संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०१९
पर्वत तथा ५ मय हैं। पचीसवीं कोटिके नायक १ यमल पर्वत, २ सूचीकूप, ३ विष्ठाकूप, ४ अन्धकूप और ५ पतन हैं। छब्बीसवीं कोटिके १ पातन, २ मुसली, ३ वृषली, ४ अशिवा तथा ५ संकटला—ये पाँच नायक हैं। सत्ताईसवीं कोटिके नायक १ तालपत्र वन, २ असिगहन, ३ महामोहक, ४ सम्मोहन तथा ५ अस्थिभंग हैं। अट्ठाईसवीं कोटिके नायक १ तप्ताचलमय, २ अगुण, ३ बहुदुःख, ४ महादुःख तथा ५ कश्मल हैं। इनके सीवा यमल, हालाहल, विरूप, श्वरूप, च्युतमानस, एकपाद, त्रिपाद और तीव्र आदि नरक हैं। इस प्रकार यहाँ नरकोंके अट्ठाईस पंचक बताये गये हैं।
पापियोंकी नरक-यातनाका वर्णन
मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! मनुष्य अपने कर्मोंके अनुसार क्रमशः एक-एक नरकका उपभोग करते हैं। अपनी कुत्सित कामनाओंके कारण जो कुकर्मोंका संग्रह किया गया है, उसीके फलस्वरूप तपायी हुई लोहेकी साँकलसे बाँधकर अँधेरेमें बड़े-बड़े वृक्षोंकी शाखाओंमें पापी मनुष्य लटका दिये जाते हैं। फिर यमदूत उन सबको बड़े जोर-जोरसे झुलाते हैं। वेगपूर्वक झुलाये हुए वे सभी पापी अचेत हो जाते हैं। फिर आकाशमें लटकते हुए उनके पैरोंमें सौ भार लोहा बाँध देते हैं। उस महान् भारसे वे सब लोग अत्यन्त सन्तप्त होते हैं और अपने-अपने कर्मोंका स्मरण करते हुए निश्चल भावसे मौन रह जाते हैं। तत्पश्चात् क्रमशः आगमें तपाकर खूब लाल किये हुए लोहेके कँटीले दण्डोंसे यमदूत उनके मस्तकपर मारते हैं। इसके बाद उन्हें विष्ठा और कीटोंसे भरे हुए कुएँमें डाल देते हैं। घोर यमदूत सब ओरसे घेरकर पापियोंको आगमें पकाते हैं। उसके बाद उनके शरीरपर नमकीन पानी डाल देते हैं। कितने ही पापियोंको लोहेके कड़ाहमें बैंगनकी तरह भूनते हैं, फिर गंदे कुएँमें डाल देते हैं। मेदा, रक्त और पीबसे भरी हुई बावलीमें भी पापियोंको फेंक दिया जाता है और वहाँ उन्हें कीड़े तथा कौए लोहेके समान तीखी चोंचोंसे नोच-नोचकर खाते हैं। कितने ही पापी मनुष्योंको तीखे त्रिशूलोंमें गुम्फित करके उन्हें धधकते हुए अंगारोंपर मांसकी भाँति पकाया जाता है। इसी प्रकार यमदूत पापियोंको खूब तपे हुए तेलसे भरे कड़ाहोंमें अनेक बार पकाते हैं। जो असत्य और अप्रिय बोलनेवाले हैं, उनकी छातीपर चढ़कर और पाँवसे दबाकर तपाये हुए मजबूत सँड़सेसे उनकी जीभ उखाड़ ली जाती है। दम्भपूर्ण झूठे शास्त्रसे प्रेरित होकर जो ब्राह्मण यज्ञके नामपर अधिक धनका संग्रह करता है, उसकी जिह्वा भी तीखे भालेसे छेदी जाती है। जो मूढ़ मानव माता-पिता और गुरुको फटकारते हैं, उनके मुँहमें बार-बार बालू भरकर पानीसे सींचा जाता है। तदनन्तर खारा और गरम जल भरा जाता है। फिर खौलते हुए तेलको उड़ेल दिया जाता है। यमदूत उन पापियोंके पैर पकड़कर कीड़ोंसे भरी हुई विष्ठापर घसीटते हैं। फिर सींगसे दबाकर उन्हें लोहेके शाल्मलि वृक्षमें बाँध दिया जाता है। उसके बाद वे महाबली भयानक दूत उन्हें पीछेकी ओरसे मारते हैं। अत्यन्त प्रबल दाँतीदार आरेसे मस्तककी ओरसे चीरते हैं। अपने भयानक कर्मोंके परिणामसे वे पापी जीव भूख लगनेपर अपना ही मांस खाते और प्यास लगनेपर अपना ही रक्त पीते हैं। जिन मूढ़ पुरुषोंने कभी अन्न और जलका दान नहीं किया है और न किसीके दानका अनुमोदन ही किया है, वे मुद्गरोंसे जर्जर करके ईखकी तरह पेरे जाते हैं। घोर असिताल वनमें खण्ड-खण्ड करके काटे जाते हैं। उनके सब अंगोंमें सूई चुभोयी जाती है। तत्पश्चात् उन्हें शूलीपर चढ़ा दिया जाता है। शूलीपर चढ़ाकर उन्हें बार-बार हिलाया और खींचा जाता है। फिर भी उनकी मृत्यु नहीं होती।