भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1063

१०३४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


पर्वतसे प्रकट होनेके कारण आपको उसकी कन्या कहते हैं। सबने आपका स्तवन किया है। आपके तट यज्ञयूपसे सुशोभित हैं। आप समस्त तीर्थोंकी मुकुटमणि हैं और स्वर्ग तथा मोक्ष प्रदान करनेवाली हैं। आप ही सम्पूर्ण प्राणियोंको तारनेवाली और उनके पापोंका नाश करनेवाली हैं। लक्ष्मी, स्वाहा, स्वधा और यशस्विनी पुरुहूता भी आप ही हैं। सुव्रते! आपने जलरूपसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त कर रखा है। आपके संगम और सिद्धलिंगको देवता तथा असुर भी नमस्कार करते हैं।

युधिष्ठिरने पूछा—मुनिश्रेष्ठ ! जिस मनुष्यके कर्मरूप बन्धन नहीं टूटे हैं, उसे किस प्रकार परमपदकी प्राप्ति हो सकती है ?

मार्कण्डेयजी बोले—राजन् ! पूर्वकालमें भगवान् विष्णुने महात्मा ब्रह्माजीको परमपद-प्राप्तिका उपाय बताया था। वह उपाय है—भगवान् विष्णुका स्तवन, जो इस प्रकार है—

'मैं कमलके समान नेत्रोंवाले पापहारी हरि श्रीनारायणदेवकी शरण लेता हूँ। जो सम्पूर्ण लोकोंके रक्षक, सहस्रों नेत्रोंसे विभूषित, अविनाशी एवं परम पदस्वरूप हैं तथा भूत, भविष्य और वर्तमानके स्वामी हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो सब भूतोंकी सृष्टि करनेवाले तथा अनन्त बल-पराक्रमसे सम्पन्न हैं, जिनकी नाभिसे कमल प्रकट हुआ है, जो इन्द्रियोंके स्वामी, सत्यस्वरूप तथा विकाररहित हैं, उन श्रीविष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो हिरण्यगर्भस्वरूप, पृथ्वीको अपने गर्भमें रखनेवाले, अमृत (अविनाशी), सब ओर मुखवाले, नाशहीन तथा अपने सिवा किसी अन्य स्वामीसे रहित हैं, उन सूर्यके सदृश कान्तिमान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो द्युतिमान् देव, वैकुण्ठधामके अधिपति, सूक्ष्म, अचल, वरेण्य और अभयदाता हैं, उन भगवान् गरुड़वाहनकी मैं शरण लेता हूँ। जिन्हें नारायण और हरि कहा गया है, जो योगात्मा, सनातन पुरुष तथा सब लोकोंको शरण देनेवाले हैं, उन अविनाशी ईश्वरकी मैं शरण लेता हूँ। जो सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं, जिनसे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त हो रहा है तथा जो संहारकारी देवता हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। पूर्वकालमें जिनसे कमलयोनि प्रजापति ब्रह्माजीका प्रादुर्भाव हुआ है, वे पितामह ब्रह्मासे भी परे विराजमान भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। प्राचीन कालमें जब महाप्रलय हो गया था, सम्पूर्ण चराचर जगत् नष्ट हो चुका था, उस समय जो योगस्वरूप परमात्मा अकेले ही शेष थे, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो पृथुरूपसे इस पृथ्वीको जीत लेते हैं, अथवा वाराहरूप धारण करके पृथ्वीको अपने अधिकारमें करते हैं, जो सत्य, काल, धर्म, क्रिया, फल और गुणस्वरूप हैं, सत्पुरुषोंकी वाणीरूप वे भगवान् वासुदेव मुझपर प्रसन्न हों।'

'योगावास ! आपको नमस्कार है। सबके आवासस्थान ! वरदायक ! यज्ञभोगी और पंचभोगी नारायण ! आपको नमस्कार है। वासुदेव, संकर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध—इन चार रूपोंवाले जगद्धाम ! लक्ष्मीनिवास ! वरप्रद ! विश्वावास ! साक्षीभूत ! जगत्पते ! आपको नमस्कार है। ज्ञानसागर ! आप अजेय हैं। छः प्रकारकी ऊर्मियोंसे जिसका विभाग किया जाता है, वह सम्पूर्ण विश्व एकमात्र आपका ही स्वरूप है। आप वृषाकपि (शिव और विष्णु), मृगाधिप (नृसिंह) और काल हैं, आपको नमस्कार है। अव्यक्त प्रकृतिसे इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्डकी उत्पत्ति हुई है और प्रभु श्रीविष्णु अव्यक्तसे परे हैं। जिनसे परे कोई वस्तु नहीं है, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। ब्रह्मा और शिव आदि जिन शक्तिशाली श्रीहरिका नित्य चिन्तन करते हैं, जो व्यापक परमात्मा अपने एक अंशसे सम्पूर्ण जगत्‌को व्याप्त करके स्थित हैं, जिनका किसी भी इन्द्रियसे ग्रहण नहीं होता, जो निर्गुण होकर भी सम्पूर्ण जगत्‌के शासक हैं, उन श्रीहरिकी मैं शरण लेता हूँ। जो सूर्यनाड़ी पिंगला और चन्द्रनाड़ी इडाके मध्यभाग—सुषुम्णामें ज्योतिर्मय स्वरूपसे विराजमान हैं, जिन्हें क्षेत्रज्ञ कहते हैं, वे महात्मा श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। जो कोई सिद्ध और महर्षि