भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

पृष्ठ 1064, कुल 1406 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 1064

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३५


ज्ञानयोगके द्वारा जिनके तत्त्वको जानकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो जाते हैं, वे महात्मा मुझपर प्रसन्न हों। सब ओरसे कल्याणमय परमेश्वर! आपको नमस्कार है। आपके नेत्र, सिर और मुख सब ओर हैं। निर्विकार! आदिकल्प! हृदयस्थित परमेश्वर! आपको नमस्कार है। इन्द्रियातीत! आपको नमस्कार है। परमात्मन्! आपको नमस्कार है। जो राग-द्वेषसे मुक्त और लोभ-मोह आदिसे रहित पुरुष आपको जानते हैं, वे संसारमें आसक्त नहीं होते। आप शरीरसे रहित और अव्यक्त होते हुए भी सम्पूर्ण शरीरोंमें तदाकार हुए-से रहते हैं। अव्यक्त प्रकृति, बुद्धि, अहंकार, पंचमहाभूत और इन्द्रियाँ—ये सब आपमें स्थित हैं, आप उनमें नहीं हैं। वे आपके आश्रयके बिना स्वयं नहीं टिक सकतीं। आप अव्यक्त पुरुष हैं, अति कूटस्थ हैं, गुणोंके स्वामी और ईश्वर हैं, हेतुरहित आवर्त, प्रभु तथा अपने-आपमें स्थित हैं। पुण्डरीकाक्ष! आपको नमस्कार है। वासुदेव! आपको नमस्कार है। जगन्नाथ! आप ईश्वर हैं; इससे परे और क्या कहा जा सकता है। आप भक्तोंको मुक्ति देनेवाले, गुरु और देवताओंके स्वामी हैं। समस्त प्राणियोंका पालन करनेवाले वे ही आप श्रीहरि जन्म-जन्ममें मेरे स्वामी हों। मैं अहंकार तथा सत्त्व आदि तीनों गुणोंसे बँधा हूँ। मेरी नासिका अपने कारणभूत पृथ्वीतत्त्वमें मिल जाय, मेरी जिह्वा जलतत्त्वमें विलीन हो जाय, मेरे नेत्र तेजस्-तत्त्वमें समा जायँ, स्पर्शेन्द्रिय वायुमें विलीन हो जाय, श्रोत्रेन्द्रिय आकाशमें लीन हो जाय, मन अपने कारणतत्त्व अहंकारमें लीन हो जाय और मेरा अहंकार मेरी बुद्धिमें प्रवेश कर जाय तथा मेरी बुद्धि आपमें तल्लीन हो जाय। समस्त इन्द्रियों, शब्दादि विषयों और पंचभूतोंसे मेरा वियोग हो जाय। मेरे सत्त्व, रज और तम—ये तीनों गुण अपनी आश्रयभूता प्रकृतिमें समा जायें। मैं तो प्रभुओंके भी प्रभु, दोषरहित श्रीहरिकी शरण लेता हूँ। जिनके सहस्रों मस्तक हैं, जो महान् ऋषि तथा सम्पूर्ण भूतोंको उत्पन्न करनेवाले हैं, उन भगवान् विष्णुकी मैं शरण लेता हूँ। जो ब्रह्मस्वरूप और सम्पूर्ण विश्वके उत्पत्तिस्थान हैं, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। महाप्रलयकालमें जब स्थावर-जंगम नष्ट हो जाते हैं और सम्पूर्ण भूत ब्रह्मपत्नी—मायामें विलीन हो जाते हैं और महत्तत्त्व प्रकृतिमें लीन हो जाता है तथा वह प्रकृति जिनके आश्रित रहती है और वैदिक मन्त्रोंद्वारा जिनके लिये आहुति दी जाती है, वे श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। अग्नि, चन्द्रमा, सूर्य, देवता, ब्रह्म, रुद्र, इन्द्र तथा योगियोंके तेजोंको जो सदा बढ़ाते हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! आप अजन्मा हैं, जगत्के लिये वास्तविक मार्ग आप ही हैं। आपकी कोई मूर्ति नहीं है तो भी विश्वकी सब मूर्तियोंपर आपका अधिकार है। आप नित्य नूतन हैं। प्रकृति, महत्तत्त्व और चेतन पुरुष रूपसे आप ही सुशोभित होते हैं। जो आत्मरूपसे अगोप्य (अपरोक्ष अनुभवके योग्य) और सबसे श्रेष्ठ हैं, उन श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। चन्द्रमा और सूर्यके सदृश जो अपने तेजको स्वयं ही इस धराधामपर उतारते हैं, जिनसे सम्पूर्ण दिशाएँ प्रकट हुई हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। जो सगुण, निर्गुण, चेतन, अचेतन, स्थूल, सूक्ष्म, सर्वगत और देहरहित हैं, वे महात्मा श्रीविष्णु मुझपर प्रसन्न हों। सूर्यके समीपमें चन्द्रमाकी स्थिति है अर्थात् पिंगला नाड़ीके निकट जो इड़ा नाड़ी है—इन दोनोंके मध्यभाग अर्थात् सुषुम्णा नाड़ीमें जिनका चिन्तन किया जाता है, जो वहाँ अविचल, तेजोमय स्वरूपसे प्रकाशित होते हैं, वे महात्मा श्रीहरि मुझपर प्रसन्न हों। प्रभो! जो नानात्वमें भी आपके एकत्वका दर्शन करते हैं, वे परमगतिको प्राप्त होते हैं। जो सब प्राणियोंमें सम, शत्रु, मित्र और उदासीन जनोंको प्रिय हैं, सबको समभावसे ग्रहण करते हैं, किसीसे कोई इच्छा नहीं रखते तथापि अपने भक्तोंको विशेषरूपसे अपनाते हैं, जो सब प्रकारसे जाननेयोग्य हैं, वे भगवान् विष्णु मुझपर प्रसन्न हों। यह समस्त चराचर जगत् और अण्डज, पिण्डज, स्वेदज, उद्भिज्ज—इन चार भेदोंवाला