भारतकोश
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संक्षिप्त स्कन्द पुराण

Skanda Purana

महर्षि वेदव्यास द्वारा

DevanagariHindipublished1,406 पृष्ठ

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०३७


इस विष्णुस्तोत्रका सदैव पाठ किया। तत्पश्चात् नर्मदाके जलमें स्नान और अनेक प्रकारके दान करके राजा नाभाग अपनी पुरीको गये।

जो इस स्तोत्रद्वारा भगवान् जनार्दनकी स्तुति करता है, उसका इस घोर संसार-सागरमें पुनरागमन नहीं होता।


मेघनादतीर्थका प्राकट्य और उसकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगकी बात है। पुलस्त्यपौत्र त्रिलोकविजयी रावण देवताओंके लिये कण्टक हो गया था। वह वरदान पाकर देवता, दानव, यक्ष, गन्धर्व, नाग तथा राक्षस सबके लिये अवध्य हो गया था और पृथ्वीपर सब ओर इच्छानुसार विचरण करता था। उन दिनों परम सुन्दर देवगिरिपर मय नामसे विख्यात एक बलोन्मत्त दानव रहता था। रावण वहाँ मयको उपस्थित जान उसके समीप जाकर विनीतभावसे खड़ा हो गया। मयने दान और सम्मानपूर्वक रावणका स्वागत-सत्कार किया। तब रावणने मयसे पूछा—'प्रभो! यह किसकी कन्या है, इसका नाम क्या है और यह किसलिये उग्र तपस्या कर रही है?'

मय बोला—राक्षसराज! मैं दानवोंका राजा मय हूँ, मेरी पत्नीका नाम तेजवती है। यह सुन्दरी कन्या भी मेरी ही है। इसका नाम मन्दोदरी है। यह पतिके लिये तपस्या कर रही है।

मयका यह वचन सुनकर मदोन्मत्त रावण मयसे विनीत होकर बोला—महाभाग! मैं देवताओं और दानवोंका दर्प दलन करनेवाला पुलस्त्यपौत्र राजा रावण हूँ और आपसे प्रार्थना करता हूँ कि आप अपनी कन्या मुझे दे दें। उसे पितामह ब्रह्माजीके कुलमें उत्पन्न जान महात्मा मयने भी विधि-विधानसे उसके साथ अपनी पुत्रीका ब्याह कर दिया। मन्दोदरीको लेकर दुरात्माद्वारा पूजित राक्षस दिव्य विमानोंपर बैठकर उसके साथ क्रीड़ा करने लगा। कुछ कालमें पुत्रवानोंमें श्रेष्ठ रावणने एक पुत्रको जन्म दिया। उस पुत्रने जन्म लेते ही संवर्तक मेघके समान बड़ी भारी गर्जना की, इसलिये ब्रह्माजीने उसका नाम मेघनाद रख दिया। मेघनादने बड़े होनेपर उत्तम व्रतका आश्रय लिया और उमासहित देवेश्वर भगवान् शंकरकी आराधना प्रारम्भ की। वह विधिपूर्वक व्रत, नियम, दान, होम, जप एवं दिव्य कृच्छ्र-चान्द्रायण आदि व्रतोंद्वारा अपने शरीरको कष्ट देने लगा। एक दिन मेघनाद कैलास पर्वतपर गया और वहाँसे एक शिवलिंग लेकर दक्षिण दिशाकी ओर लौट पड़ा। नर्मदाके किनारे पहुँचनेपर उसने उस लिंगको एक स्थानपर रख दिया और स्नान करके महादेवजीका पूजन किया। फिर अपना जप पूरा करके जब वह लंकामें जानेको उद्यत हुआ तब उसने वहाँ पड़े हुए एक अन्य शिवलिंगको बायें हाथसे उठाया। इस प्रकार जब वह पहलेवाले और दूसरे शिवलिंगको भी भक्तिपूर्वक ले जाने लगा, तब महादेवजीका वह महालिंग नर्मदाके जलमें गिर पड़ा और दूसरा भी नर्मदाके उत्तर तटपर गिर गया। जो नर्मदाके उत्तर तटपर गिरा, वह शोभायमान लिंग वहाँ मेघनादेश्वरके नामसे विख्यात हुआ और जो जलके भीतर गिर पड़ा, उसका नाम मध्यमेश्वर हुआ। मेघनाद उस लिंगको उठाना चाहता था, पर सफल न हुआ। उन दोनों विग्रहोंका अभिप्राय जानकर वह राक्षस आकाशमार्गसे लौट गया। तभीसे वह तीर्थ मेघनाद तथा मेघारव नामसे विख्यात हुआ। उत्तर तटपर खेटक नामक उत्तम तीर्थ हुआ। उसके पूर्वभागमें सब पापोंका नाश करनेवाला गर्जन नामक तीर्थ है। राजेन्द्र! जो उस तीर्थमें स्नान और एक दिन-रातका उपवास करता है, वह सनातन कल्याणका भागी होता है। जो उस तीर्थमें पिण्डदान करता है, उससे देवलोकमें पितृगण बारह वर्षोंतक तृप्त रहते हैं। जो वहाँ ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, वह योगीजनॉंको मिलनेवाले उत्तम फलको पाता है।

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करंजेश्वर तथा कुण्डलेश्वरतीर्थका प्रादुर्भाव और माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं— राजन्! पहले सत्ययुगमें ब्रह्माजीके मानसपुत्र मरीचि हुए, जो वेद-वेदांगोंके तत्त्वज्ञ थे। मरीचिसे दीर्घकालके बाद महर्षि कश्यपका जन्म हुआ, जो द्वितीय ब्रह्माके समान थे। उनमें अपने पिताके क्षमा, दम, दया, दान, सत्य, शौच तथा सरलता आदि सभी सद्गुण शोभा पाते थे। महर्षि कश्यपके इन गुणोंको जानकर प्रजापति दक्षने अपनी तेरह कन्याओंका विवाह उनके साथ कर दिया। उनके नाम अदिति और दनु आदि थे। भैया युधिष्ठिर! इन दक्ष-कन्याओंके पुत्रों और पौत्रोंकी संख्या बहुत अधिक है। अदितिने इन्द्र आदि पुत्रोंको जन्म दिया। इसी प्रकार अन्य कन्याओंने नाग, प्रेत, पिशाच, पक्षी, यक्ष, राक्षस, सिंह, व्याघ्र, वराह आदिको उत्पन्न किया। महाबाहो! प्रजापति कश्यपके पुत्रोंसे चराचर प्राणियोंसहित समस्त त्रिलोकी व्याप्त हो गयी।

युधिष्ठिर! दक्षकन्या दनुके गर्भसे एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम करंज था। दानव करंजमें राजा बलिकी भाँति सभी प्रकारके उत्तम गुण विद्यमान थे। उसने बड़ी भारी तपस्या की, तब महादेवजीने उसे दर्शन देकर कहा—'करंज! तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

करंज बोला— प्रभो! मुझे पुत्र और पौत्रोंके साथ धन दीजिये।

'तथास्तु' कहकर पार्वतीसहित शिव वृषभपर आरूढ़ हो वहाँसे अन्तर्धान हो गये। तब वह दैत्य भी प्रसन्नतापूर्वक अपने नामसे महादेवजीकी स्थापना करके घरको लौट गया। तभीसे उस स्थानकी करंजेश्वर तीर्थके नामसे प्रसिद्धि हुई। राजन्! वहाँ स्नानमात्र करनेवाला मनुष्य ब्रह्महत्या-जैसे पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। जो उस तीर्थमें देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, वह निश्चय ही अश्वमेध-यज्ञका पुण्यफल प्राप्त करता है। जो वहाँ प्राणत्याग करता है, वह बीस हजार वर्षोंतक स्वर्गलोकमें निवास करता है और अन्तमें उत्तम कुलमें जन्म लेकर धनवान्, वेद-वेदांगोंका तत्त्वज्ञ, सर्वशास्त्रविशारद, राजा अथवा राजाके तुल्य होता है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं— युधिष्ठिर! प्राचीन त्रेतायुगमें पुलस्त्यपुत्र विश्रवाने भरद्वाज मुनिकी पुत्रीसे विवाह किया। उससे धनंजय नामक पुत्र उत्पन्न हुआ, जो पुत्रोचित गुणोंसे सम्पन्न था। उसके जन्मका समाचार सुनकर लोकपितामह ब्रह्माजीने ऋषियों और देवताओंके साथ बड़ी प्रसन्नतापूर्वक उस बालकका नामकरण-संस्कार किया और इस प्रकार कहा—'हे अनघ! यह बालक तुझ विश्रवासे प्रकट होकर मेरा पौत्र हुआ है। इसलिये मैंने तुम्हारे इस पुत्रको वैश्रवण नाम दिया है। यह सब देवताओंके धनका रक्षक होगा। लोकपालोंमें यह चौथा होगा। अविनाशी और यक्षोंका स्वामी होगा।'

आगे वही यक्षश्रेष्ठ कुण्डधार हुआ। उसने उत्तम स्वरूप और अवस्था पाकर माता-पिताकी आज्ञासे नर्मदाके तटपर बैठकर बड़ी भारी तपस्या की। तब दीर्घकालके पश्चात् महादेवजी उसपर प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले—'वत्स! तुम अपनी इच्छाके अनुसार वर माँगो।'

कुण्डधार बोला— देव! यह तीर्थ और लिंग मेरे नामसे प्रसिद्ध हो।

तब 'एवमस्तु' कहकर पार्वतीसहित भगवान् शिव अन्तर्धान हो आकाशमार्गसे कैलास पर्वतको चले गये। तदनन्तर उस यक्षने भी आनन्दयुक्त हो वहाँ कुण्डलेश्वर महादेवको स्थापित किया। विविध उपचारोंके साथ शिवलिंगका पूजन और अन्न-पानादि तथा वस्त्राभूषणादिके द्वारा ब्राह्मणोंको तृप्त करके महादेवजीको सन्तुष्ट करनेके अनन्तर वह अपने घरको लौट गया। तबसे वह तीर्थ तीनों लोकोंमें कुण्डलेश्वरके नामसे विख्यात

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हुआ। युधिष्ठिर! जो कोई भी उस तीर्थमें उपवासपूर्वक ईशान देवका पूजन करता है, वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है। उस तीर्थमें स्नान करके जो ब्राह्मण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदकी एक-एक ऋचाका भी पाठ करता है, उसे चारों वेदोंके पाठका फल प्राप्त होता है। जो मनुष्य वहाँ ब्राह्मणोंके लिये गोदान अथवा अन्नदान करता है, उस गौ तथा उसकी सन्तानोंके शरीरमें जितने रोएँ होते हैं, उतने हजार वर्षोंतक वह दाता स्वर्गलोकमें प्रतिष्ठित होता है।


पिप्पलेश्वर, विमलेश्वर, विश्वरूपा-नर्मदासंगम तथा एक दिनमें मेघनादेश्वर आदि पाँच लिंगोंकी यात्राका माहात्म्य, राजा धर्मसेनकी कथा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—नर्मदाके तटपर पिप्पलाद नामक एक मुनि थे। वे माता-पितासे रहित थे। उन्होंने सोलह वर्षोंतक निराहार रहकर एकचित्त हो पार्वतीसहित भगवान् शंकरको प्रसन्न किया।

तब महादेवजी बोले—ब्रह्मन्! मैं तुम्हारी इस तपस्यासे सन्तुष्ट हूँ। तुम मनोवांछित वर माँगो।

पिप्पलाद बोले—देव! आप इस तीर्थमें सदा मेरे नामसे प्रसिद्ध होकर निवास करें।

पिप्पलादके ऐसा कहनेपर 'तथास्तु' कहकर महादेवजी वहीं अन्तर्धान हो गये। उनके चले जानेपर पिप्पलादने नर्मदाकी महाजलराशिमें स्नान किया और भगवान् शिवकी स्थापना करके वे उत्तर पर्वतपर चले गये। जो मनुष्य उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण एवं महेश्वरका पूजन करता है, वह अश्वमेध यज्ञका उत्तम फल पाता है। पिप्पलेश्वरके समीप जिसकी मृत्यु होती है, वह भगवान् शिवके धाममें जाता है। पिप्पलेश्वर तीर्थमें भक्तिपूर्वक पितरोंकी तृप्तिके उद्देश्यसे जो ब्राह्मणोंको भोजन कराता है, उसके पितर बारह हजार वर्षोंतक तृप्त रहकर उत्तम गतिको प्राप्त होते हैं।

राजेन्द्र! तदनन्तर उत्तम विमलेश्वरतीर्थको जाय। जहाँ एक मनोहर देवशिला है, जहाँ गर्जन और खेटक नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है। वहीं उत्तम देवशिला भी है। जो मनुष्य वहाँ भक्तिपूर्वक स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसके पितर बारह वर्षोंतक परम तृप्त हो देवलोकमें आनन्द भोगते हैं। जो देवशिलातीर्थमें भक्तिभावसे थोड़े-से दानके द्वारा भी ब्राह्मणोंका सत्कार करता है, उसके पुण्यफलका अन्त नहीं है।

युधिष्ठिर! तदनन्तर नर्मदाके उत्तर तटकी यात्रा करे। मेघनादतीर्थके समीप सरिताओंमें श्रेष्ठ विश्वरूपा नदी बहती है। एक समय नर्मदाके तटपर विराजमान होकर भगवान् शंकर तपस्या करते-करते विश्वरूप हो गये। तब उन्हींके शरीरसे सरिताओंमें श्रेष्ठ विश्वरूपा प्रकट हुई और नर्मदाके जलमें जाकर मिल गयी। दोनोंका संगम बड़ा ही गुणवान् है। जो मनुष्य उस तीर्थमें जाकर स्नान करता है, वह फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। वहाँ जो कर्म किया जाता है वह सब अक्षय होता है। उस तीर्थमें किया हुआ श्राद्ध, यज्ञ और शिवपूजन कोटिगुना फल देनेवाला होता है। वहाँ पाँच शिवलिंग प्रसिद्ध हैं—मेघनादेश्वर, गोष्ठेश्वर, वागीश्वर, काकडेश्वर और लक्षेश्वर। जो इन पाँचों लिंगोंका एक दिनमें पूजन करता है, वह इसी शरीरसे भगवान् शिवको पा लेता है और मोक्षका भागी होता है।

पूर्वकालमें अयोध्यापुरीमें धर्मसेन नामक बलवान् राजा राज्य करते थे। उन्होंने धर्मपूर्वक राज्यका पालन तथा बहुत-सी दक्षिणावाले अनेकानेक यज्ञोंका अनुष्ठान किया। एक समय धर्मशास्त्र सुनते हुए राजाने नर्मदा नदीका चरित्र सुना। सुनकर वे नर्मदाके उत्तर तटपर गये और नर्मदामें स्नान करके उन्होंने मेघनादेश्वरका पूजन किया। तत्पश्चात् सूर्योदय होते-होते घोड़ेपर सवार हो

१०४० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

वे उत्तर दिशामें गोष्ठेश्वर शिवके समीप पहुँचे। गोष्ठेश्वरकी विधिपूर्वक पूजा करके राजा धर्मसेन वागीश्वर तीर्थमें गये। वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके चन्दन, अगर, कपूर और धूप-दीप आदि विधानोंसे शिवकी पूजा सम्पन्न करके पुनः घोड़ेपर सवार हो वे श्रेष्ठ राजा काकडेश्वरमें आये। काकडेश्वरकी पूजा करके वे लक्षेश्वर तीर्थमें गये और वहाँ नर्मदाके जलमें स्थित लक्षेश्वरका विधिपूर्वक पूजन करके मेघनादतीर्थमें लौट आये। इतनेमें सूर्य अस्त हो गये। उस समय कालरूपधारी भगवान् शिवका ध्यान करते हुए राजा धर्मसेन ज्यों ही घोड़ेसे उतरकर खड़े हुए, त्यों ही वह दिव्य शरीर धारण करके इन्द्रके विमानमें जा बैठा और इन्द्रलोकको चला गया। राजाके पीछे-पीछे एक कुतिया भी तीर्थयात्रा कर रही थी। उसने भी दिव्य देह धारण करके स्वर्गलोकको प्रस्थान किया। यह सब देखकर धर्मसेनके मनमें बड़ा विस्मय हुआ। उन्होंने दिव्यदेहधारी अश्वसे पूछा—'यह सब क्या है?' तब उसने आकाशसे ही उत्तर दिया, 'राजन्! आप अपने मनमें खेद क्यों मानते हैं? शारीरिक कष्ट सहन करनेसे और तपस्यासे दिव्य विभूतियोंकी प्राप्ति होती है। अभीतक तो आपने दूसरेके पैरोंसे यात्रा की है, अब पैदल जाइये। जब पुनः अपने पैरोंसे यात्रा करेंगे तब आपको अवश्य सिद्धि प्राप्त होगी।'

यह सुनकर राजाने दूसरे दिन पुनः लिंग-पूजनके लिये प्रस्थान किया। उन पाँचों लिंगोंका पूजन करके नर्मदा-तटपर आकर जब उन्होंने मेघनादेश्वरका दर्शन किया तब द्वारपर ही उन्हें भगवान् शिवका दर्शन हुआ। उनके पाँच मुख, दस भुजाएँ और प्रत्येक मुखपर तीन-तीन नेत्र थे। हाथमें त्रिशूल शोभा पा रहा था। संसारको अपने गर्भमें धारण करनेवाले भगवान् शिव वृषभपर आरूढ़ थे और उनके मस्तकपर अर्धचन्द्रका मुकुट अपनी चाँदनी छिटका रहा था। उन देवदेवेश्वर परमेश्वरका दर्शन करके राजाने इस प्रकार स्तुति की—'देव! महादेव!! आपकी जय हो। महा-पातकोंका नाश करनेवाले शिव! मैं संसार-समुद्रमें डूबा हुआ हूँ, आप इस समय मेरा उद्धार कीजिये।'

महादेवजी बोले—महाभाग! तुम मेरे भक्त हो। अतः तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो। उसे मैं तुम्हें दूँगा।

राजाने कहा—देव! यदि आप मुझपर प्रसन्न हैं तो मुझे अपने साथ रहनेवाला सेवक बना लीजिये और जो लोग एक दिनमें इन पाँचों लिंगोंका पूजन करें, वे सभी आपके अनुचर हों। यही मेरे लिये वर है।

धर्मसेनकी बात सुनकर महादेवजीने 'एवमस्तु' कहा तथा उन्हें साथ लेकर वे कैलास पर्वतपर चले गये। युधिष्ठिर! भगवान् शिवने राजा धर्मसेनको अपने-आपमें लीन कर लिया।

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मृकण्ड-आश्रममें दो गन्धर्वोंका उद्धार तथा चन्द्रमती-नर्मदासंगम आदि अन्य तीर्थोंकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! नर्मदाके दक्षिण तटपर मृकण्ड मुनिका पवित्र आश्रम है। उसमें परम धर्मात्मा मेरे पिता मृकण्डजीने दीर्घकालतक तपस्या की है। उनके आश्रममें उत्तम व्रतका पालन करनेवाले बहुत-से अन्य महर्षि भी निवास करते थे। इसी समय हेति और प्रहेति नामवाले दो गन्धर्व इन्द्रकी सभामें गये। वहाँ उन्होंने एक श्रेष्ठ अप्सराको देखा। देखते ही वे दोनों कामबाणसे पीड़ित हो गये। तब हेतिने मुर्गेकी और प्रहेतिने मोरकी बोली बोलकर मधुर स्वरसे उसे रिझानेकी चेष्टा की। उनका यह अभिप्राय जानकर देवराज इन्द्रने उन्हें शाप

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०४१

दिया—'अरे! तुम दोनों वास्तवमें मुर्गा और मोर हो जाओगे। देवताओंके सौ वर्ष पूरे होनेपर फिर यहाँ आ सकोगे।'

युधिष्ठिर! इन्द्रके इस शापसे दोनों दुराचारी गन्धर्व पक्षीकी योनिमें आ गये। उस समय भी वे बड़े सुन्दर थे। उन्हें देखना सबको प्रिय लगता था। वे अपने पूर्वजन्मके वृत्तान्तको स्मरण करके सब तीर्थोंमें भ्रमण करने लगे। एक दिन उन्होंने देवर्षि नारदको देखा और इस प्रकार पूछा, 'शुभाचार ब्रह्मपुत्र! हम दोनों किस कर्मसे इस योनिसे मुक्ति पा सकेंगे।'

नारदजीने कहा—नर्मदाजीके दक्षिण तटपर मृकण्ड मुनिका शुभाश्रम है। वह पशु-पक्षियोंकी योनिसे मुक्ति देनेवाला उत्तम तीर्थ है। तुम दोनों वहाँ नर्मदाजीके जलमें गोता लगाओ, इससे तुम्हारा सब कार्य सिद्ध होगा।

तदनन्तर हेति और प्रहेति—दोनों उस तीर्थमें स्नान करके पूर्ववत् दिव्यरूपधारी हो गये। फिर विधिपूर्वक स्नान करके उन्होंने सदाशिव देवका ध्यान किया और कुछ कालतक ध्यानमें ही स्थित रहे। इसी समय पातालसे सैकड़ों सूर्योंके समान प्रकाशमान दो शिवलिंग वहाँ प्रकट हुए। एकका कुक्कुटेश्वर और दूसरेका मयूरेश्वर नाम हुआ। वे दोनों गन्धर्व विमानपर बैठकर इन्द्रलोकको चले गये। उस तीर्थमें स्नान करके मनुष्य फिर इस संसारमें जन्म नहीं लेता। स्नानके पश्चात् वहाँ तिल और जलसे तर्पण करनेपर पितरोंकी उत्तम गति होती है। जो वहाँ मृत्युको प्राप्त होता है, वह फिर इस घोर संसार-सागरमें लौटकर नहीं आता।

तत्पश्चात् चन्द्रमती और नर्मदाके संगममें जो उत्तम तीर्थ हैं, उनकी यात्रा करे। वहाँ चन्द्रेश्वर, सिद्धेश्वर, घण्टेश्वर तथा महिषेश्वर—ये चार सिद्धलिंग हैं। तदनन्तर अश्वतीर्थ, वृषसेनतीर्थ, हयग्रीवतीर्थ और शुकतीर्थ हैं। उनसे आगे रमेश्वरतीर्थकी यात्रा करे, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है। राजन्! नर्मदाके तटपर रमेश्वरतीर्थ महापातकोंका भी नाश कर देता है। वहाँ स्नान करनेवाला मनुष्य फिर संसारमें जन्म नहीं लेता। पितरोंके लिये वहाँ विधिपूर्वक तिलोदक और पिण्डदान देना चाहिये। इससे पितरोंकी परम गति होती है। इससे आगे उत्तम हारिणीतीर्थ है। वहाँ सिद्धलिंग हरिणेश्वर, धनुरीश्वर, बाणेश्वर तथा लुब्धकेश्वर—इन सबकी पूजा करके मनुष्य शिवलोकमें जाता है।


भानुमतीका तीर्थसेवन, शूलभेदतीर्थमें शबर-दम्पतिका उद्धार और सती भानुमतीको कैलासधामकी प्राप्ति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! भगवान् शंकरकी पूजा करनेवाले पुरुषको चाहिये कि वह शास्त्रोक्त आठ मानस मन्त्रोंद्वारा आठ फूल निवेदन करे। उन फूलोंके नाम इस प्रकार हैं—वारिज, सौम्य, आग्नेय, वायव्य, पार्थिव, वानस्पत्य, प्राजापत्य और शिवपुष्प। अब इनके स्वरूपका निर्णय सुनो—जलको ही वारिज समझना चाहिये, मधुयुक्त दूध सौम्य कहलाता है, धूप और दीप आग्नेय पुष्पके अन्तर्गत हैं, चन्दन आदि वायव्य पुष्प हैं, कन्द-मूल आदि पार्थिव पुष्प और फल वानस्पत्य पुष्प है। अन्न आदि भोज्य पदार्थ प्राजापत्य पुष्प कहलाते हैं तथा उपासनाका ही नाम शिवपुष्प है। इनके सिवा अहिंसा प्रथम पुष्प है, इन्द्रियनिग्रह द्वितीय पुष्प और दया तृतीय पुष्प है। इन आध्यात्मिक पुष्पोंसे सब देवता सन्तुष्ट होते हैं। राजन्! इस हारिणीतीर्थमें तपस्या और भक्तिके द्वारा भगवान् शिवकी पूजा करनी चाहिये। जो ब्राह्मण रुद्रसूक्त, पुरुषसूक्त और अपनी-अपनी शाखाके अनुसार गृह्यसूत्र—'इषे त्वा' इत्यादि मन्त्र, ज्योतिर्ब्राह्मण, गायत्रीमन्त्र, मधुब्राह्मण, मण्डल ब्राह्मण

१०४२* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

तथा देवव्रत नामसे प्रसिद्ध दैव्यसूक्त आदि यजुर्वेदोक्त सूक्तोंका भक्तिपूर्वक जाप करते हैं, वे भगवान् शिवके लोकमें जाते हैं।

पूर्वकालमें वीरसेन नामसे विख्यात एक महापराक्रमी राजा हो गये हैं, वे चेदिदेशके स्वामी थे। बड़े-बड़े मण्डलाधीश्वर भी उनकी अधीनता स्वीकार कर चुके थे। राजा वीरसेनके राज्यमें कोई किसीका शत्रु नहीं था, किसीको रोग नहीं होता था और चोर आदिका उपद्रव भी नहीं था। उस राज्यमें कहीं भी अधर्म नहीं होता था, सदा सर्वत्र धर्मका ही पालन किया जाता था। राजा अपनी पत्नी और अनेक पुत्रोंके साथ सदा आनन्दसे रहते थे। उनके एक पुत्री थी, जो गिरिराजनन्दिनी उमाकी भाँति सुन्दरी थी। उसपर माता-पिता, भाई-बन्धु सभीकी स्नेहदृष्टि बनी रहती थी। समय आनेपर बारहवें वर्षमें चेदिराजने विधिपूर्वक अपनी पुत्रीका वैवाहिक कार्य सम्पन्न किया। विवाहके बाद उस कन्याका पति मृत्युको प्राप्त हो गया। बेटीको विधवा हुई देख राजा शोकमें डूब गये। उन्होंने दुःखसे पीड़ित होकर रानीसे कहा—'कल्याणी! यह तो जीवनभरके लिये अत्यन्त दुःसह दुःख आ पड़ा है। मेरी पुत्री रूप और यौवनसे सम्पन्न है, इसकी रक्षा कैसे की जा सकती है। भानुमतीके शीलकी रक्षाका अब कोई उपाय दिखायी नहीं देता।'

माता-पिता जब आपसमें इस प्रकार वार्तालाप कर रहे थे, उस समय उनकी बात सुनकर राजकुमारी भानुमती उनके समीप जाकर बोली—'पिताजी! मैं शोकाग्निसे जल रही हूँ, इसलिये आज आपके सामने संकोच छोड़कर बोलती हूँ। मेरे कारण कोई दोषकी बात नहीं होने पायेगी, यह मैं आपसे सत्य कहती हूँ। आजसे मैं कभी श्रृंगार नहीं धारण करूँगी, मोटे वस्त्रोंसे अपना शरीर ढक लूँगी, संयमपूर्वक रहकर पुराणोक्त सभी व्रतोंका आचरण करूँगी और श्रीहरिके सन्तोषके लिये तपस्या करती हुई अपनी कायाको सुखा डालूँगी। तात! यदि आपकी सम्मति हो तो मैं ऐसा ही जीवन व्यतीत करना चाहती हूँ।

भानुमतीका यह वचन सुनकर राजा वीरसेन स्नेहसे कातर हो गये। उन्होंने कन्याकी तीर्थयात्राके उद्देश्यसे बहुत अधिक धन देकर उसे विदा किया। कुछ विश्वासपात्र वृद्ध पुरुषोंको पुत्रीकी रक्षामें नियुक्त किया और एक हथियारबंद सिपाही तथा पुरोहित ब्राह्मणको भी साथमें लगा दिया। भानुमती गंगाके तटपर गयी और वहाँ स्नान करके भगवान्‌के ध्यानमें तत्पर हुई। स्नान, ध्यान और पूजन यह उसका प्रतिदिनका नियम हो गया। उसकी रक्षा करनेमें समर्थ जो दास-दासियाँ आदि थे, वे भी उसके पिता राजा वीरसेनकी आज्ञासे वहीं गंगाके किनारे टिके रहे। इस प्रकार वह राजकुमारी बारह वर्षोंतक गंगाजीके तटपर रही। तदनन्तर किसी समय गंगाको छोड़कर अपने सहायक मन्त्रियोंके साथ दक्षिण दिशामें गयी, जहाँ महानदी नर्मदा बहती थीं। वहाँ अमरकण्टक पर्वत एवं ॐकारतीर्थमें वह छः महीनेतक रही। फिर एक तीर्थसे दूसरे तीर्थमें होती हुई अनेकानेक तीर्थोंमें भ्रमण करने लगी। प्रत्येक तीर्थमें स्नान करके भक्ति-भावसे पूजन करती हुई वह निवास करती थी। तत्पश्चात् वह पश्चिम दिशामें देवनदी और नर्मदाके संगमपर गयी। वहाँ ऋषियोंके समुदायसे सेवित एक पुण्य आश्रम दिखायी दिया। ऋषिवृन्दका दर्शन करके भानुमतीने सबको प्रणाम किया और पूछा—'महात्माओ! इस तीर्थका नाम और माहात्म्य क्या है? यह बतानेकी कृपा करें।'

तब एक ऋषिने कहा—'तपस्विनि! यह स्थान चक्रतीर्थके नामसे विख्यात है। पूर्वकालमें त्रिशूलधारी देवाधिदेव महादेवने सन्तुष्ट होकर यहीं श्रीहरिको चक्र प्रदान किया था। जो इस तीर्थमें स्नान करके देवताओं और पितरोंका तर्पण करता है, उसे पुनरावृत्तिरहित उत्तम गति प्राप्त होती है। दूसरे दिन यहाँसे शूलभेदतीर्थमें जाना चाहिये। वहाँ रात्रिमें जागरण करके पुराणकी कथा पढ़े और सुने। पुष्प, धूप, दीप आदि निवेदन करके

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०४३

भगवान् विष्णुकी पूजा करे। तीसरे दिन प्रातःकाल होनेपर ब्राह्मणोंको भोजन करावे और अपनी शक्तिके अनुसार उन्हें भक्तिपूर्वक दान दे। फिर चौथे दिन जहाँ प्राची सरस्वती हैं, वहाँ जाना चाहिये। वे सरस्वती सम्पूर्ण जगत्‌को पावन करनेके लिये साक्षात् ब्रह्माजीसे प्रकट हुई हैं। पाँचवें दिन मार्कण्डेयेश्वर लिंगके समीप जाय और वहाँ स्नान करे। वह परम उत्तम स्थान सर्वदेवमय और सर्वतीर्थमय है। जो पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर वहाँ एक वर्ष या छः मास या पंद्रह दिन अथवा तीन रात्रि भी निवास करता है, उसका फिर मर्त्यलोकमें निवास नहीं होता। वह सदा स्वर्गलोकमें अक्षय निवास पाता है। जो नियमपूर्वक वहाँ निवास करता है, वह तीन जन्मोंके पापोंसे मुक्त हो जाता है तथा जो विधवा नारी उत्तम व्रतका पालन करती हुई बारह वर्षोंतक वहाँ निवास करती है, वह अनन्त कालतक रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होती है।

मुनिका यह वचन सुनकर भानुमतीको बड़ी प्रसन्नता हुई। वह आलस्य छोड़कर अहर्निश तीर्थसेवन एवं स्नान करने लगी। उस तीर्थका प्रभाव देखकर राजकुमारीने पुरोहितजी और ब्राह्मणोंसे कहा—‘आपलोग मेरी यह बात सुनें। मैं जबतक जीऊँगी, यहीं रहूँगी। ऐसे उत्तम स्थानका त्याग नहीं करूँगी। आपलोग जाकर मेरे माता-पिता तथा भाईसे यह बात कह दें कि ‘भानुमती नियमपूर्वक व्रतका पालन करती हुई इस समय शूलभेदतीर्थमें रहती है और एक-एक दिनका अन्तर देकर उपवास करती हुई धीरे-धीरे एक मासतक उपवास करनेकी चेष्टा कर रही है। वह देवशिलापर रहकर प्रतिदिन भगवान् विष्णुका ध्यान करती और भूमिपर ही सोती है।’

यह सन्देश लेकर जब ब्राह्मणलोग चले गये, तब एक दिन दो शबर (भील) वहाँ आये। वे दोनों पति-पत्नी थे। शबरने अपनी स्त्रीसे कहा—‘प्रिये! यहाँ जितने कमलपुष्प मिलें, उन्हें राजकुमारीको देकर तुम शीघ्र भोजन कर लो। मैंने आज यहाँ देवपूजनका विचार किया है, इसलिये मुझे आज भोजन नहीं करना चाहिये। मैंने कभी किसी विधि-निषेधका पालन नहीं किया है। सदा पाप बढ़ाया और अशुभ कर्म किया है। अतः आज मैं धर्मका पालन करना चाहता हूँ।’

शबरी बोली—प्राणनाथ! मैंने किसी भी दिन आपसे पहले भोजन नहीं किया है। जहाँतक मुझे स्मरण है, आपके भोजनसे बचा हुआ अन्न ही मैंने भोजन किया है।

पत्नीका यह निश्चय जानकर शबर स्नान करनेके लिये गया। उसने आधे उत्तरीय वस्त्रसे स्नान करके सब देवताओंको भक्तिपूर्वक स्नान कराया और देवशिलाके पास डरते-डरते जाकर खड़ा हुआ। वह मन-ही-मन भगवान् विष्णुका चिन्तन करता था। शबरीने कुमुदके दो फूल राजकुमारीकी दासीके हाथमें दिये। रानीने उन फूलोंको देखकर दासीसे पूछा—‘तुमने ये दोनों फूल कहाँ पाये हैं, बताओ। शीघ्र जाओ और पता लगाओ। यदि और फूल मिलें तो ले आओ। धन देकर कमलके फूल खरीद लाना।’

भानुमतीकी यह बात सुनकर दासी शबरके पास गयी और बोली—बहुत-से श्रीफल तथा फूल मुझे ला दो।

शबरी बोली—मैं श्रीफल और विशेषतः फूल दूँगी, परंतु मुझे मूल्य लेनेकी इच्छा नहीं है।

तब दासी लौट गयी और रानीसे सब बात बता दी। तब रानी स्वयं आयीं और शबरसे बोलीं—तुम मूल्य लेकर मुझे फूल दो।

शबर बोला—देवि! मैं फल और फूलका मूल्य नहीं लेना चाहता। आपको जितनी आवश्यकता हो, मुझसे श्रीफल और फूल ले लें तथा विधिपूर्वक जगत्पति भगवान् वासुदेवकी पूजा करें।

रानी बोलीं—मैं मूल्य दिये बिना तुम्हारे कमलके फूल नहीं लूँगी। इन फूलोंके बदलेमें तुम धान्यका यह ढेर ले जाओ।

१०४४* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

शबर बोला— भद्रे! आज मैं भगवान्‌का चिन्तन छोड़कर आहारका चिन्तन नहीं करूँगा। देवपूजन किये बिना अन्य किसी कार्यमें मेरी बुद्धि नहीं लगती।

रानी बोलीं— तुम्हें अन्नका त्याग नहीं करना चाहिये, क्योंकि सब कुछ अन्नमें ही प्रतिष्ठित है। अतः प्रयत्न करके मेरे अन्नको ग्रहण करो।

शबर बोला— मैं पहलेसे आज अन्न न लेनेका निश्चय कर चुका हूँ। यह सत्य है। सत्य ही सम्पूर्ण जगत्‌का मूल्य है और सत्यमें ही सब कुछ प्रतिष्ठित है। सत्यसे ही सूर्य तपते हैं, सत्यसे ही चन्द्रमा प्रकाशित होते हैं, सत्यसे ही वायु चलती है तथा सत्यके ही आधारपर यह पृथ्वी टिकी हुई है। अतः पूरा प्रयत्न करके मनुष्य सत्यकी रक्षा करे। सत्यका लोप कदापि न करे।

रानी बोलीं— फूल चार प्रकारके बताये गये हैं—एक तो बगीचेसे चुनकर लाया हुआ, दूसरा जंगलसे तोड़ा हुआ, तीसरा मूल्य देकर खरीदा हुआ और चौथा दानके रूपमें प्राप्त हुआ। इनमें उत्तम फल तो उसका माना गया है, जो स्वयं ही जंगलसे तोड़कर लाया गया हो। बगीचेके फूलका मध्यम फल बताया गया है। खरीदे हुए फूलको निकृष्ट श्रेणीमें रखा गया है तथा जो प्रतिग्रहसे प्राप्त हुआ फूल है, उसे विद्वानोंने निष्फल बताया है।

तब पुरोहितजीने कहा— रानी! फूल ले लो और भगवान्‌की पूजा करो।

पुरोहितकी आज्ञासे रानीने शबरका उपकार करते हुए वे फूल ले लिये और उनके द्वारा भगवान् विष्णुका विधिवत् पूजन किया। रातको जागरण करके उन्होंने पुराणकी कथा भी सुनी। तदनन्तर शबरने भी धूप-दीप आदि निवेदन करके श्रीहरिका पूजन किया और भगवान् केशवका ध्यान करते हुए वह रातभर जागता रहा। फिर प्रातःकाल होनेपर उसने स्नानके लिये उत्सुक मनुष्योंकी भीड़पर दृष्टिपात किया। कोई शूलभेदमें नहाते हैं तो कोई देवनदीमें। कोई प्राची सरस्वतीमें स्नान करते हैं, कोई मार्कण्डेय ह्रदमें गोता लगाते हैं और कितने ही मनुष्य भक्तिभावसे चक्रतीर्थमें स्नान कर रहे हैं तथा स्नानसे पवित्र हुए सब लोग देवशिलापर यत्नपूर्वक श्राद्ध करते हैं। यह सब देखकर शबरने भी बेलका पिण्डदान किया और भानुमतीने भी सत्तूके पिण्ड बनाकर पितरोंके लिये अर्पण किये। फिर दम्भ-दोषरहित उत्तम ब्राह्मणको खीर, दही, शक्कर, मधु, घी, पायस और कृसर (खिचड़ी) आदि पदार्थ भोजन कराये। तदनन्तर भानुमतीके साथ सब ब्राह्मण शूलभेदतीर्थमें गये। वहाँ सबने देखा, शबर अपनी स्त्रीके साथ कुण्डमें खड़ा है। तत्पश्चात् शबर भृगु पर्वतके शिखरपर जाकर स्त्रीके साथ कूदकर प्राण देनेको उद्यत हुआ। यह देख राजकुमारीने कहा— 'महासत्त्व! ठहरो-ठहरो, मेरी बात सुनो—तुम तो अभी जवान हो, किसलिये प्राणोंका त्याग करते हो? तुम्हें कौन-सा सन्ताप या उद्वेग हुआ है, कौन-सा दुःख अथवा रोग हुआ है?'

शबर बोला— मेरे प्राणत्याग करनेका कोई कारण नहीं है और न मुझे कोई दुःख ही है, परंतु संसारमें कुछ सार तत्त्व है, यह बात मेरी बुद्धिमें नहीं आती। मनुष्यका जन्म बड़े दुःखसे प्राप्त होता है। इस मनुष्य-जन्मको पाकर जो धर्माचरण नहीं करता, वह इस थोड़ेसे दोषके कारण घोर नरकमें पड़ता है। अतः तपस्विनि! मैं इस तीर्थमें गिरकर प्राण देना चाहता हूँ।

राजपुत्री बोली— शबर! अब भी समय है। तुम स्वधर्म पालन करते हुए नाना प्रकारके सत्कर्म कर सकते हो। मैं तुम्हें अन्न, वस्त्र और धन दूँगी। तुम भगवान्‌का ध्यान करते हुए सदैव धर्मका आचरण करो।

शबर बोला— देवि! मुझे अन्न और वस्त्र नहीं चाहिये; क्योंकि जो दूसरेका अन्न खाता है, वह पाप ही खाता है।

राजपुत्री बोली— कन्द, मूल, फलका आहार

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *
१०४५


करते हुए उत्तम भिक्षान्न भोजन करके तीर्थोंमें स्नान करो तो सब पापोंसे मुक्त हो जाओगे।<br><br>शबर बोला—देवि! मैंने अपना हित देखकर इस तीर्थमें प्राण त्यागनेका विचार कर लिया है। अब मैं सत्यका लोप नहीं कर सकता, यह मेरा निश्चित मत है। आप सब लोग मुझे क्षमा करें।<br><br>इतना कहकर उसने उत्तरीय वस्त्रसे अपनेको प्रयत्नपूर्वक बाँधा और स्त्रीके साथ भगवान्‌का ध्यान करके वह नीचे गिर पड़ा। लुढ़कता हुआ जब आधे पर्वतपर आ गया, तब उसके प्राण निकल गये। कुन्दके ऊपर जाकर उसका शरीर निश्चेष्ट हो गया। इसी समय शबर अपनी स्त्रीके साथ दिव्य विमानपर चढ़कर उत्तम गतिको प्राप्त हुआ।<br><br>तीर्थका यह माहात्म्य देखकर रानी भानुमती हर्षमें भर गयीं और मन-ही-मन कुछ सोच-विचारकर कुण्डके समीप पहुँचीं। फिर बहुत-से ब्राह्मणोंको बुलाकर उन्होंने पूजन किया औरउन सबको नाना प्रकारके दान दिये। उसके बाद रानी पर्वतके ऊपर चढ़ गयी। उस दिन चैत्र मासकी अमावास्या तिथि थी। पर्वतके शिखरपर आरूढ़ होकर उसने दोनों हाथ जोड़ लिये और सब ब्राह्मणोंसे इस प्रकार कहा—‘आप सब लोग मेरे माता-पिता, भाई तथा अन्य बन्धु-बान्धवोंसे यह कहियेगा कि सब लोग मेरी त्रुटियोंको क्षमा करेंगे और उन्हें यह सूचित कीजियेगा कि भानुमती शूलभेदतीर्थमें कठोर तपस्या करके शरीर त्यागकर स्वर्गको चली गयी।’<br><br>ऐसा सन्देश देकर रानीने सब लोगोंको विदा कर दिया और स्वयं पर्वतके शिखरपर खड़ी हुई। उसने अपने आधे उत्तरीय वस्त्रको खूब कसकर बाँध लिया और एकचित्त होकर पर्वतपरसे अपने शरीरको छोड़ दिया। वह आधे पर्वततक गिरकर आयी थी, इतनेमें ही देवताओं और दैत्योंने देखा—भानुमती दिव्य विमानपर आरूढ़ हो कैलास धामको चली गयीं।
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आदित्येश्वरतीर्थकी महिमा, मुनियोंद्वारा नर्मदाका स्तवन और उस तीर्थमें गोदानकी महिमा

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मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! अब मैं आदित्येश्वरतीर्थका माहात्म्य बतलाता हूँ। एक समय दुर्भिक्षके मारे हुए ब्राह्मणलोग नर्मदाजीके तटपर आये और फल तथा फूलोंसे भरे हुए एक उत्तम वनमें घुसे। वहाँसे पुनः नर्मदाजीके समीप जाकर उन्होंने दर्शन किया। दर्शन करके कुछ लोग नतमस्तक हुए और कुछ लोग ‘देवि! तुम्हारी जय हो, तुम्हें नमस्कार है’ ऐसा कहते हुए उनकी स्तुति करने लगे।<br><br>ऋषि बोले—सिद्धगणोंसे सेवित नर्मदादेवी! आपको नमस्कार है। सबको पवित्र करनेवाली मंगलमयी देवि! तुम्हें नमस्कार है। सहस्रों ब्राह्मणोंद्वारा पूजित तथा भगवान् शंकरसे प्रकट हुई पराशक्ति नर्मदे! तुम्हें नमस्कार है। देवि!तुम स्वयं पवित्र होकर सबको पवित्र करनेवाली हो, श्रेष्ठ हो, तुम्हें नमस्कार है। हमपर प्रसन्न होओ। शीतल जलसे सुशोभित सुखदायिनी नर्मदे! तुम सरिताओंमें श्रेष्ठ, पापहारिणी और दयावती हो, तुम्हें नमस्कार है। अनेक प्राणियोंके शरीरसे तुम्हारे अंगोंकी शोभा हो रही है। तुम्हारा एक-एक अंग गन्धवों, यक्षों तथा नागगणोंको पवित्र करनेवाला है। तुम उत्तम वर और सुख प्रदान करनेवाली हो, हम सब लोग तुम्हें नमस्कार करते हैं। तुम दुःखसे व्याकुल प्राणियोंको अभयदान देती हो। अनेक देवताओंने तुम्हारा पूजन किया है। मर्त्यलोकके मानव विष्ठा और मूत्रके समुद्ररूप इस शरीरमें डूबे रहकर तभीतक नरकोंमें निवास करते हैं, जबतक कि वेगसे

१०४६
* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

चलनेवाली वायुके झोंकेसे उठती हुई उत्ताल तरंगोंसे सुशोभित तुम्हारे जलका स्पर्श नहीं करते। देवि! म्लेच्छ, पुलिन्द और राक्षस भी यदि तुम्हारे पवित्र जलको पीते हैं तो पापके घोर भयसे मुक्त हो जाते हैं, फिर भय और पापसे डरे हुए हम-जैसे ब्राह्मणोंको मुक्त करना तुम्हारे लिये कौन बड़ी बात है। इस घोर एवं अपवित्र कलियुगमें तुम्हीं निर्मल जलराशिसे परिपूर्ण होकर शोभा पाती हो। देवि! तुम्हारे ही प्रसादसे आकाशमें आकाशगंगाकी स्थिति है। इस समय तुम हमारी यथेष्ट रक्षा करो, जिससे तुम्हारे कृपाप्रसादसे हम सब लोग तुम्हारे लोकमें जा सकें। हमारे ऊपर अनुग्रह करो। हम तुम्हारे आश्रित हैं, तुम्हारी शरणमें आये हुए हैं, तुम्हीं हमारी गति हो। देवि! तुम आदिदेव महादेवजीसे प्रकट हुई हो, तुम्हारी शक्ति अद्भुत है।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! ऋषियोंके इस प्रकार स्तवन करनेपर सरिताओंमें श्रेष्ठ महानदी नर्मदा प्रत्यक्ष होकर बोलीं—‘विप्रगण! मैं तुमपर सन्तुष्ट हूँ और तुम्हें मनोवांछित वर देती हूँ।’

तदनन्तर मेघोंकी बड़ी भारी घटा घिर आयी और खूब वर्षा हुई। देशमें सब ओर बहुत अन्न हुआ तथा सर्वत्र कन्द, मूल, फल और शाक आदि सुखपूर्वक मिलने लगे।

युधिष्ठिर! जो मनुष्य जितेन्द्रिय भावसे भक्तिपूर्वक ग्रहणके अवसरपर सूर्यतीर्थकी यात्रा करते हैं तथा काम, क्रोध, राग और द्वेषसे मुक्त हो भगवान् विष्णुकी कथा सुनते हुए वेदोंका पाठ करते हैं, अथवा ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेदकी एक-एक ऋचाका ही पाठ करते हैं वे सम्पूर्ण वेदोंके पाठका पूरा-पूरा फल पा लेते हैं। वहाँ गायत्रीमन्त्रके जपसे मनुष्य चारों वेदोंका फल पाता है। प्रातःकाल वहाँ अन्नदान और सुवर्णदान आदिके द्वारा भगवान्‌का पूजन करे। जो उस तीर्थमें स्नान करके योग्य ब्राह्मणोंको कपिला गौ प्रदान करता है उसके द्वारा पर्वत, वन और काननों-सहित मानो समूची पृथ्वी दे दी जाती है। जिसने वहाँ गोदान किया उसके द्वारा भूर्लोक, भुवर्लोक, स्वर्लोक, महर्लोक, जनलोक, तपोलोक तथा सत्यलोक एवं इक्कीस पातालोंका भी दान सम्पन्न हो जाता है। जो प्रातःकाल उठकर भक्तिपूर्वक प्रतिदिन कपिला गौकी प्रदक्षिणा करता है उसके द्वारा सात द्वीपोंवाली पृथ्वीकी परिक्रमा हो जाती है। जो कपिला गौके पंचगव्यसे भगवान् शंकरको स्नान कराता अथवा जगदाधार विष्णु, सूर्य या अन्य किसी देवताको नहलाता है और जो एक वर्षतक प्रतिदिन श्रोत्रिय ब्राह्मणको कपिला गौका दान देता है, इन दोनोंका फल एक बताया गया है। जो कोई भी मनको वशमें करके सूर्यतीर्थमें कपिला, कृष्णा, श्वेत रंग या लाल रंगकी दूध देनेवाली नयी गौको बछड़ेसहित ब्राह्मणके लिये देता है तथा ब्राह्मणको विष्णु, अपने-आपको भी विष्णु और गौको सूर्यस्वरूप समझते हुए गोदान करता है वह स्वर्गलोकमें निवास करता है और ब्रह्महत्या आदि पापोंसे भी मुक्त हो जाता है। युधिष्ठिर! धेनुदानसे सब पापोंका नाश हो जाता है। जो पापनाशक सुरभिसंगम नामक पुण्यतीर्थमें भक्तिपूर्वक प्रेतके लिये श्राद्ध करता है, उसके ऊपर भगवान् सूर्य और महादेवजी प्रसन्न रहते हैं।


$\sim\sim\sim\circ\sim\sim\sim$

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड *१०४७

धनदतीर्थका माहात्म्य, पूज्य और अपूज्य ब्राह्मण, वृषोत्सर्गकी महत्ता तथा गौतमेश्वरतीर्थकी महिमा

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजेन्द्र! तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाले परम उत्तम धनदतीर्थमें जाय, जो नर्मदाके दक्षिण तटपर स्थित है। वहाँ स्नान करनेसे सब तीर्थोंका फल प्राप्त होता है। चैत्र मासके शुक्ल पक्षमें त्रयोदशी तिथिको उपवास करके रातमें जागरण करे और परम भक्तिपूर्वक वरदायक भगवान् शिवको स्नान करावे। तत्पश्चात् भक्तिपूर्वक पूजा करके गीत और वाद्यके द्वारा आराधना करे। प्रातःकाल अपने कल्याणकी इच्छा रखनेवाले पुरुषको ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये। जो ब्राह्मण दान नहीं लेते, विद्याके सिद्धान्तका प्रतिपादन करते और निन्दासे दूर रहते हैं, उनका भक्तिभावसे भरण-पोषण करना चाहिये। धनदतीर्थके प्रभावसे तीन जन्मोंका पाप नष्ट हो जाता है। यह तीर्थ दुष्टोंको स्वर्ग देनेवाला है और साधु पुरुषोंको मोक्ष प्रदान करनेवाला है।

जो ब्राह्मण संस्कारहीन, आचारभ्रष्ट, नपुंसक, सूदखोर, खेती करनेवाले और भेददृष्टि रखनेवाले हों, उनका कोई पूजन न करे। जिसके घरमें शूद्र जातिकी स्त्री हो, जो भैंसेसे हल चलवाते या भैंसेपर भार लादते हों, ऐसे ब्राह्मणोंको श्राद्ध और व्रतमें दूरसे ही त्याग देना चाहिये। जो काने, कुण्ड (जो पिताके जीते-जी किसी जार पुरुषसे उत्पन्न हुए हों), गोलक (जो पिताकी मृत्युके बाद दूसरेसे उत्पन्न हुए हों) और वैद्यवृत्तिसे जीविका चलानेवाले हैं—वे भी व्रत और श्राद्धमें वर्जित हैं। यदि अपने पितरोंको ऊर्ध्वलोकमें भेजनेकी इच्छा हो तो सदा सर्वांगसुन्दर धर्मिष्ठ ब्राह्मणोंका पूजन करना चाहिये।

जो सदा धर्मचर्चामें तत्पर रहनेवाले, देवता, ब्राह्मण और गुरुजनोंके भक्त, तीर्थसेवापरायण, मातृभक्त, पितृभक्त, स्वामिभक्त, क्रोध-द्रोह आदि दुर्गुणोंसे रहित और सब प्रकारके सद्गुणोंसे युक्त हैं, वे ही मनुष्य स्वर्गलोकके अधिकारी हैं।

कार्तिक और वैशाखकी पूर्णिमाको स्नान करके पवित्र एवं जितेन्द्रिय होकर भगवान् शिवके समीप उन्हींकी प्रीतिके लिये वृषोत्सर्ग करे और यह कहे कि 'इस उत्सर्गसे ब्रह्मा, विष्णु तथा महादेवजी प्रसन्न हों'—ऐसा करनेवाला मनुष्य भगवान् विष्णुके लोकमें पूजित होता है।

नर्मदाके उत्तर तटपर गौतमेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है। महर्षि गौतमने सब लोगोंके हितकी इच्छासे स्वर्गकी सीढ़ीके रूपमें उस तीर्थकी स्थापना की है। युधिष्ठिर! वहाँ सब पातकोंका नाश करने और स्वर्गलोककी प्राप्ति करानेके लिये जगद्गुरु महादेवजी निवास करते हैं।

नर्मदाके दक्षिण तटपर शंखचूड़ेश्वर नामसे प्रसिद्ध तीर्थ है। उस तीर्थमें स्नान करके पवित्र और एकाग्रचित्त हो भक्तिपूर्वक मधु, दही और घीसे भगवान् शंखचूड़को स्नान करावे। रातमें उनके आगे जागरण करे और उत्तम व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्मणोंका दही-भातसे सत्कार करे। जो उस तीर्थमें साँपके डसनेसे भी मृत्युको प्राप्त होता है वह भी भगवान् शंखचूड़की आज्ञासे उत्तम लोकमें जाता है।

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१०४८* संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

पराशराश्रमकी महिमा, पराशर मुनिकी तपस्या, वरदान-प्राप्ति, भीमेश्वरमें गायत्री-जपका महत्त्व और नारदेश्वरतीर्थका माहात्म्य

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! नर्मदाके उत्तर तटपर महर्षि पराशरने पुत्रके लिये बड़ी भारी तपस्या की। उन्होंने हिमाचलकन्या गौरी तथा नारायणसहित लक्ष्मीको अपनी पराभक्तिसे सन्तुष्ट किया। तब देवी पार्वतीने प्रत्यक्ष दर्शन देकर कहा—'मुनिश्रेष्ठ! मैं तुम्हारी भक्तिसे प्रसन्न हूँ। विप्रवर! तुम कोई वर माँगो।'

पराशरजी बोले—देवि! मुझे सब शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण एक पुत्र शीघ्र दीजिये और यह स्थान तीर्थ हो जाय तथा आप भी लोकोपकारके लिये सदा यहाँ निवास करें।

देवीने कहा—'एवमस्तु'—ऐसा ही होगा।

इतना कहकर पार्वतीदेवी अन्तर्धान हो गयीं। तब महात्मा पराशरजीने पार्वतीदेवी तथा भगवान् शंकरको वहाँ स्थापित किया जो देव-दानववन्दित तथा सब देवताओंद्वारा पूजित हैं। यह सब करके पराशर मुनि कृतकृत्य हो निश्चिन्त हो गये। राजन्! उस तीर्थमें भक्तिपूर्वक स्नान करके शुद्धचित्त हो चैत्र, श्रावण और मार्गशीर्ष मासके शुक्ल पक्षमें अष्टमी, चतुर्दशी एवं सूर्यग्रहणके पर्वमें सदा भगवान् शंकर और पार्वतीदेवीका पूजन करे। स्त्रियाँ हों या पुरुष—सभी काम-क्रोधसे रहित हो उपवास करके भक्ति-भावसे व्रतका पालन करें। फिर हाथभरके कुश और उत्तम तिल लेकर ब्राह्मणको उत्तराभिमुख बिठावे और स्वयं दक्षिण दिशाकी ओर मुँह करके बैठे। फिर कुशोंपर कच्चा अन्न रखकर ब्राह्मणके आगे इस प्रकार कहे—'इस उत्तम तीर्थके प्रभावसे अमुक प्रेतको श्रेष्ठ लोककी प्राप्ति हो। मेरा पाप नष्ट हो जाय, शुभ कर्मकी सदा वृद्धि हो, मेरे कुल और कुटुम्बका भी सर्वदा अभ्युदय हो।' ऐसा कहकर पराशर-आश्रममें ब्राह्मणको दान दे। जो मनुष्य भक्तिपूर्वक इस प्रसंगको सुनता है वह सब पापोंसे मुक्त हो जाता है।

तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाले भीमेश्वरतीर्थको जाय, जो भयानक व्रत धारण करनेवाले ऋषियोंके समुदायसे सेवित है। जो उस तीर्थमें स्नान और उपवास करके इन्द्रियोंको वशमें रखते हुए सूर्यकी ओर दोनों हाथ उठाकर एकाक्षर मन्त्र प्रणवका जप करता है उसका जन्मभरका पाप उसी क्षण नष्ट हो जाता है और गायत्री-मन्त्रका जप करनेसे सात जन्मोंका संचित पाप निश्चय ही नाशको प्राप्त होता है। दस बार गायत्री जपनेसे एक जन्मका, सौ बार जपनेसे पूर्वजन्मका और सहस्र बार जपनेसे तीन जन्मोंके पापोंका गायत्री देवी नाश करती हैं। राजन्! वहाँ जप किया हुआ वैदिक या लौकिक मन्त्र सब पापोंको तत्काल जला देता है। परंतु यदि कोई इसीके भरोसे पाप करे तो उसको वह फल कभी नहीं मिलता।

वहाँसे उत्तम नारदेश्वरतीर्थको जाय, जिसकी स्थापना स्वयं देवर्षि नारदजीने की है। पूर्वकालमें ब्रह्माजीके पुत्र देवर्षि नारदजीने नर्मदाके उत्तर तटपर तपस्या की। वे नवों इन्द्रियछिद्रोंको रोककर काष्ठकी-सी दशाको प्राप्त हो गये। ऐसा कठोर तप करके उन्होंने महादेवजीको सन्तुष्ट किया। तब महादेवजी प्रत्यक्ष होकर बोले—'देवर्षे! मैं तुमपर प्रसन्न हूँ। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके अनुसार वर माँगो।'

नारदजीने कहा—देव! आपके प्रसादसे मेरा योग सिद्ध हो जाय।

महादेवजीने कहा—तुम्हारा योग सिद्ध हो और मुझमें सदा तुम्हारी भक्ति बनी रहे। तुम स्वर्ग, पाताल अथवा मर्त्यलोकमें अपनी इच्छाके अनुसार भ्रमण करो। कभी कोई तुम्हें रोक नहीं सकता। सात स्वर, तीन ग्राम और इक्कीस मूर्छनाओंके साथ दिव्य नृत्य एवं संगीतकलाका तुम्हें ज्ञान होगा, जो मुझे

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०४९


बहुत ही प्रिय है। तुम्हारा यह तीर्थ भूतलपर मेरे प्रसादसे परम पवित्र माना जायगा।

ऐसा कहकर भगवान् शिव अन्तर्धान हो गये और देवर्षि नारदने सब प्राणियोंके उपकारके लिये वहाँ एक शिवलिंग स्थापित किया। नारदजीका वह तीर्थ इस पृथ्वीपर बहुत ही उत्तम है। मनुष्य जितेन्द्रिय होकर उस तीर्थमें जाय। जो लोग अस्त्र-शस्त्रद्वारा मारे गये हैं, उनकी सद्गतिके लिये वहाँ श्राद्ध करे। उस तीर्थमें किये हुए पिण्डदानके प्रभावसे वे मृतक पुरुष उत्तम लोकको जाते हैं। पूर्वकालमें नर्मदाजीके सामने नन्दीने भगवान् महेश्वरकी प्रसन्नताके लिये तप किया।

तब महादेवजी प्रसन्न होकर बोले—'नन्दीश्वर! मैं सन्तुष्ट हूँ, तुम मनोवांछित वर माँगो।'

नन्दीने कहा—देवेश्वर! मैं धन नहीं चाहता, कुल और सन्तान नहीं चाहता, मोक्ष या और कोई वस्तु भी नहीं चाहता। मुझे तो केवल आपके चरणारविन्दोंकी सेवा चाहिये। जन्म-जन्ममें आपके प्रति अविचल भक्ति प्राप्त हो।

'तथास्तु' कहकर महादेवजी नन्दीका हाथ अपने हाथमें लेकर शीघ्र ही उनके साथ कैलासधाममें चले गये। जो मनुष्य उस तीर्थमें स्नान करके भक्तिभावसे भगवान् त्रिलोचनकी पूजा करता है वह अग्निष्टोम यज्ञके पुण्य और फलको पाता है।


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नर्मदा-नागेशके संगममें कण्ठकी ब्रह्महत्यासे मुक्ति और सद्गति

मार्कण्डेयजी कहते हैं—राजन्! पूर्वकालमें शम्बर नामके एक राजा थे। शम्बरके पुत्र त्रिलोचन और त्रिलोचनका पुत्र कण्ठ हुआ। यह कण्ठ बड़ा नीच था। सदा पापोंमें ही लगा रहता था। एक दिन वह वनमें घूम रहा था। उसी समय उसे मृगोंका झुंड दिखायी दिया। कण्ठने उस पूरे झुंडको अपने बाणोंका निशाना बना दिया। उसी झुंडमें एक ब्राह्मण भी थे जो मृगका रूप धारण करके निर्जन वनमें विचर रहे थे। वे भी उस समय कण्ठके शस्त्रसे मारे गये। कण्ठको ब्रह्महत्या लगी और वह तेजोहीन होकर पृथ्वीपर विचरने लगा। घूमता-घूमता वह नर्मदा और नागेशके संगमपर जा पहुँचा तथा अधिक थका होनेके कारण एक वृक्षकी छायामें सो गया। तत्पश्चात् उठा और संगममें नहाकर बड़ी भक्तिके साथ उसने भगवान् सोमनाथका पूजन किया। इसके बाद कण्ठने कण्ठतक नर्मदाका पापनाशक जल पीया। इसी समय एक ब्राह्मण संगमतीर्थमें स्नान करनेके लिये आ रहे थे। रास्तेमें उन्हें वृक्षपर बैठी हुई एक भयानक स्त्री दिखायी दी। वह स्त्री उनसे बोली—'विप्रवर! यदि तुम संगममें स्नान करनेके लिये जाते हो तो वहाँ मेरा पति ठहरा हुआ है, उसे शीघ्र भेज देना।'

यह सुनकर ब्राह्मणदेवता संगमपर गये और वहाँ वृक्षकी छायामें बैठे हुए कण्ठको देखकर बोले—'मैंने वनमें एक स्त्री देखी है। उसने मुझसे कहा है कि संगमपर मेरा पति है, उसको मेरे पास भेज दो।'

तब कण्ठने अपने एक सेवकसे कहा—'तुम जाओ और उससे पूछो कि तुम कौन हो और कहाँसे आयी हो?'

सेवक जहाँ वह स्त्री बैठी थी, वहाँ गया और इस प्रकार बोला—'बाले! राजा कण्ठ पूछते हैं कि तुम कौन हो?'

स्त्री बोली—जितात्मा पुरुषोंको शिक्षा देनेवाले गुरु हैं, दुष्टोंका शासन करनेवाले राजा हैं और इस लोकमें जो छिपे हुए पाप करते हैं, उन सबके शासक विवस्वान्‌के पुत्र यमराज हैं। इस कण्ठने मृगरूपधारी ब्राह्मणका वध किया है, अतः इसे ब्रह्महत्या लगी है। ब्रह्महत्या मैं ही हूँ। यद्यपि मैंने उसे पकड़ रखा था, तथापि इस तीर्थके प्रभावसे वह मुझसे छूट गया है। यहाँ नर्मदासे आधे कोसके अंदर ब्रह्महत्याका प्रवेश नहीं होता। अतः तुम जाओ, कण्ठको शीघ्र ही यहाँ भेज देना।

१०५० * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सेवकने लौटकर राजासे सब वृत्तान्त कह सुनाया। उसकी बात सुनकर राजा कण्ठ पृथ्वीपर गिर पड़ा। तब सेवकने कहा—'नाथ! आप पहलेके शुभाशुभके विषयमें इतना शोक क्यों करते हैं।' उसने उत्तर दिया—'मैं यहीं भगवान् सोमनाथके समीप प्राणत्याग करूँगा। तदनन्तर राजाने संगमके पापनाशक जलमें स्नान किया, भक्तिपूर्वक भगवान् सोमनाथकी पूजा की और तीन बार उनकी परिक्रमा करके प्रज्वलित अग्निमें प्रवेश किया। उस समय वह मन-ही-मन पीताम्बर और महान् मुकुट धारण करनेवाले भगवान् विष्णुका ध्यान कर रहा था तथा यह प्रार्थना करता था कि 'श्रीहरिके ध्यानसे मेरी उत्तम गति हो।'

उस समय उसके ऊपर आकाशसे फूलोंकी वर्षा हुई। यह अनुपम आश्चर्य देखकर कण्ठके सेवकोंने भी एक-दूसरेकी ओर दृष्टिपात किया और भगवान् गदाधरका ध्यान करते हुए उन्होंने उसी अग्निमें अपने शरीरकी भी आहुति दे दी। तब वे सब-के-सब दिव्य विमानपर आरूढ़ हो स्वर्गलोकको चले गये।

युधिष्ठिर! भगवान् सोमनाथका ऐसा ही प्रभाव है। अष्टमी और चतुर्दशीको शुभ दिनमें सब समय और विशेषतः शुक्ल पक्षमें सप्तमी तथा रविवारका योग होनेपर मनुष्य उपवास करके भक्तिभावसे रात्रिमें जागरण करे। भगवान् शिवको स्नान कराकर उनके श्रीविग्रहमें चन्दनका लेप करे और पुष्प, धूप आदि देकर घीसे दीपक जलावे। फिर दूसरे दिन अष्टमीयुक्त सोमवारको प्रातःकाल क्रोधको जीतनेवाले, निन्दासे दूर रहनेवाले, सर्वाङ्गसुन्दर, शान्त, अपनी पत्नीका पालन करनेवाले, गायत्रीजपपरायण तथा कुकर्म-रहित ब्राह्मणका पूजन करे। ऐसा करनेसे वह भगवान् शिवके लोकमें जाता है।


पूतकेश्वर तथा जलशायी (चक्र) तीर्थका माहात्म्य, श्रीविष्णुके द्वारा नलमेघ दानवके वधकी कथा

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजेन्द्र! तदनन्तर नर्मदाके दक्षिण तटपर पूतकेश्वर नामक उत्तम तीर्थमें जाय, वह सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ लोगोंके हितकी कामनासे भगवान् शिवकी स्थापना की गयी है। युधिष्ठिर! जो मनुष्य वहाँ भगवान् शिवकी पूजा करता है, वह सब मनोरथोंको प्राप्त होता है। कृष्ण पक्षकी अष्टमी और चतुर्दशीको जो मनुष्य महाकालका पूजन करते हैं, वे कभी यमलोकमें नहीं जाते। नर्मदाके उत्तर तटपर उत्तम वैष्णवतीर्थ है, जो जलशायीके नामसे इस भूतलपर विख्यात है।

पूर्वकालमें नलमेघ नामसे प्रसिद्ध एक बड़ा भारी दैत्य था। उसने सब देवताओंको जीतकर उनका राज्य छीन लिया। नलमेघके भयसे इन्द्र आदि सब देवता सर्वोत्कृष्ट ब्रह्मलोकमें गये और भाँति-भाँतिके स्तोत्रोंद्वारा ब्रह्माजीकी स्तुति करने लगे। तब ब्रह्माजीने देवताओंसे कहा—'भगवान् विष्णुके बिना वह दैत्य दूसरेसे नहीं जीता जा सकता।' यह सुनकर सम्पूर्ण देवताओंने श्रीविष्णुका स्तवन किया—'शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण करनेवाले प्रभो! आपकी जय हो।' देवताओंकी यह स्तुति सुनकर भगवान् जलशायी जाग उठे और मेघगर्जनाके समान, गम्भीर वाणीमें बोले—'ब्रह्मन्! आपने समस्त देवताओंके साथ आकर मुझे किसलिये जगाया है?'

**ब्रह्माजी बोले—**भगवन्! हमलोग नलमेघके भयसे आपके धाममें आये हैं। पापी नलमेघ दूसरे किसीके हाथसे नहीं मारा जा सकता। केवल आपके ही हाथसे उस दुष्टात्माकी मृत्यु होगी।

**भगवान् विष्णु बोले—**देवताओ! अपने-अपने स्थानको जाओ, मैं उस महाबली दैत्यका वध कर दूँगा।

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५१

तदनन्तर भगवान् जनार्दनने अपने हाथमें शंख, चक्र, गदा और शार्ङ्ग धनुष लेकर गरुड़पर सवार हो उस दानवका वध करनेके लिये प्रस्थान किया। जगत्के स्वामी श्रीहरि गिरिराज हिमालयपर गये और उसके नगरके निकट पहुँचकर उन्होंने अपना पांचजन्य शंख बजाया। उसकी ध्वनि सुनकर नलमेघको बड़ा क्रोध हुआ और वह अपने रथपर आरूढ़ हो नगरसे बाहर निकला। इतनेमें ही शंख, चक्र और गदा धारण करनेवाले भगवान् विष्णुपर उसकी दृष्टि पड़ी।

तब नलमेघ बोला—दानवो! यह वही विष्णु है, जिसने दानव धुन्धुमारका वध किया है, इसे मार डालो।

ऐसा कहकर दानव नलमेघ अपने बाणोंसे भगवान् विष्णुपर आघात करने लगा। किंतु श्रीहरिने उसके सभी बाण काट डाले और उस दानवपर दुगुने बाणोंकी बौछार की। तब दानवने भी दूने-से-दूना करके विष्णुपर बाणोंकी वर्षा की। तब भगवान्ने नारसिंह बाण चलाया। उसे देखकर नलमेघ शीघ्रतापूर्वक रथसे उतर गया और हाथमें तलवार लेकर भगवान्को मारनेके लिये दौड़ा। यह देख श्रीहरिने अपना अमोघ चक्र लेकर उस दानवका मस्तक काट गिराया। तदनन्तर देवताओंने भगवान् विष्णुपर फूलोंकी वर्षा की। नलमेघके मारे जानेपर देवगण अपने-अपने स्थानको चले गये और भगवान् विष्णु नर्मदाके जलमें लीन हो गये। तबसे इस लोकमें वह स्थान जलशायी तीर्थ कहलाता है। वह अनेक पापोंका नाश करनेवाला है। कुछ लोग उसे चक्रतीर्थ भी कहते हैं। युधिष्ठिर! भारतवर्षमें नर्मदाके तटपर यह तीर्थ प्रसिद्ध है। मार्गशीर्ष मासमें शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको शुभ दिनमें वहाँ जाकर जो मनुष्य काम और क्रोधसे रहित हो शेषशय्यापर शयन करनेवाले भगवान् लक्ष्मीपतिको स्नान कराते हैं, तथा जो लोग मधु, दूध, घी और गुड़ मिले हुए जलसे नहलाये जाते हुए श्रीविष्णुका भक्तिभावसे दर्शन करते हैं, वे पापरहित हो भगवान्के देव-दानववन्दित परम धामको जाते हैं। जो श्रेष्ठ मानव वहाँ भक्तिपूर्वक भगवान् विष्णुकी कथा सुनते हैं, वे ब्रह्महत्या आदि पापोंसे मुक्त हो जाते हैं। जो जलशायी भगवान् जगद्गुरु विष्णुकी प्रदक्षिणा करते हैं, उनके द्वारा सम्पूर्ण जम्बूद्वीपकी परिक्रमा हो जाती है। तदनन्तर निर्मल प्रातःकाल होनेपर यत्नपूर्वक पितरोंका तर्पण करके पूज्य ब्राह्मणोंके द्वारा श्राद्ध करावे। जो ब्राह्मण वेदका विद्वान् नहीं है, मादक वस्तुओंके सेवनसे उन्मत्त रहता है, मित्रद्रोही, कृतघ्न और व्रतहीन है, उसे दान नहीं देना चाहिये। जो वेदान्तको पढ़कर उसके तत्त्वको जानता हो, उसे गोदान देना चाहिये। जो सर्वाङ्गसुन्दर, पवित्र और प्रिय वचन बोलनेवाला हो, ऐसे ही ब्राह्मणको गौ देनी चाहिये।


प्रभासेश्वर, मार्कण्डेयेश्वर, संकर्षण, मन्मथेश्वर तथा एरण्डीसंगममें पुत्रप्राप्तिपदतीर्थकी महिमा, अनसूयाजीके पुत्ररूपसे ब्रह्मा, शिव और विष्णुका अवतार

**मार्कण्डेयजी कहते हैं—**राजन्! सूर्यदेवकी स्त्री प्रभाने पूर्वकालमें उग्र तपस्याके द्वारा भगवान् शिवकी आराधना की। वह उन्हींके ध्यानमें तत्पर हो एक वर्षतक केवल वायु पीकर रही। इससे सन्तुष्ट होकर महादेवजीने प्रभासे कहा—'बाले! तू क्यों कष्ट उठा रही है? अपना मनोरथ प्रकट कर।'

**प्रभा बोली—**शम्भो! स्त्रीके लिये पतिके सिवा दूसरा कोई देवता नहीं है। भले ही पति कभी पत्नीका पोषण न करता हो, गुणवान् हो या गुणहीन, धनवान् हो या निर्धन, प्रेमी हो या द्वेषपात्र, किंतु स्त्रीके लिये तो पति ही उसका देवता है। महेश्वर! मैं पतिसे सुख नहीं पा रही हूँ। इसीलिये क्लेश उठाती हूँ।

१०५२ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

महादेवजीने कहा—देवि! तू मेरे प्रभावसे सूर्यदेवकी प्रियतमा होगी।

महादेवजीका वरदान पाकर प्रभाने वहाँ उनकी स्थापना की और इस प्रकार बोली—भगवन्! आप अपने अंशसे यहाँ निवास करें और इस तीर्थको प्रकाशमें लावें।

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर! प्रभाद्वारा स्थापित शिवलिंग ही प्रभासेश्वर नामसे प्रसिद्ध हुआ। वह सम्पूर्ण लोकमें दुर्लभ है। माघमासकी सप्तमीको यह विशेष फलद होता है। जो उस तीर्थमें भक्तिसे कन्यादान देता है अथवा कन्याके समान अवस्थावाले धनी एवं कुलीन ब्राह्मणको विवाहके लिये कन्या दिलाता है, उसका पाप नष्ट हो जाता है। वहाँ कन्यादान करनेवाला पुरुष सूर्यलोकका भेदन करके कल्याणमय शिवलोकमें जाता है। युधिष्ठिर! मनुष्य तभीतक भटकता है, जबतक प्रभातीर्थमें नहीं जाता। वहाँ जानेपर अश्वमेधयज्ञका फल पाकर वह उत्तम गतिको पाता है।

तदनन्तर नर्मदाके दक्षिण तटपर उत्तम मार्कण्डेयेश्वर तीर्थमें जाय, जो देवताओंद्वारा वन्दित, कल्याणमय तथा गोपनीयसे भी गोपनीय है। उसकी स्थापना मैंने स्वयं ही की है। वह परम पवित्र तथा भोग एवं मोक्ष देनेवाला है। उसी तीर्थमें भगवान् शंकरके प्रसादसे मुझे ज्ञानकी प्राप्ति हुई है। पाण्डुनन्दन! जो वहाँ अन्यान्य सूक्तोंका चिन्तन तथा वहाँके जलमें 'द्रुपदादिव०' इत्यादि मन्त्रोंका जप करता है, वह घोर पापराशिसे मुक्त हो जाता है। जो अपनी पाँचों इन्द्रियोंको वशमें करके नर्मदाके दक्षिण तटपर बैठकर जलमें भक्तिपूर्वक पूर्वोक्त सूक्तोंका जप करता है, वह मन, वाणी और क्रियाद्वारा होनेवाले सब पापोंसे छुटकारा पा जाता है, ऐसा भगवान् शंकरका कथन है। जो मार्कण्डेयेश्वरतीर्थमें भक्तिपूर्वक पितरोंका श्राद्ध करता है, उसके पितर प्रलयकालतक तृप्त रहते हैं। जो वहाँ आँवला, बेर, बेल आदि फल, अक्षत और जलसे प्रेतोंका तर्पण करते हैं, उनके द्वारा तृप्त किये हुए वे प्रेत शुभ गतिको प्राप्त होते हैं।

राजेन्द्र! उसके बाद नर्मदाके उत्तर तटपर यज्ञवाट्के मध्यमें स्थित संकर्षण नामक तीर्थमें जाय, जो सब पापोंका नाश करनेवाला और भूतलमें प्रसिद्ध है। वहाँ पूर्वकालमें बलभद्रजीने नर्मदातटपर सब प्राणियोंके उपकारके लिये तपस्या की थी। वहीं समीपमें ही देवताओं तथा भगवती उमाके साथ भगवान् शिव निवास करते हैं। जो मनुष्य वहाँ क्रोध और इन्द्रियोंको वशमें रखकर शुक्ल पक्षकी एकादशी तिथिको भक्तिभावसे मन्त्रोच्चारणपूर्वक भगवान् शिवको स्नान कराता है तथा श्रद्धा-भक्तिके साथ प्रेतोंके लिये श्राद्ध एवं दान करता है, वह परम पदको प्राप्त होता है।

तत्पश्चात् मन्मथेश्वरतीर्थको जाय। वहाँ स्नान करनेमात्रसे मनुष्य कभी यमलोकको नहीं देखता। वहाँ स्नान करके पवित्रचित्त हो मुनिभावसे रहनेवाला जो मनुष्य उत्तम भक्तिपूर्वक उपवास करता है, उसे सहस्र गोदानका फल प्राप्त होता है।

इसके बाद एरण्डीश्वरतीर्थमे जाना चाहिये। ब्रह्माजीके मानसपुत्रोंमें एक महर्षि अत्रिके नामसे प्रसिद्ध हैं। उनकी पत्नीका नाम अनसूया है। उनमें पत्नीके सभी सद्गुण मौजूद हैं। वे पतिव्रता, पतिप्राणा और पतिके हित करनेमें सदा संलग्न रहनेवाली हैं। एक दिन वे दोनों श्रेष्ठ दम्पति अपराह्नकालमें कहीं सुखपूर्वक बैठे थे। उस समय मुनिवर अत्रिने कहा—"प्रिये! चराचर प्राणियोंसहित तीनों लोकोंमें तुम-जैसी पतिव्रता स्त्री दूसरी नहीं है। जो नारी अपने पति और पुत्र दोनोंको प्रिय हो तथा सुहृद्जनोंके हितमें संलग्न रहनेवाली हो, वह धन्य है। शास्त्रोंका कथन है—'पुत्रसे मनुष्य पुण्यलोकोंपर विजय पाता है, पुत्रसे उसकी परम गति होती है।' पृथ्वीपर पुत्रके सदृश कोई बन्धु नहीं देखा जाता है, जो कि घोर असिपत्रवनमें गिरते हुए पिताकी रक्षा करता है। अकालमें, दीनता आदिमें तथा बुढ़ापेमें भी पुत्र पिताका पालन करता है।"

  • आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५३

अनसूया बोली—ब्रह्मन्! पतिदेव! जो नारी पतिव्रता है, वह पति और पुत्र दोनोंकी वृद्धि करनेवाली है तथा धर्म, अर्थ और काम तीनोंकी साधिका है। अतः वह सबके द्वारा पालन करने योग्य है। जप, तप, तीर्थयात्रा, पुत्रेष्टि तथा मन्त्र-साधना आदि साधन पुत्रकी प्राप्ति करानेवाले होते हैं, ऐसा सभी गुरुजन कहते हैं। यदि आपकी आज्ञा हो, तो मैं पुत्रके लिये दुष्कर तपस्या करूँ।

अत्रिने कहा—महाप्राज्ञे! तुम्हें साधुवाद है। मैं आज्ञा देता हूँ, तुम पुत्रके लिये तपस्या करो।

तब अनसूयाने अपने पतिको साष्टांग प्रणाम करके कहा—विप्रवर! आपके प्रसादसे मैं सिद्धि प्राप्त करूँगी। ऐसा कहकर अनसूया नर्मदा नदीके तटपर गयी, जो सोमनाथके तुल्य महत्त्व रखनेवाला था। नर्मदाके समीप दो योजनतक वहाँ दोनों तटकी भूमि बड़ी उत्तम है। नर्मदाके उत्तर तटपर पहुँचकर अनसूया नियमपालनमें संलग्न हुई। वह पत्ते चबाकर अथवा साग खाकर रहती और उत्तम स्तोत्रोंद्वारा देवताओंकी स्तुति करती थी। तब भगवान् विष्णु, महादेवजी और ब्रह्माजी एरण्डीसंगममें आये तथा ब्राह्मणका रूप धारण करके अनसूयाके आगे खड़े होकर मन्त्रोंका उच्चारण करने लगे। अनसूयाजी अर्घ्य देकर उठीं और कहने लगीं—'आज मेरा जन्म सफल हुआ और आज मेरी तपस्या सफल हो गयी।' ऐसा कहकर उन्होंने परिक्रमा की और प्रणाम करके कहा—'विप्रवरो! आज मैं दिव्य कन्द, मूल और फल भोजन कराकर आपलोगोंको तृप्त करूँगी।'

ब्राह्मण बोले—सुव्रते! तुम्हारे दर्शनसे ही हम तृप्त हैं। बताओ, तुम किसलिये तप कर रही हो?

अनसूयाने कहा—ब्राह्मणो! तपस्यासे स्वर्गकी सिद्धि होती है, तपस्यासे उत्तम गति मिलती है और तपस्यासे ही मनुष्य सम्पूर्ण मनोरथोंको पूर्ण करता है।

ब्राह्मण बोले—उत्तम व्रतका पालन करनेवाली देवि! वर माँगो। हम तीनों ब्रह्मा, विष्णु और महादेव हैं। लोककी दृष्टिमें हमने अपने स्वरूपको छिपा रखा है।

इतना कहकर उन्होंने अपने-अपने स्वरूपका दर्शन कराया। वे कोटि-कोटि सूर्योंके समान कान्तिमान् दिखायी देने लगे।

अनसूयाने कहा—यदि ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कृपा करके मुझपर प्रसन्न हुए हैं, तो इस समय मुझे यही वरदान दें कि मेरे पुत्र होकर उत्पन्न हों।

तब भगवान् विष्णुने कहा—कल्याणी! मैं तुम्हें देवतुल्य पराक्रमी, पिताके समान गुणवान्, सोमयाजी और बहुश्रुत पुत्र देता हूँ।

अनसूयाने कहा—भगवन्! मैंने जैसी प्रार्थना की है, उसके अनुकूल, मनोवांछित वस्तु मुझे देनी चाहिये। उसके विपरीत नहीं करना चाहिये।

तब तीनों देवता बोले—कल्याणी! हम तुम्हारे अयोनिज पुत्र होंगे, क्योंकि देवता गर्भमें निवास नहीं करते।

इतना कहकर वे तीनों देवता चले गये। नर्मदातटपर यह श्रेष्ठ वरदान पाकर अनसूया देवी महेन्द्रपर्वतपर अपने पतिके समीप गयीं। उन्हें देखकर अत्रि मुनिने कहा—'महाप्राज्ञे! धन्यवाद। तुमने वह दुर्लभ वरदान पाया है, जो सम्पूर्ण स्त्रियोंके लिये असाध्य है।'

अनसूयाने कहा—महर्षे! आपके प्रसादसे ही मुझे दुर्लभ वरकी प्राप्ति हुई है।

ऐसा कहकर हर्षमें भरी हुई महादेवी अनसूयाने अपने प्राणवल्लभ मुनिकी ओर देखा और मुनिने भी उस शुभदर्शना पत्नीकी ओर दृष्टिपात किया। परस्पर दर्शनसे ही अत्रिके ललाटमें एक शुभ्र ज्योतिर्मण्डल प्रकट हुआ। जिसकी किरणें नौ सहस्र योजनतक फैली हुई थीं। कदम्बपुष्पके समान गोल आकारवाला ब्रह्ममण्डल त्रिविध परिधिमण्डलसे घिरा हुआ था। मण्डलके मध्यभागमें दिव्य पुरुषरूपधारी देवेश्वर ब्रह्माजी प्रकट हुए, जो सुवर्णके समान कान्तिमान् और कोटि-कोटि

१०५४ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *

सूर्योंके समान प्रभापुंजसे व्याप्त थे। ये ही अनसूयाके प्रथम पुत्र साक्षात् ब्रह्माजीके अवतार चन्द्रमा नामसे विख्यात हुए। इन्हींको सोम भी कहते हैं। ये सोलह कलाओंसे संयुक्त हो माता-पिताके श्रेष्ठ एवं प्रिय पुत्र हुए। इनकी कलाओंके नाम इस प्रकार हैं—प्रतिपत्, द्वितीया, तृतीया, चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, दशमी, एकादशी, द्वादशी, त्रयोदशी, चतुर्दशी तथा पंद्रहवीं पूर्णमासी कही गयी है। सोलहवीं कलाका नाम अमावास्या है। ये चन्द्रमा सूक्ष्म होकर चार प्रकारके जीवोंसे युक्त सम्पूर्ण चराचर जगत्‌को तृप्त करते हैं। आहुतिमें दिया हुआ द्रव्य चन्द्रमामें ही स्थित होता है। अमावास्याके ये चन्द्रमा जब वनस्पतियोंमें व्याप्त रहते हैं, उस समय जो मूढ़ मानव किसी वनस्पतिको काटता है वह दुःख भोगता है और अपने किये हुए एक वर्षके पुण्यको भस्म कर देता है। इन दिव्य गुणोंसे विशिष्ट सोमरूपी ब्रह्माजी अनसूयाको आनन्द प्रदान करनेवाले प्रथम पुत्र हुए। उनके दूसरे पुत्र महाभाग दुर्वासा मुनि हैं, जो सृष्टिसंहारकारी साक्षात् महेश्वरके अवतार हैं। अनसूयाजीके तीसरे पुत्र दत्तात्रेयके नामसे विख्यात हुए, जो जगद्व्यापी जगन्नाथ साक्षात् भगवान् विष्णुके अवतार हैं। इस प्रकार ब्रह्मा और महादेवजीके साथ भगवान् विष्णुने अवतार ग्रहण किया। तभीसे नर्मदाके उत्तर तटपर अनसूयाजीके द्वारा प्रसिद्ध किया हुआ पुत्र-प्राप्तिपद नामक तीर्थ है, जो सब पापोंका नाश करनेवाला है।

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सौवर्णतीर्थ, करण्डेश्वरतीर्थ, भाण्डारतीर्थ, रोहिणीतीर्थ, चक्रतीर्थ तथा धूमपाततीर्थका माहात्म्य और माहात्म्य-श्रवणका फल

मार्कण्डेयजी कहते हैं—युधिष्ठिर ! तदनन्तर सौवर्ण नामक उत्तम तीर्थ है, जो तीनों लोकोंमें विख्यात और सब पापोंका नाश करनेवाला है। वहाँ संगमके समीप नर्मदास्नानका अवसर दुर्लभ है। उस पुण्यक्षेत्रमें वह पावन तीर्थ एक हाथ भूमिमें ही स्थित है। उस सुवर्णशिलकमें स्नान करके मनुष्य कल्याणमयी परम शान्तिको प्राप्त होता है। जो मनुष्य उपवास करके जितेन्द्रिय भावसे वहाँ शुक्ल पक्षकी अष्टमी तिथिको श्राद्ध करता है, वह अपने कुलकी दस पूर्व पीढ़ियोंका और दस आनेवाली पीढ़ियोंका उद्धार कर देता है।

इसीके समीप करण्डेश्वर नामक उत्तम तीर्थ है, जो नर्मदाके उत्तर तटपर स्थित है। वह सब पापोंको हरनेवाला तथा सब प्रकारके दुःखोंका नाश करनेवाला है। वहाँसे परम सुन्दर सौभाग्यकरण नामक तीर्थको जाय, जो मनुष्योंके सब पापोंका नाश करनेवाला है। युधिष्ठिर ! जो भाग्यहीन स्त्री या पुरुष वहाँ स्नान करके उमा-महेश्वरका पूजन करते हैं, उन्हें सौभाग्यकी प्राप्ति होती है। तृतीया तिथिको दिन-रात उपवास करके जितेन्द्रिय पुरुष सुरूपवान् सपत्नीक ब्राह्मणको निमन्त्रित करे। आनेपर पाद्य-अर्घ्य आदि देनेके पश्चात् उन्हें सुगन्धित पुष्पोंकी मालाओंसे अलंकृत करे। फिर पुष्प देकर धूपकी सुगन्धसे सुवासित करे। तत्पश्चात् भक्तिभावसे खीर अथवा खिचड़ी भोजन करावे। विधिपूर्वक भोजन कराकर ब्राह्मण-दम्पतिकी परिक्रमा करे। फिर नर्मदाके जलमें स्नान और दान करे। ऐसा करनेवाली सौभाग्यवती स्त्री कभी पतिवियोगको नहीं प्राप्त होती।

तदनन्तर भाण्डारतीर्थकी यात्रा करे। वहाँ पूर्वकालमें कुबेरने तपस्या की थी, जिससे ब्रह्माजी प्रसन्न हुए थे।

उसके बाद परम उत्तम रोहिणीतीर्थ है। महाप्रलयके समय जब भयंकर एकार्णवके जलमें समस्त चराचर जगत्‌का नाश हो गया, तब जलके भीतर शयन करनेवाले देवाधिदेव भगवान्

* आवन्त्यखण्ड-रेवाखण्ड * १०५५

विष्णुकी नाभिसे कर्णिका, केसर और दलोंसे युक्त एक महाकमल प्रकट हुआ, जो सूर्यमण्डलके समान देदीप्यमान था। उस कमलमें चार मुखारविन्दोंसे सुशोभित ब्रह्माजी उत्पन्न हुए और सोचने लगे कि 'मैं क्या करूँ?' इसी समय उनके शरीरसे भगवान् मरीचि प्रकट हुए। कुछ कालके बाद मरीचिसे कश्यप उत्पन्न हुए। उन्हीं दिनों दक्ष प्रजापतिके पचास कन्याएँ हुईं, जिनमेंसे दस धर्मको और तेरह कश्यपको ब्याह दी गयीं। सत्ताईस कन्याएँ उन्होंने चन्द्रमाको दे दीं। उन कन्याओंमें रोहिणी सबसे सुन्दरी एवं चन्द्रमाके समान मुखवाली थी। रोहिणी सभी स्त्रियोंको प्रिय लगती थी और पतिको तो वह विशेष प्रिय लगती थी। उसने तपस्या करनेका निश्चय करके नर्मदाजीके तटको प्रस्थान किया और वहाँ बड़ी कठोर तपस्या की। वह दीर्घकालतक निरन्तर महिषासुरमर्दिनी दुर्गादेवीकी आराधनामें लगी रही। प्रतिदिन नर्मदाके जलमें स्नान करके उसने व्रत और नियमोंका पालन किया। इससे प्रसन्न होकर भगवती नारायणीने उसे प्रत्यक्ष दर्शन दिया और इस प्रकार कहा—'महाभागे! तुम मनोवांछित वर माँगो।' रोहिणीने कहा—'देवि! मैं अपनी सपत्नियोंके बीचमें सबसे अधिक पतिकी प्यारी होऊँ। मेरी यह इच्छा शीघ्र पूर्ण हो, ऐसी कृपा करें।'

तब 'एवमस्तु' कहकर भगवती महालक्ष्मी भक्तिपरायण देवताओंकी स्तुति सुनती हुई वहाँसे अन्तर्धान हो गयीं। तबसे रोहिणी देवी चन्द्रमाको अधिक प्रिय हुई और सम्पूर्ण लोकोंको भी वह प्यारी लगने लगी। उस तीर्थमें जो स्त्री और पुरुष भक्तिपूर्वक स्नान करते हैं, उनमेंसे स्त्री अपने पतिको तथा पति अपनी स्त्रीको अधिक प्रिय होते हैं।

तदनन्तर सब पापोंका नाश करनेवाले परम उत्तम चक्रतीर्थमें जाय, जो सेनापुरके नामसे विख्यात है। यहीं देवाधिदेव चक्रधारी भगवान् विष्णुने स्वामिकार्तिकेयका सेनापतिके पदपर अभिषेक किया था। जो क्रोधको जीतकर भगवान् विष्णुके प्रिय चक्रतीर्थमें जाता है, वह पापोंसे मुक्त होता और भयंकर यमराजको नहीं देखता है। वहाँ रात्रिमें जागरण करके भगवान् विष्णुके लिये दीपदान करे और एकाग्रचित्त हो उन्हींकी कथा-वार्ता सुने। जो उस तीर्थमें भीमव्रत, पराक, कृच्छ्र, चान्द्रायण, त्रिरात्र आदिका अनुष्ठान करता है, वह अन्तमें वैतरणीनदीको तर जाता है और दिन-रात चलते हुए भीमचक्र, कूटशाल्मलि आदि नरकोंकी यातना कभी नहीं देखता है।

महाबाहो! इस प्रकार लोकपावनी नर्मदा तीनों लोकोंके लिये पूजनीय हैं। उनका अनुपम माहात्म्य मैंने तुम्हें सुनाया है। महाभाग! इसे भक्तिपूर्वक सुनकर मनुष्य रुद्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है।

इस खण्डके आदि, मध्य और अन्तमें नर्मदा नदीका उत्तम माहात्म्य बताया गया है। जो कोई भक्तिपूर्वक इसका श्रवण करता है, उसे मनोवांछित फलकी प्राप्ति होती है। जो मनुष्य जितेन्द्रियभावसे इस अनुपम माहात्म्यको सुनकर दान करता है, उसके सम्पूर्ण मनोरथोंकी सिद्धि होती है। धूप, दीप और चन्दन आदिसे पुस्तककी पूजा करके इसका दान करना चाहिये। ब्राह्मणोंकी भी पूजा करनी चाहिये। इस माहात्म्यके श्रवण और दानसे नर्मदा देवी अत्यन्त प्रसन्न होती हैं। प्रत्येक तीर्थमें पवित्र माहात्म्य सुनकर दान करना चाहिये, तभी तीर्थसेवन सफल होता है।

इस प्रकार नर्मदाजीका माहात्म्य सुनकर धर्मराज युधिष्ठिरने नर्मदातटवर्ती तीर्थोंकी यात्रा की।

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१०५६ * संक्षिप्त स्कन्दपुराण *


श्रीसत्यनारायण-व्रतकी विधि, ब्राह्मण और लकड़हारेकी कथा

ऋषियोंने सूतजीसे पूछा—महामुने ! किस व्रत या तपसे अभीष्ट फलकी प्राप्ति होती है? हम सुनना चाहते हैं, कृपया बताइये।

सूतजी बोले—देवर्षि नारदने यही बात भगवान् कमलाकान्तसे पूछी थी, उन्होंने जो उसका उत्तर दिया था, उसीको आप सुनिये। एक दिन दूसरोंपर अनुग्रह करनेवाले योगी नारदजी विविध लोकोंमें घूमते हुए मर्त्यलोकमें आये। उन्होंने देखा, यहाँके सभी मनुष्य भाँति-भाँतिके दुःखोंसे पीड़ित हैं और अपने-अपने कर्मके फलस्वरूप विविध योनियोंमें जन्म लेकर क्लेश पा रहे हैं। वे सोचने लगे—'किस उपायसे इनका दुःख निश्चितरूपसे दूर हो सकता है।' मन-ही-मन इस प्रकार सोचकर वे विष्णुलोकमें गये और वहाँ जाकर उन्होंने शंख-चक्र-गदा-पद्मधारी, वनमालासे विभूषित, शुक्लवर्ण चतुर्भुज देवदेवेश्वर भगवान् नारायणको देखकर कुछ कहना चाहा।

नारदजी बोले—आप मन और वाणीसे अतीत अनन्तशक्ति हैं। आदि, मध्य और अन्तसे रहित हैं, निर्गुण हैं, गुणात्मा हैं, सबके आदिभूत हैं और भक्तोंके दुःखका नाश करनेवाले हैं। आपको नमस्कार है।

भगवान् विष्णुने नारदका स्तवन सुनकर उत्तर दिया—

श्रीभगवान् बोले—महाभाग ! तुम किस लिये यहाँ आये हो और तुम्हारे मनमें क्या अभिलाषा है? बताओ, मैं तुम्हारी सब बातोंका उत्तर दूँगा।

नारदजी बोले—मर्त्यलोकमें मनुष्य पापकर्मवश विविध योनियोंमें जन्म लेकर नाना प्रकारसे क्लेश पा रहे हैं और अपने-अपने पापोंका फल भोग रहे हैं। हे नाथ! उनके वे सारे क्लेश सहजमें ही कैसे दूर हो सकते हैं? यदि मुझपर आपकी कृपा है तो वह उपाय बताइये। उसीको सुननेकी मेरी इच्छा है।

श्रीभगवान्ने कहा—वत्स ! लोगोंके प्रति अनुग्रहकामी होकर तुमने बड़ी अच्छी बात पूछी। जिसके करनेसे मनुष्य मोहसे मुक्त होता है, वह मैं तुमसे कह रहा हूँ, सुनो।

एक अत्यन्त पवित्र व्रत है, जो स्वर्ग या पृथ्वीपर अति दुर्लभ है। मैं स्नेहवश, हे विप्र! आज उसीको प्रकट कर रहा हूँ। इस व्रतका नाम सत्यनारायण-व्रत है। इसको भलीभाँति विधानपूर्वक बतलाता हूँ। इस व्रतका सम्यक्-रूपसे अनुष्ठान किये जानेपर इस लोकमें सुख भोगकर मनुष्य परलोकमें मोक्षको प्राप्त करता है।

भगवान्‌की इस बातको सुनकर नारदजीने फिर कहा—इस व्रतका क्या फल है, इसकी क्या विधि है और किसने यह व्रत किया था तथा कब किया था? यह सब विस्तारपूर्वक बतलाइये।

श्रीभगवान् बोले—इस व्रतसे दुःख-शोकादिका नाश होता है, धन-धान्यकी वृद्धि होती है और यह व्रत सौभाग्य, सन्तति तथा सर्वत्र विजय प्रदान करता है। मनुष्य भक्ति-श्रद्धाके साथ जिस किसी दिन यह व्रत कर सकता है। परंतु सत्यनारायणदेव निशामुख अर्थात् सन्ध्याके समय पूजे जानेपर सन्तुष्ट होते हैं। धर्मपरायण मनुष्य ब्राह्मण और बन्धु-बान्धवोंके साथ यह व्रत करे। भक्तिके द्वारा भोग लगावे। भोग उत्तम पदार्थोंका होना चाहिये। भोग सवाके हिसाबसे (जैसे सवा छटाक, सवा पाव, सवा सेर आदि) होना चाहिये। केला, घी, दूध, गेहूँ, गेहूँका आटा, गेहूँका आटा न मिलनेपर चावलका आटा और चीनी अथवा गुड़‌का भोग लगाना चाहिये। ये सभी चीजें परिमाणमें सवाके हिसाबसे होनी