संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
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शार्दूलरूपसे प्रकट—व्याघ्रेश्वर, गजासुरका गीला चमड़ा धारण करनेवाले, पीड़ा हरनेवाले, समयसे योगसाधनामें तत्पर, महानादस्वरूप, सबके निवासस्थान, चारों ओर जानेवाले मार्गस्वरूप, दुर्धर्ष प्रेतोंमें विचरनेवाले, समस्त प्राणियोंमें रहनेवाले, महान् ईश्वर, अनेक रूपोंमें प्रकट, बहुत धनवाले, समस्त पुरुषार्थस्वरूप, उत्तम गतिस्वरूप, ताण्डव-नृत्यको पसंद करनेवाले, ताण्डव-नृत्य करनेवाले, नाचनेवाले, मेघस्वरूप, भयंकर, बड़ी भारी तपस्या करनेवाले, सबमें वास करनेवाले, अविनाशी, पर्वतोंको धारण करनेवाले आकाशरूप, सहस्रों रूपोंमें प्रकट, जाननेयोग्य, उद्योग एवं निश्चयरूप, निर्णय एवं सिद्धान्तरूप, अन्याय न सहनेवाले, क्षमाशील, चतुर, दक्ष-यज्ञका विध्वंस करनेवाले, दक्षयज्ञका अपहरण करनेवाले, उत्तम उत्सवरूप, मध्यस्थ, विरोधियोंके तेजका अपहरण करनेवाले, दक्ष-यज्ञमें देवताओंके यज्ञभागका हनन करनेवाले, प्रसन्न, पूजित, सबके उत्पादक, गम्भीर गर्जना करनेवाले, गाम्भीर्ययुक्त, गम्भीर, हविष्य पहुँचानेवाले अग्निस्वरूप, वटवृक्षरूप, बरगद या अक्षयवटरूप, नक्षत्रोंकी भाँति चमकनेवाले, समर्थ, विभु, तीखे बाणवाले, सूर्य और चन्द्ररूप नेत्रोंवाले, महादेव, कर्म और कालके ज्ञाता, यज्ञ एवं व्रतकी दीक्षा देनेवाले, भक्तोंद्वारा प्रसन्न किये जानेवाले, यज्ञस्वरूप, समुद्ररूप, समुद्रान्तर्वर्ती बडवानल नामक अग्नि, यज्ञमें आहुतिरूपसे प्राप्त हविष्यके भोक्ता, अग्निमुख, प्रसन्नात्मा, अग्निरूप, महान् तेजस्वी, उत्तम तेजस्वी, विजय, जय, ज्योतिर्मण्डलके आश्रय, सिद्धिरूप, शत्रुओंसे मेल रखनेकी नीतिरूप, अवसर देखकर शत्रुके साथ युद्ध करनेकी नीतिरूप, शिखाधारी, दण्डधारी, जटा धारण करनेवाले, लपटवाले, मूर्तिमान् जलरूप, बलहीन, बाह्यस्वरूप, बाँसका डंडा धारण करनेवाले, पापियोंको वेतालकी भाँति भय देनेवाले, कालाग्नि, कालको भी दण्ड देनेवाले, तारास्वरूप अथवा अविनाशी शरीरवाले, अभ्युदयरूप, ब्रह्मारूप, सुगन्ध वहन करनेवाले वायुरूप, सबसे ज्येष्ठ, प्रजाजनोंके रक्षक, विष्णुस्वरूप, भुजाकी भाँति सबके सहायक, यज्ञमें विशिष्ट भाग ग्रहण करनेवाले, सब ओर मुखवाले, संसार-बन्धनसे मुक्त करनेवाले, देवसमुदायरूप, सुवर्णमय कवच धारण करनेवाले, जगत्स्वरूप रजोगुणरहित, भस्म लगानेवाले, बड़े आचारवान्, विख्यात यशवाले, आदिरहित, सब प्राणियोंके आदिकारण, सबके आदिपुरुष, सबके जन्मदाता, सबके ज्ञानदाता, सर्पस्वरूप, महान् आवाससे युक्त, तुच्छ वस्तु (धतूरों)-की माला धारण करनेवाले, मस्तकपर उठती हुई गंगाकी लहरोंको जाननेवाले, तीन वेद और तीनों लोक जिनके पद अर्थात् स्थान हैं, वे भगवान् शिव त्रिनेत्रधारी, अव्यक्त, सब बन्धनोंसे मुक्त करनेवाले, ज्ञानसे प्रसन्न होनेवाले, असुन्दर वस्त्र धारण करनेवाले, समस्त साधनोंसे सेवित, अपने मस्तकसे गंगाजीका स्रोत बहानेवाले, विभागरहित, सदा एकरस, यज्ञविभागके ज्ञाता, सबमें सदा रहनेवाले, सर्वत्र विचरनेवाले, दुर्वासामुनिस्वरूप, भैरव, यमराजस्वरूप, शीतल, चन्द्रस्वरूप, यज्ञस्वरूप, सबका धारण-पोषण करनेवाले, विद्वानोंमें सर्वश्रेष्ठ, लाल-लाल आँखोंवाले, बड़े-बड़े नेत्रोंवाले, विजयस्वरूप, विशिष्ट विद्वान्, संग्रह, विग्रह, कर्म, नागेन्द्र-हारसे विभूषित, सबमें प्रमुख, विमुक्तदेह, शरीरमें रहनेवाले प्राणस्वरूप, कर्दमरूप, सर्वाचारस्वरूप, प्रसन्नतारूप, खेचरस्वरूप, बल और रूप धारण करनेवाले, आकाशवृत्तिरूप, निपात, सर्परूप, खलरूप, रौद्ररूप, देवताओंमें सूर्यरूप, रत्नस्वरूप किरणोंसे युक्त, उत्तम तेजवाले, वायुके समान वेगवाले, महान् वेगवाले, मनके समान वेगवाले, रात्रिचारी, सर्वावास, लक्ष्मीके निवासस्थान, व्यापक, लोकेश जिनकी कलाएँ हैं वे, हर, मुनि, आत्मगति, लोक, सहस्रमुख, विभुस्वरूप, यक्षोंसे युक्त, कुबेररूप, बाज पक्षीके समान वेगवाले, प्रकाशरूप, प्रजाओंके स्वामी, मतवाले, कामदेवके तुल्य रूपवाले, अर्थ और अनर्थकी प्राप्तिमें कारण, महान् सिद्धयोगस्वरूप, भक्तोंके क्लेशोंका अपहरण