भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1059, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1059

१०३० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तीर्थमें स्नान करके मनुष्य सहस्र कपिला गौओं, सुगन्धित पदार्थों और सुवर्णोंके दानका तथा पंच-यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाकर स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है। भारत! वहीं त्रिशूल नामक तीर्थ है। वहाँ जाकर जो स्नान और देवता-पितरोंका पूजन करता है, वह देहत्यागके पश्चात् गणपति-पदको प्राप्त होता है। युधिष्ठिर! नर्मदाके उत्तर तटपर ब्रह्मह्रद नामसे विख्यात एक तीर्थ है जो इच्छानुसार भोग एवं फल देनेवाला है। यहाँपर श्राद्धका दान देनेसे पितर ब्रह्मलोकमें जाते हैं। नर्मदाके उत्तर भागमें अत्यन्त उत्तम सोमतीर्थ है। वहाँ स्नान करके मनुष्य स्वर्गलोकमें सम्मानित होता है।

o

देवपथतीर्थ, शुक्लतीर्थ, दीप्तिकेश्वरकी महिमा, देवासुरोंके द्वारा महादेवजीकी स्तुति तथा वैष्णव तीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—तदनन्तर देवपथ नामक सर्वदेवमय शुभ तीर्थ है। उसमें विधिपूर्वक स्नान करनेवाला पुरुष सब यज्ञोंका फल पाता है। वहीं देवपथ नामसे प्रसिद्ध शिवलिंग भी है, जिसका श्रद्धापूर्वक दर्शन करनेसे पितरोंकी उत्तम गति होती है। वहीं सहस्रयज्ञ नामका उत्तम तीर्थ है, जहाँ मार्गशीर्ष मासमें एकादशी तिथिको भगवान् विष्णुकी पूजा करके मनुष्य सहस्र यज्ञोंके अनुष्ठानका फल पाता है। उस तीर्थके प्रभावसे वह पापरहित हो जाता है। वह यमलोकको नहीं देखता और पशु-पक्षियोंकी योनिमें भी नहीं जाता। तदनन्तर शुक्लतीर्थमें जाय। उसमें स्नान करनेवाला मनुष्य दस गोदानका फल पाता है। शुक्लतीर्थ आठ हाथका है। वहाँ कालाग्निरुद्र तथा श्रीकण्ठदेव हैं। पूर्वकालमें इन्द्रने भी देवदेव उमापतिको नर्मदाके जलसे नहलाकर बिल्वपत्रोंद्वारा उनका पूजन किया था। शुक्लतीर्थके प्रभावसे ही देवता उद्दीप्त हो रहे हैं। वहीं कश्यपजीका देवताओं और सिद्धोंसे सेवित पुण्य आश्रम है। वहाँ दस हजार मुनि शुक्लेश्वरकी उपासना करते हैं। कुबेरने सूर्यग्रहणके अवसरपर शुक्लतीर्थमें चन्दन, अगर, कपूर, फूल-माला, चँदोवा, ध्वज तथा दीपमाला आदि उपचारोंसे महेश्वरका पूजन किया था। अतः उस तीर्थके प्रभावसे ही वे यक्षोंके राजा और धनके स्वामी हुए हैं। उसी तीर्थके प्रभावसे देवताओंने देवलोकमें नाना प्रकारके भोग प्राप्त किये हैं। वह तीर्थ सर्वतीर्थमय और सर्वदेवमय है। वहाँ स्नान और महादेवजीका पूजन करके मनुष्य सब देवताओं और दैत्योंके गणोंसे पूजित होता है।

राजन्! ययाति नामसे प्रसिद्ध एक चक्रवर्ती राजा हो गये हैं। उन्होंने बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भगवान् यज्ञपुरुषका पूजन किया है। जहाँ पुण्यसलिला मधुमती नदी नर्मदाके साथ मिली है, वहाँ उन्होंने ब्राह्मण-ऋत्विजोंके साथ यज्ञ प्रारम्भ किया था। वहीं मध्येश्वरलिंग है जहाँ साक्षात् भगवान् महेश्वर निवास करते हैं। वहाँ स्नान करनेवाले स्वर्गमें जाते हैं और जो वहाँ मरते हैं वे मुक्त हो जाते हैं। उसी स्थानपर भगवान् विष्णुने मधु और कैटभ नामक दैत्योंका वध किया था। वहाँ श्रीविष्णुदेवके पूजनसे सहस्र गोदानका फल मिलता है। उस तीर्थमें तिलोंके साथ जलदान और पिण्डदान करनेसे पितर चौदह इन्द्रोंकी स्थिति-कालतक तृप्त रहते हैं। ययातिका यज्ञ पूर्ण होनेके पश्चात् वहाँ पातालसे कालाग्निके समान कान्तिमान् एक शिवलिंग प्रकट हुआ। भारत! उस लिंगकी प्रभासे सम्पूर्ण जगत् उज्ज्वल हो गया। तब लिंगरूपधारी भगवान् वृषध्वजने राजा ययातिसे कहा—'राजन्! तुम्हारा कल्याण हो, तुम कोई वर माँगो।'

ययाति बोले—देव! आप भगवती पार्वतीके साथ यहाँ रहें और इस स्थानका कभी त्याग न करें। यहाँ किये हुए यज्ञ, दान आदि सब