भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

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पृष्ठ 1065
१०३६* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

प्राणिसमुदाय आपमें उसी प्रकार गूँथा हुआ है, जैसे डोरेमें मनके पिरोये होते हैं। आपके लिये धर्म और अधर्म नहीं है, आपका गर्भवास और जन्म भी नहीं होता। मैं जरा-जन्म और मृत्युके संकटोंसे मुक्ति पानेके लिये आप श्रीहरिकी शरणमें आया हूँ। श्रोत्र आदि इन्द्रियाँ, शब्द आदि विषय तथा श्वास-प्रश्वास आदि चेष्टाएँ सभी योनियोंमें सुलभ हैं। यह शरीर काष्ठकी भाँति एक दिन नष्ट हो जानेवाला है। आत्माके लिये तो यह बड़ी भारी विपत्तिरूप है। अपने-आपका अकेला होना तो स्वयंसिद्ध है। केवल शरीरके जन्मसे ही इसमें पुनर्जन्मकी प्रतीति होती है। भगवन्! मैं अपने मन, बुद्धि और प्राणोंको आपमें ही लगाकर, आपके भजनमें तत्पर और आपकी ही शरण प्राप्त होकर मृत्युकालमें भी आपका ही स्मरण करूँगा। प्रभो! मेरे द्वारा पूर्वजन्ममें जो अशुभ कर्म किये गये हों वे वातादिजनित रोगोंके रूपमें मेरे शरीरमें प्रवेश करें, जिससे उन सबका ऋण उतर जाय।'

अन्यान्य यशस्वी पुरुषोंके लिये भी कल्याणका सबसे श्रेष्ठ उपाय यही है कि वे इस स्तोत्रका पाठ करें। यह सब पापोंकी शुद्धि करनेवाला, पुण्यस्वरूप तथा परमपदरूप है। सदा प्रातःकाल, मध्याह्नकाल और सायंकालमें उठकर सब पापोंकी शान्ति करनेवाले इस जपनीय स्तोत्रका निरन्तर जप करना चाहिये—'मैं हरि, कृष्ण, हृषीकेश, वासुदेव, जनार्दन तथा जगन्नाथको प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंका निवारण करें। शंख, चक्र तथा शार्ङ्गधनुष धारण करनेवाले, मधुसूदन, लक्ष्मीपति श्रीविष्णुको प्रणाम करता हूँ। वे मेरे पापोंका नाश करें। जो जगत्‌का पालन करनेके लिये उद्यत रहनेवाले हैं, यशोदा माताके द्वारा कटिमें रस्सीसे बँधनेके कारण जो दामोदर नाम धारण करते हैं, सदा प्रसन्न रहते हैं तथा कमलके समान जिनके नेत्र हैं, उन अविनाशी विष्णुको मैं प्रणाम करता हूँ—वे मेरे पापोंका नाश करें। जो सब भूतोंके ईश्वर, अक्षर और अनिर्देश्य हैं और इसी रूपमें महात्मा पुरुष जिनका सदैव ध्यान करते हैं, उन भगवान् वासुदेवकी मैं शरणमें आया हूँ। सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हुआ पुरुष जिनमें प्रवेश करके पुनर्जन्मको नहीं प्राप्त होता, उन श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। जो ब्रह्माजीका शरीर धारण करके देवता, असुर और मनुष्यसहित सम्पूर्ण जगत्‌की बार-बार सृष्टि करते हैं, उन भगवान् श्रीहरिकी मैं शरणमें आया हूँ। सम्पूर्ण जगत्‌की योनिरूप जो भगवान् जनार्दन ब्रह्माजीका शरीर धारण करके सदा सृष्टिकर्ममें संलग्न रहते हैं, उनको मैं प्रणाम करता हूँ। जिनसे परे दूसरी कोई वस्तु नहीं है, जिनमें यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है, जो सबके भीतर अन्तर्यामीरूपसे विराजमान एवं अनन्त हैं, उन सर्वव्यापी श्रीहरिको मैं प्रणाम करता हूँ। जो सम्पूर्ण चराचर भूतोंमें व्याप्त हैं, वे श्रीविष्णु ही मेरे समस्त पापोंका नाश करें। मेरे द्वारा जो निवृत्तिप्रधान कर्म अथवा भगवान् विष्णुकी प्रसन्नताके लिये कर्म किया गया है, उससे मेरे अनेक जन्मोंके कर्मोंद्वारा संचित पाप अभी नष्ट हो जायँ। रात्रि, प्रातःकाल, मध्याह्न तथा अपराह्नकालमें अज्ञानवश मन, वाणी और क्रियाद्वारा जो कोई अशुभ कर्म किया गया हो, वह अभी क्षणभरमें नष्ट हो जाय। जैसे पानीमें नमक घुल-मिल जाता है, उसी प्रकार वह पापराशि भी विलीन हो जाय। दूसरोंको पीड़ा देना और परायीं निन्दा करना आदि दोष जो मैंने जन्मभर किये हैं, उनसे तथा दूसरोंके धन, खेत आदिके प्रति लोभ होनेके कारण क्रोध होनेसे जो मेरे द्वारा पापराशिका संग्रह किया गया है, वह पानीमें पिघलनेवाले नमककी भाँति विलीन हो जाय। विष्णु, वासुदेव, हरि, केशव, जनार्दन तथा श्रीकृष्णको नमस्कार है, बार-बार नमस्कार है।'

युधिष्ठिर! इस स्तोत्रको ब्रह्माजीसे अंगिराने और अंगिरासे इन्द्रने प्राप्त किया। इधर, वसिष्ठजीने इस स्तोत्रको राजाओंमें श्रेष्ठ नाभागको सुनाया था। प्रजापालक राजर्षि नाभागने अतुल प्रभावशाली