संक्षिप्त स्कन्द पुराण
Skanda Purana
महर्षि वेदव्यास द्वारा
पृष्ठ 1062, कुल 1406 में से
संदर्भ में पढ़ें- आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * / १०३३
करनेवाले, सिद्ध, सर्वार्थसाधक, भिक्षु, भिक्षुरूप, छः प्रकारके ऐश्वर्योंके स्वामी, कोमल चमड़ीवाले, विशाल सेनावाले कार्तिकेयरूप, विशाख—स्कन्द, जिनका भाग लाठीमें बाँधा जाता है वे, गौओंके पालक, हाथमें वज्र धारण करनेवाले, रोकनेवाले, विशेष रूपसे स्थित, स्तब्ध करनेवाले, नक्षत्ररूप, शत्रुको भी सहारा देनेवाले, काल, वसन्तरूप, महुआके समान नेत्रोंवाले, बृहस्पतीरूप, अन्न ही जिनकी सेना है ऐसे, निष्ठावान् आश्रमसूचक, ब्रह्मचारी, लोकचारी, सर्वचारी, उत्तम रत्नोंके ज्ञाता, ईशान, ईश्वर, काल, निशाचारी, एकमात्र सबके धारण करनेवाले, अमित प्रमाणातीत, नदों और नदियोंको उत्पन्न करनेवाले, अव्यय, नन्दीश्वर, सुनन्दी, नन्दन, नन्दवर्धन, नागहारी, विहारी, काल, ब्रह्मवेत्ताओंमें सर्वश्रेष्ठ, चतुर्मुख, महालिंग, चतुर्लिंग, लिंगाध्यक्ष, सुराध्यक्ष, कालाध्यक्ष, युगोंको धारण करनेवाले, उमापति, उमाकान्त, गंगाधर, वर, सर्वार्थ, सब प्राणियोंका अर्थ सिद्ध करनेवाले, नित्य, सब व्रतोंके पालक तथा शुचि (पवित्र) हैं। नाथ! ब्रह्मा आदि देवताओं और महर्षियोंको भी जिनका ज्ञान नहीं होता, उन्हीं आप परात्पर परमात्माकी स्तुति कैसे की जा सकती है?
मार्कण्डेयजी कहते हैं—इस स्तोत्रको सुनकर श्रीमान् द्वीपेश्वर शिव प्रसन्नतापूर्वक मुसकराते हुए बोले—‘देवताओ! तुमलोग वर माँगो।’
देवता बोले—महेश्वर! आप दैत्योंके विनाश और हमारी रक्षाके लिये उद्यत रहें। जो पापपरायण अधम मनुष्य भी यहाँके पाँच लिंगोंका अर्चन करे उसे वह उत्तम गति प्राप्त हो, जो बड़े-बड़े यज्ञोंद्वारा भी दुर्लभ है।
पूर्वकालमें उसी तीर्थमें इन्द्रने देव-दानववन्दित देवाधिदेव उमापतिकी सहस्र नामोंद्वारा स्तवन किया था। इससे भगवान् शंकरका प्रसाद प्राप्त करके वे देवराजके पदपर प्रतिष्ठित हुए। इसी प्रकार कुबेरने लक्षेश्वर देवका स्तवन किया था। युधिष्ठिर! उस तीर्थमें जो मोक्षदा नामवाली देवी हैं, उन्हींको पार्वती जानो। मोक्षेश्वर सिद्धलिंग है, वहाँ देवता और असुर भी मस्तक नवाते हैं।
तदनन्तर परम उत्तम वैष्णवतीर्थको जाय। वह तीर्थ कोकिला नामसे विख्यात है और सब पापोंका नाश करनेवाला है। देवाधिदेव भगवान् जनार्दन उसे वैष्णवक्षेत्र कहते हैं। जो मनुष्य वहाँ परम पवित्र एकादशी व्रत करके दीपमालाको जगाता है, उसकी इस दुःखद मर्त्यलोकमें पुनः आवृत्ति नहीं होती। वहाँपर श्राद्ध आदि करनेसे पितरोंको अनन्त कालतक तृप्ति बनी रहती है। इसी तीर्थमें किये हुए पुण्यसे ध्रुव नक्षत्रोंके तेजसे परम उज्ज्वल होकर ध्रुवपदको प्राप्त हुए हैं। नर्मदा सर्वतीर्थमयी है, महादेवजी भी सर्वदेवमय हैं, बुद्धि सर्वधर्ममयी है तथा तपस्या क्षमा और सत्यमय है। पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करना ब्रह्मचर्य है और यह ब्रह्मचर्य ही तपस्याका मूल है। क्षमा, सत्य, जप, स्वाध्याय और तप—इन्हींका नाम संयम है। राजन्! जो मनुष्य प्रातःकाल उठकर द्वीपेश्वर, कपिलेश्वर और नरकेश्वर—इन सबका नाम लेता है, वह सब तीर्थोंका फल पाकर शिवलोकमें प्रतिष्ठित होता है।
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नर्मदाजीकी तथा भगवान् विष्णुकी स्तुति
मार्कण्डेयजी कहते हैं—पूर्वकालमें जब नर्मदा इस लोकमें आ रही थीं, उस समय देवताओं और ब्रह्मर्षियोंने उन्हें नमस्कार करके उनका स्तवन किया—‘देवि! आपने चराचर प्राणियोंसहित मर्त्यलोकको पवित्र एवं पुण्यमय कर दिया है। जलके रूपमें प्राप्त हुई नर्मदाजी महादेवजीकी उत्तम कला हैं। आप ही उमा, कात्यायनी, गंगा, यमुना, सरस्वती, चामुण्डा, चर्चिकादेवी तथा रेवा हैं। देवि! आपका प्रादुर्भाव भगवान् शंकरसे हुआ है। आप पुण्यमय प्रवाहस्वरूपा हैं। मेकल नामक