'
सम्मानको अपमानने, प्रियजनोंके संयोगको वियोगने और जवानीको बुढ़ापेने ग्रस लिया है। सारा सुख दुःखके उपद्रवसे युक्त है। जब बाल पक जाते हैं, शरीरमें झुर्रियाँ पड़ जाती हैं, तब वृद्धावस्थामें जर्जरशरीर होकर विद्वान् मनुष्य क्या कर सकता है? स्त्री और पुरुषोंका यौवन तथा रूप, जो एक-दूसरेको बहुत ही प्रिय लगता है, जराग्रस्त हो जानेपर दोनोंके लिये अप्रिय हो जाता है। जो अपने-आपको अपूर्व शिथिलतासे युक्त देखकर भी संसारसे विरक्त नहीं होता, उससे बढ़कर मूर्ख दूसरा कौन हो सकता है? जराग्रस्त मनुष्य अशक्त होनेके कारण पत्नी-पुत्र आदि बान्धवों तथा दुराचारी सेवकोंद्वारा भी अपमानित होता है। वृद्ध मनुष्य धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष किसी भी पुरुषार्थका साधन करनेमें समर्थ नहीं होता। इसलिये बुढ़ापा आनेसे पहले ही धर्माचरण करे। युधिष्ठिर! शरीरमें वात, पित्त और कफ आदिकी विषमता होती रहती है तथा वात, पित्त, कफका समूह शरीरसे ही उत्पन्न बताया गया है। इसलिये अपना यह शरीर सदा रोगोंका ही आश्रय है, ऐसा जानना चाहिये। जब वातका प्रकोप होता है और मनुष्य ज्वरसे पीड़ित होता है, तब अनेक प्रकारसे होनेवाले रोगोंके कारण उसे बहुत दुःख सहन करने पड़ते हैं। इस शरीरमें मृत्युके साधन सौसे भी अधिक हैं। इनमेंसे एक मृत्यु तो कालरूप है और शेष मृत्युएँ आगन्तुक मानी गयी हैं। जो आगन्तुक होती हैं वे ओषधिसेवन तथा जप, होम और दान आदिसे शान्त हो जाती हैं; परंतु कालरूप मृत्यु किसी उपायसे भी शान्त नहीं होती। विष और मद्य आदिसे मनुष्यकी अपमृत्यु होती है। अतः इन सब वस्तुओंका सेवन कदापि न करे। अनेक प्रकारके रोग, कष्ट, सर्प आदि जीव, विष और मारण आदिके प्रयोग—ये सब देहधारियोंके लिये मृत्युके द्वार हैं। यदि मनुष्यका मृत्युकाल आ पहुँचा है, उस समय रोग, सर्प आदिसे पीड़ित हो तो साक्षात् धन्वन्तरि भी उसे नहीं बचा सकते। कालपीड़ित मनुष्यकी रक्षा करनेमें ओषधि, तप, दान, मित्र और बान्धव—कोई भी समर्थ नहीं हैं। मृत्युके समान कोई दुःख नहीं है, मृत्युके समान कोई शत्रु नहीं है तथा समस्त देहधारियोंके लिये मृत्युके समान दूसरा कोई काल नहीं है। युधिष्ठिर! श्रेष्ठ और सुन्दर स्त्री, पुत्र, मित्र, राज्य तथा ऐश्वर्य आदि नाना प्रकारके सम्पूर्ण सुखोंको मृत्यु सहसा छीन लेती है। राजन्! भाई-बन्धु आदिके रूपमें जो यह दुस्तर संसार है, इसका तुम्हें यत्किंचित् परिचय दिया गया है। यह सब परिणामी—नाशवान् है, कालका भोजन है। ऐसा जानकर प्रयत्नपूर्वक नर्मदाका सेवन करना चाहिये। नर्मदा सब दुःखोंका निवारण और सम्पूर्ण शोकोंका नाश करनेवाली है। जो जिन कामनाओंको पाना चाहता है, नर्मदादेवी उसे वे सभी वस्तुएँ देती हैं।
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