संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३१
कार्य सदा अक्षय हों। तपस्या और दानसे रहित पापी मनुष्य भी यहाँ स्नान करके शुक्लतीर्थके प्रभावसे आपके लोकमें चले जायें।
महादेवजीने कहा—राजन्! तुमने जो कुछ कहा है, वह सब सत्य होगा।
तत्पश्चात् सब देवता अपने-अपने विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये। राजर्षि ययाति भी दीर्घकालतक राज्यका पालन करके अन्तमें स्वर्गलोकको गये।
मार्कण्डेयजी कहते हैं—दीप्तिकेश्वर नामसे प्रसिद्ध एक सिद्धलिंग कहा गया है, जिससे श्रेष्ठ तीनों लोकोंमें दूसरा कोई भी प्रसिद्ध नहीं है। दीप्तिकेश्वर देवका दर्शन, स्पर्श और पूजन करनेसे अनेक जन्मोंका घोर पाप क्षणभरमें नष्ट हो जाता है। जो मानव एक दिन या दो घड़ी भी उनकी पूजा करता है वह इस भयानक संसार-समुद्रमें फिर जन्म नहीं लेता।
देवताओंके स्वामी विष्णु, ब्रह्मा तथा अन्यान्य देवताओंके द्वारा विभिन्न नामोंसे उन उमावल्लभ महादेवजीकी स्तुति इस प्रकार की गयी— भगवान् शिव सदा रहनेवाले, अचल, प्रभा, प्रकाशरूप, दीप्तिमान्, श्रेष्ठ वर देनेवाले, अभीष्ट मनोरथ, पापहारी, श्वेतवर्ण, सब प्राणियोंका संहार करनेवाले, सर्वसमर्थ, संसारके कारण, वैराग्य एवं मोक्षके कारण, संयमरूप, सनातन, अटल, श्मशानवासी, भगवान्, आकाशमें विचरनेवाले, इन्द्रियोंमें व्याप्त, वन्दना करनेयोग्य, महान् कर्म करनेवाले, तपस्वी, समस्त प्राणियोंको उत्पन्न करनेवाले, मतवाले वेषमें अपने स्वरूपको छिपाये रखनेवाले, सम्पूर्ण लोकोंकी प्रजाके पालक और स्वामी, विराट्स्वरूप, विशाल शरीरवाले, समस्त लोकोंकी सृष्टि करनेवाले ब्रह्मा, समस्त प्राणियोंके परमात्मा, विविध रूपोंवाले, छोटे रूपवाले, मनन करनेवाले, सम्पूर्ण विश्वके पालक, छिपे रूपवाले, सदाप्रसन्न, संसार-बन्धनका नाश करनेवाले, प्रवृत्तिमार्गमें स्थित, महान् अंगोंवाले, समष्टिरूप, सबके सुनिश्चित आधार, सब कामनाओंसे सम्पन्न, स्वतः प्रकट होनेवाले, आदि और अन्त अर्थात् सृष्टि और संहार करनेवाले, जीवोंके आश्रय, सहस्रों नेत्रोंवाले, भयंकर नेत्रोंवाले, चन्द्रस्वरूप अथवा उमासहित, नक्षत्रोंको सिद्ध करनेवाले, चन्द्र, सूर्य, शनि, केतु, ग्रह, ग्रहपति, श्रेष्ठ, तपस्याके साक्षी, बलस्वरूप, खड़े रहनेवाले, यज्ञरूपी मृगपर बाण चलानेवाले, पापरहित, महान् तपस्वी, दीर्घकालतक तपस्या करनेवाले, सबकी उत्पत्तिके आदिकारण, दीनोंपर दया करनेवाले, सूर्यरूपसे वर्ष पूरा करनेवाले, मन्त्र, प्रमाण, परम तपःस्वरूप, योगी, योगकी महान् शक्तिसे सम्पन्न, महान् वीर्यवाले, हर, महाचेता, सर्वज्ञ, कारणसहित, संहारकारी, हरण करनेवाले, कमण्डलुधारी, धनुष धारण करनेवाले, सबके प्राणोंको अपने हाथपर रखनेवाले, प्रतापवान्, जीवात्मारूप, अपनेसे भिन्न अन्य किसी ईश्वरसे रहित, शूलधारी, खट्वांगधारी, पट्टिशधारी, पवित्र, पवित्रस्वरूप, तेजःस्वरूप, तेज प्रकट करनेवाले, आश्रयस्वरूप, मुकुट धारण करनेवाले, सुमुख, जलमें रहनेवाले, विस्तार करनेवाले, सूर्यरूप, सूर्य और चन्द्रमारूपी नेत्रवाले, सुन्दर तीर्थरूप, अपनी ओर आकृष्ट करनेवाले, शृगालेश्वररूपसे प्रकट, सर्वप्रयोजनरूप, सूँड धारण करनेवाले गणेशरूप, निर्मल, जलके आधारभूत कमण्डलुकी भाँति सम्पूर्ण संसारके आश्रय, अजन्मा, सुगन्धित माला धारण करनेवाले, हरिणरूपधारी, कपाल धारण करनेवाले, जिनके वीर्यकी गति ऊपरकी ओर है ऐसे, ऊपरके लोकोंके साक्षी, ऊँची उठी हुई भुजाओंवाले, नभ, अष्टमूर्तियोंमेंसे आकाशरूप, तीन जटा धारण करनेवाले, सब जीवोंके आवासस्थान, रुद्र, कार्तिकेयरूपसे देवताओंके सेनानायक, सर्वव्यापक, दिनमें चलने-फिरनेवाले, रातमें विचरनेवाले, जिनके श्रीअंगोंसे उत्तम सुगन्ध निकल रही है ऐसे, सम्पूर्ण दिशाओंके स्वामी राजाओंको मारनेवाले परशुरामरूप, त्रिपुरासुर-अन्धकासुर आदि दैत्योंको मारनेवाले, धारण-पोषण करनेवाले, रूपगुणस्वरूप, सिंह और