संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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उनके शरीरसे मांस नोच लिया जाता है। लोहेके मुद्गरोंसे मारकर उनकी हड्डियाँ चूर-चूर कर दी जाती हैं। बलोन्मत्त यमदूत उस दशामें भी उन्हें अनेक बार जल्दी-जल्दी घसीटते हैं और वे पापी जीव दीर्घकालतक नरकमें रहकर दारुण यातनाएँ भोगते हैं। उनका मुँह बालूसे भरा होता है, इसलिये वे स्वाँसतक नहीं ले पाते। इन सब यातनाओंके बाद अनेक प्रकारके यमदूत रौरव आदि नरकोंमें उन्हें पीड़ा देते हैं। महारौरवकी पीड़ाओंसे महान् धीर पुरुष भी रो देते हैं। मुख, लिंग, गुदा पार्श्व, पैर, छाती और मस्तकमें तपाये हुए लोहेके तीखे मुद्गरोंसे यमदूत मारते हैं। जो स्त्रियाँ पराये पतियोंका आलिंगन करती हैं और अपने पतिकी सेवामें नहीं रहतीं, ऐसी स्त्रियोंसे यमदूत कहते हैं—'अरी! अब तू क्यों जल्दीसे भागी जा रही है? स्मरण है या नहीं, तूने अपने पतिको धोखा दिया था और एक पापान्ध परपुरुषको सुखपूर्वक गलेसे लगाया था?' ऐसा कहकर वे उन्हें लोहकुम्भ नामक नरकमें फेंक देते हैं और धीरे-धीरे पकाते हैं। कभी उन्हें प्रज्वलित अग्निमें राँधते हैं, तप्तशिलाओंपर बिठाते हैं, अँधेरे कुएँमें डालते हैं और अजगर सर्पोंद्वारा डँसाते हैं। जो धर्मका उपदेश देनेवाले महात्मा आचार्यकी निन्दा करते हैं, शिवभक्त, ब्राह्मण तथा सनातन शिवधर्मपर दोषारोपण करते हैं, उनकी छाती, कण्ठ, जिह्वा, शरीरकी सन्धियों तथा दोनों ओठोंमें काँटी ठोंककर यमदूत उन्हें कील देते हैं।
इस प्रकार पापाचारी पुरुषोंको यमलोकमें बड़ी भयानक यातनाएँ दी जाती हैं। एक-एक नरकमें सैकड़ों और सहस्रों प्रकारकी ऐसी यातनाएँ जाननी चाहिये, जो समस्त पापकर्मियोंको प्राप्त होती हैं। सम्पूर्ण नरकोंमें ऐसी-ऐसी अनन्त पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं। अपने-अपने कर्मोंसे नरकोंमें गिराये हुए पापी जीव क्रमशः सभी नरकोंमें पकाये जाते हैं। महापातकी मनुष्य सब नरकोंमें चन्द्रमा और नक्षत्रोंकी स्थितिकालतक अनेकानेक यमदूतोंद्वारा पीड़ा भोगते रहते हैं। यही दशा पातकियोंकी भी होती है। उपपातकियोंको इनसे आधी यातना प्राप्त होती है। तात युधिष्ठिर! कब किसकी मृत्यु हो जायगी, यह ज्ञात नहीं होता और अकस्मात् यदि मृत्यु आ गयी तो कौन मनुष्य यहाँ वर्ष या दिन पा सकता है। फिर तो सब कुछ छोड़कर अकेले ही परलोककी यात्रा करनी पड़ेगी। इसलिये पूर्ण प्रयत्न करके सत्यधर्मपरायण होओ। यह सब नरकोंका लक्षण तुमसे बताया गया।
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दान, पुण्य, शिवध्यान और नर्मदासेवनसे नरकसे उद्धार होनेका तथा संसारसे वैराग्यका उपदेश
युधिष्ठिरने पूछा— मुने! किस धर्मके द्वारा इस परम दुस्तर संसार-सागरको पार किया जा सकता है?
मार्कण्डेयजी बोले— मनुष्य अनेक प्रकारके राग और लोभके वशीभूत होकर संसारमें नाना प्रकारके क्लेश उठाता है। गर्भमें पड़ जानेसे मनुष्य कहे हुए शास्त्रको नहीं समझता और स्वर्ग तथा मोक्षसाधक कर्मोंकी चर्चा नहीं सुनता। सम्पूर्ण कामनाओं और प्रयोजनोंको सिद्ध करनेवाले भगवान् शंकरके ध्यानमें वह अज्ञानवश कष्ट मानने लगता है। वास्तवमें भगवान् शिवका चिन्तन ही नरकसे छुड़ाकर अपना परम अद्भुत कल्याण करनेवाला है। जो जम्बूद्वीपमें आकर मनुष्य-योनिमें जन्म लेता है, तथापि नर्मदादेवीकी शरणमें नहीं जाता, वह भाग्यहीन है। इस संसारमें पापसे दूषित चित्तवाले मनुष्योंको उत्तम गति देनेवाली नर्मदासे बढ़कर दूसरी कौन नदी है? जो पापहारिणी महादेवी नर्मदाका ध्यान करते हैं, उनकी पापराशि नष्ट हो जाती है। जो नर्मदाका मनसे स्मरण और वाणीद्वारा कीर्तन करता है, वह परलोकमें जानेपर