भारतकोश
संक्षिप्त स्कन्द पुराण

संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

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पृष्ठ 1066

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३७


इस विष्णुस्तोत्रका सदैव पाठ किया। तत्पश्चात् नर्मदाके जलमें स्नान और अनेक प्रकारके दान करके राजा नाभाग अपनी पुरीको गये।

जो इस स्तोत्रद्वारा भगवान् जनार्दनकी स्तुति करता है, उसका इस घोर संसार-सागरमें पुनरागमन नहीं होता।


मेघनादतीर्थका प्राकट्य और उसकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है। पुलस्त्यपौत्र त्रिलोकविजयी रावण देवताओंके लिये कण्टक हो गया था। वह वरदान पाकर देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस सबके लिये अवध्य हो गया था और पृथ्वीपर सब ओर इच्छानुसार विचरण करता था। उन दिनों परम सुन्दर देवगिरिपर मय नामसे विख्यात एक बलोन्मत्त दानव रहता था। रावण वहाँ मयको उपस्थित जान उसके समीप जाकर विनीतभावसे खड़ा हो गया। मयने दान और सम्मानपूर्वक रावणका स्वागत-सत्कार किया। तब रावणने मयसे पूछा—'प्रभो! यह किसकी कन्या है, इसका नाम क्या है और यह किसलिये उग्र तपस्या कर रही है?'

मय बोला—राक्षसराज! मैं दानवोंका राजा मय हूँ, मेरी पत्नीका नाम तेजवती है। यह सुन्दरी कन्या भी मेरी ही है। इसका नाम मन्दोदरी है। यह पतिके लिये तपस्या कर रही है।

मयका यह वचन सुनकर मदोन्मत्त रावण मयसे विनीत होकर बोला—महाभाग! मैं देवताओं और दानवोंका दर्प दलन करनेवाला पुलस्त्यपौत्र राजा रावण हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी कन्या मुझे दे दें। उसे पितामह ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न जान महात्मा मयने भी विधि-विधानसे उसके साथ अपनी पुत्रीका ब्याह कर दिया। मन्दोदरीको लेकर दुरात्माद्वारा पूजित राक्षस दिव्य विमानोंपर बैठकर उसके साथ क्रीड़ा करने लगा। कुछ कालमें पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ रावणने एक पुत्रको जन्म दिया। उस पुत्रने जन्म लेते ही संवर्तक मेघके समान बड़ी भारी गर्जना की, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम मेघनाद रख दिया। मेघनादने बड़े होनेपर उत्तम व्रतका आश्रय लिया और उमासहित देवेश्वर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ की। वह विधिपूर्वक व्रत, नियम, दान, होम, जप एवं दिव्य कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंद्वारा अपने शरीरको कष्ट देने लगा। एक दिन मेघनाद कैलास पर्वतपर गया और वहाँसे एक शिवलिंग लेकर दक्षिण दिशाकी ओर लौट पड़ा। नर्मदाके किनारे पहुँचनेपर उसने उस लिंगको एक स्थानपर रख दिया और स्नान करके महादेवजीका पूजन किया। फिर अपना जप पूरा करके जब वह लंकामें जानेको उद्यत हुआ तब उसने वहाँ पड़े हुए एक अन्य शिवलिंगको बायें हाथसे उठाया। इस प्रकार जब वह पहलेवाले और दूसरे शिवलिंगको भी भक्तिपूर्वक ले जाने लगा, तब महादेवजीका वह महालिंग नर्मदाके जलमें गिर पड़ा और दूसरा भी नर्मदाके उत्तर तटपर गिर गया। जो नर्मदाके उत्तर तटपर गिरा, वह शोभायमान लिंग वहाँ मेघनादेश्वरके नामसे विख्यात हुआ और जो जलके भीतर गिर पड़ा, उसका नाम मध्यमेश्वर हुआ। मेघनाद उस लिंगको उठाना चाहता था, पर सफल न हुआ। उन दोनों विग्रहोंका अभिप्राय जानकर वह राक्षस आकाशमार्गसे लौट गया। तभीसे वह तीर्थ मेघनाद तथा मेघारव नामसे विख्यात हुआ। उत्तर तटपर खेटक नामक उत्तम तीर्थ हुआ। उसके पूर्वभागमें सब पापोंका नाश करनेवाला गर्जन नामक तीर्थ है। राजेन्द्र! जो उस तीर्थमें स्नान और एक दिन-रातका उपवास करता है, वह सनातन कल्याणका भागी होता है। जो उस तीर्थमें पिण्डदान करता है, उससे देवलोकमें पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। जो वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह योगीजनॉंको मिलनेवाले उत्तम फलको पाता है।